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चाणक्य नीति: अगर आप में है ये गुण तो जिंदगी में कभी नहीं खाएंगे ठोकर.

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वर्तमान समय की बात करें तो लोगों में धीरज, धैर्य, सबर आदि बहुत कम है। जिस कारण लोग अपने जीवन के रिश्ते निभाने में असमर्थ हो रहे हैं। आचार्य चाणक्य कहते हैं कि लोगों की असफलता का सबसे बड़ा कारण यही होता है। क्योंकि सफलता चाहे किसी भी तरह की हो, उसे पाने के लिए जितना जरूरी होता बै मेहनत करना उससे कई गुना जरूरी है व्यक्ति में धैर्य होना। जिस व्यक्ति में धैर्य नहीं होता वह लोगों को अपना बनाने में असमर्थ होता है। और न ही वह व्यक्ति पर कोई विश्वास कर पाता है। तो आइए जानते हैं आचार्य चाणक्य द्वारा बताए गए एक ऐसे ही श्लोक के बारे में जिसमें उन्होंने बताया है कि जो व्यक्ति अधिक क्रोध नहीं करता, उसका शांत स्वभाव उसे जीवन में हमेशा हर मुश्किल समय में लाभ देता है।

चाणक्य नीति श्लोक-
शांत’ व्यक्ति सबको अपना बना लेता है
भावार्थ- सर्व जयत्यक्रोध:।

अर्थ: क्रोध करना किसी दृष्टि से उचित नहीं है। क्रोधी व्यक्ति क्रोध करके अपनी शक्तियों का क्षय करता है जबकि एक शांतचित्त व्यक्ति अपने विरोधियों पर भी विजय प्राप्त कर लेता है और अपने व्यवहार से उन्हें अपना बना लेता है।
चाणक्य नीति श्लोक-
लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात् तत्र संगतिम् ॥
भावार्थ- जिस स्थान पर आजीविका न मिले, लोगों में भय, और लज्जा, उदारता तथा दान देने की प्रवृत्ति न हो, ऐसी पांच जगहों को भी मनुष्य को अपने निवास के लिए नहीं चुनना चाहिए।

अर्थ: आचार्य चाणक्य कहते हैं व्यक्ति को जिस स्थान पर रोजगार प्राप्त न हो, जहां रहने पर किसी प्रकार का भय सताए, आस पास के लोग लज्जाहीन हो, किसी प्रति उदारता या दया की भावना न हो। ऐसे जगह पर रहना कभी अच्छा नहीं माना जाता है। बल्कि जितना हो सके ऐसे स्थानों से दूर रहना चाहिए। चाणक्य नीति के अनुसार ऐसे स्थल पर निवास करने से जीवन में नकारात्मकता का आगमन होता है।

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21 जून को है निर्जला एकादशी, यहाँ जानिए इस व्रत से जुड़ी 10 प्रमुख बातें

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आने वाले 21 जून, सोमवार को ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि है। आपको बता दें कि इस तिथि को निर्जला एकादशी कहा जा रहा है। ऐसे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं निर्जला एकादशी से जुडी दस प्रमुख बातें।

आप सभी को बता दें कि एकादशी का व्रत सभी व्रतों में श्रेष्ठ और उत्तम फल प्रदान करता है। वहीँ निर्जला एकादशी व्रत को सबसे कठिन व्रतों में से एक कहा जाता है। जी दरअसल इस व्रत में अन्न और जल का त्याग किया जाता है। इस दिन जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की जाती है।

निर्जला एकादशी व्रत का शुभ मुहूर्त

निर्जला एकादशी तिथि: 21 जून 2021

एकादशी तिथि प्रारंभ: 20 जून, रविवार को शाम 4 बजकर 21 मिनट से शुरू

एकादशी तिथि समापन: 21 जून, सोमवार को दोपहर 1 बजकर 31 मिनट तक

एकादशी व्रत का पारण समय: 22 जून, सोमवार को सुबह 5 बजकर 13 मिनट से 8 बजकर 1 मिनट तक

निर्जला एकादशी व्रत से जुड़ी दस प्रमुख बातें-

निर्जला एकादशी व्रत में सुबह स्नान करने के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए।

स्वच्छता के नियमों का ध्यान रखे।

 निर्जला एकादशी व्रत में पीले रंग का प्रयोग करें।

भगवान विष्णु को पीला रंग अधिक प्रिय है।

एकादशी के दिन चावल ग्रहण ना करें।

एकादशी व्रत में सुबह और शाम पूजा करें।

एकादशी के दिन रात्रि में भजन कीर्तिन करें।

निर्जला एकादशी व्रत में ‘ऊं नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें।

निर्जला एकादशी व्रत में काम, क्रोध से बचे।

निर्जला एकादशी व्रत का पारण नियम से करें और दान करें।

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हनुमानजी ने ऐसा किया चमत्कार कि जगन्नाथ मंदिर में नहीं आती है समुद्र की आवाज

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भारतीय राज्य ओड़िसा में सप्तपुरियों में से एक है पुरी जहां पर प्रभु जगन्नाथ का विश्‍व प्रसिद्ध मंदिर है। इसे चार धामों में एक माना जाता है। इस मंदिर को राजा इंद्रद्युम्न ने हनुमानजी की प्रेरणा से बनवाया था। कहते हैं कि इस मंदिर की रक्षा का दायित्व प्रभु जगन्नाथ ने श्री हनुमानजी को ही सौंप रखा है। यहां के कण कण में हनुमानजी का निवास है। हनुमानजी ने यहां कई तरह के चमत्कार बताए हैं। उन्हीं में से एक है समुद्र के पास स्थित मंदिर के भीतर समुद्र की आवाज को रोक देना।

इस मंदिर के चारों द्वार के सामने रामदूत हनुमानजी की चौकी है अर्थात मंदिर है। परंतु मुख्‍य द्वार के सामने जो समुद्र है वहां पर बेड़ी हनुमानजी का वास है। यहां जगन्नाथपुरी में ही सागर तट पर बेदी हनुमान का प्राचीन एवं प्रसिद्ध मंदिर है। भक्त लोग बेड़ी में जकड़े हनुमानजी के दर्शन करने के लिए आते हैं।

एक बार नारदजी भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए पहुंचे तो उनका सामना हनुमानजी से हुआ। हनुमानजी ने कहा कि इस वक्त तो प्रभु विश्राम कर रहे हैं आपको इंतजार करना होगा। नारदजी द्वार के बाहर खड़े होकर इंतजार करने लगे। कुछ समय बाद उन्होंने मंदिर के द्वार के भीतर झांका तो प्रभु जगन्नाथ श्रीलक्ष्मी के साथ उदास बैठे थे। उन्होंने प्रभु से इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहाकि यह समुद्र की आवाज हमें विश्राम कहां करने देती है।

नारदजी ने यह बात बाहर जाकर हनुमानजी को बताई। हनुमानजी ने क्रोधित होकर समुद्र से कहा कि तुम यहां से दूर हटकर अपनी आवाज रोक लो क्योंकि मेरे स्वामी तुम्हारे शोर के कारण विश्राम नहीं कर पात रहे हैं। यह सुनकर समुद्रदेव ने प्रकट होकर कहा कि हे महावीर हनुमान! यह आवाज रोकना मेरे बस में नहीं। जहां तक पवनवेग चलेगा यह आवाज वहां तक जाएगी। आपको इसके लिए अपने पिता पवनदेव से विनति करना चाहिए।

तब हनुमानजी ने अपने पिता पवदेव का आह्‍वान किया और उनसे कहा कि आप मंदिर की दिशा में ना बहें। इस पर पवनदेव ने कहा कि पुत्र यह संभव नहीं है परंतु तुम्हें एक उपाय बताता हूं कि तुम्हें मंदिर के आसपास ध्वनिरहित वायुकोशीय वृत या विवर्तन बनाना होगा। हनुमानजी समझ गए।

तब हनुमानजी ने अपनी शक्ति से खुद को दो भागों में विभाजित किया और फिर वे वायु से भी तेज गति से मंदिर के आसपास चक्कर लगाने लगे। इससे वायु का ऐसा चक्र बना की समुद्र की ध्वनि मंदिर के भीतर ना जाकर मंदिर के आसपास ही घूमती रहती है और मंदिर में श्री जगन्नाथजी आराम से सोते रहते हैं।

यही कारण है कि तभी से मंदिर के सिंहद्वार में पहला कदम प्रवेश करने पर ही (मंदिर के अंदर से) आप सागर द्वारा निर्मित किसी भी ध्वनि को नहीं सुन सकते। आप (मंदिर के बाहर से) एक ही कदम को पार करें, तब आप इसे सुन सकते हैं। इसे शाम को स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है। इसी तरह मंदिर के बाहर स्वर्ग द्वार है, जहां पर मोक्ष प्राप्ति के लिए शव जलाए जाते हैं लेकिन जब आप मंदिर से बाहर निकलेंगे तभी आपको लाशों के जलने की गंध महसूस होगी।

दूसरा यह कि इस कारण श्री जगन्नाथ मंदिर के ऊपर स्थापित लाल ध्वज सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराता है। यह भी आश्‍चर्य है कि प्रतिदिन सायंकाल मंदिर के ऊपर स्थापित ध्वज को मानव द्वारा उल्टा चढ़कर बदला जाता है। ध्वज भी इतना भव्य है कि जब यह लहराता है तो इसे सब देखते ही रह जाते हैं। ध्वज पर शिव का चंद्र बना हुआ है। जय हनुमान। जय श्रीराम।

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Dhumavati Jayanti 2021: इन मंत्रों का जप करने से होगी सौभाग्य की प्राप्ति

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18 जून को धूमावती जयंती का पर्व मनाया जाएगा। हिंदी पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन मां पार्वती के उग्र रूप धूमावती का अवतरण हुआ था जिस कारण इस दिन मां धूमावती की पूजा की जाती है। शास्त्र के मुताबिक मां धूमावती श्वेत वस्त्र धारण करती हैं केस खुले रखती हैं तथा कौवे की सवारी करती हैं।

धार्मिक मान्यता है कि इनके दर्शन मात्र से व्यक्ति को अपने तमाम पापों से मुक्ति मिलती है तथा अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। ग्रंथ और शास्त्रों में किए उल्लेख के मुताबिक इनका प्राकट्य पापियों को दंड देने के लिए हुआ था। यही कारण है कि इनकी पूजा विपत्तियों से मुक्ति, रोग नाश तथा युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए की जाती है।

यहां जाने इनसे जुड़े कुछ खास उपाय व मंत्र-
जिस व्यक्ति पर कर्ज का अधिक भार हो गया हो उसे इस दिन नीम की पत्तियों सहित व शुद्ध घी से हवन करना चाहिए।

कोई रोग परेशान कर रहा हो तो उससे छुटकारे के लिए मीठी रोटी व शुद्ध घी से हवन करना चाहिए।

गरीबी से निजात पाने के लिए इस दिन गुड़ व गन्ने से हवन करना चाहिए।

कुंडली में कालसर्प दोष हे या कोई अधिक ग्रह क्रूर हो तो इसके लिए जटामांसी और काली मिर्च से हवन करना चाहिए।

धूमावती मंत्र
ॐ धूं धूं धूमावत्यै फट्
ॐ धूमावत्यै विद्महे संहारिण्यै धीमहि तन्नो धूमा प्रचोदयात
धूम्रा मतिव सतिव पूर्णात सा सायुग्मे, सौभाग्यदात्री सदैव करुणामयी:
धूं धूं धूमावती ठ: ठ:

किसी तरह का कोई कोर्ट केस चल रहा हो तो इस दिन काली मिर्च से हवन करें।

इन उपायों के तहत सौभाग्य प्राप्ति के लिए इस दिन रक्त चंदन घिस कर शहर में मिलाएं, बाद में जौ और इसका मिश्रण बनाकर इससे हवन करें।

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Ganga Dussehra 2021: 20 जून को है गंगा दशहरा जानें, मुहूर्त और पूजा विधि

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20 जून यानी की रविवार को गंगा दशहरा मनाया जाएगा. हिन्दू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक वर्ष के ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है. गंगा दशहरा पर भगवान शिव विष्णु की पूजा की जाती है. इसके साथ ही मां गंगा का पूजन किया जाता है. गंगा दशहरा के दिन किए गए दान-पुण्य करने से उसका फल कई गुना बढ़ जाता है. इस खास दिन गंगा में स्नान करने के पश्चात दान करता है तो, उसके सभी तरह के पाप धूल जाते हैं भक्तों को पुण्य की प्राप्ति होती है.

गंगा दशहरा का शुभ मुहूर्त

दशमी तिथि प्रारंभ- 19 जून 2021 को शाम 06 बजकर 50 मिनट पर

दशमी तिथि समापन- 20 जून 2021 को शाम 04 बजकर 25 मिनट पर रहेगा

गंगा दशहरा पूजा विधि

पुराणों के मुताबिक, गंगा दशहरा के दिन गंगा नदी में स्नान करें. अगर गंगा नदी नहीं है तो आप किसी भी नदी में स्नान कर सकते हैं. इसके बाद ‘ओम नम: शिवाय’ का जाप करें. भगवान सूर्य को जल अर्पित करें हर-हर गंगे का उच्चारण करें. कोरोना के संक्रमण के खतरे को देखते हुए घर में नहाने के पानी में गंगाजल डालकर स्नान करें.

इन मंत्रों का करें जाप-

1. “ऊँ नम: शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नम:।।”
2. “ऊँ नमो भगवते ऐं ह्रीं श्रीं हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा।।”

मां गंगा के अवतरण की पौराणिक कथा

धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, ऋषि भगीरथ ने अपने पूर्वजों को जन्म मरण (जीवन चक्र) के बंधन से मुक्ति दिलाने के लिए मां गंगा की कड़ी तपस्या की. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा ने धरती पर आना स्वीकार तो किया लेकिन समस्या ये थी कि अगर सीधे मां गंगा धरती पर आती तो उनके प्रचंड वेग से धरती को हानि पहुंचती. इसीलिए फिर भगवान शिव ने अपनी जटा में पहले गंगा को धारण किया फिर शिव की जटा से एक निश्चित वेग से मां गंगा धरती पर आई थीं. कहा जाता है कि ज्येष्ठ मास की दशमी को ही गंगा धरती पर आई थीं, इसके बाद से इस दिन गंगा दशहरा मनाने की परंपरा शुरू हुई. वैसे गंगा दशहरा का पर्व 10 दिन पहले से ही शुरू होता है.

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4 आदतें बदलेंगी आपकी किस्मत आजमा कर देखें

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ज्यादातर लोग चाहते हैं कि सुबह के समय ऐसा कुछ न हो जिससे की उनका दिन सकारात्मकता से भरा रहे। इसके साथ ही आपके जीवन की परेशानियां दूर होने के साथ ही तरक्की और धन-समृद्धि प्राप्त होती है। आगे जानिए सुबह उठकर कौन-से काम करने चाहिए.

ऐसा करने से गुरु की मिलती है कृपा
रोज सुबह स्नान करने के बाद पूजा करें और हल्दी या केसर का तिलक लगाकर ही घर से बाहर निकलें। इससे आपका पूरा दिन अच्छा जाता है और तरक्की के योग बनते हैं क्योंकि इससे बृहस्पति देव की कृपा प्राप्त होती है। कुंडली में गुरु मजबूत होता है जिससे आपको कार्यक्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है।

रोज सुबह दें सूर्य को जल
रोज सुबह जल्दी उठकर स्नानादि करने के पश्चात उगते सूर्य को जल देना चाहिए। इससे आपका सूर्य मजबूत होता है, जिससे आपके मान-सम्मान में वृद्धि होती है। आपको हड्डियों और आंखों से जुड़ी समस्याओं से मुक्ति प्राप्त होती है।

पीपल में जल चढ़ाएं
प्रतिदिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि करने के बाद पीपल को जल अवश्य चढ़ाना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार पीपल की पूजा करने से शनि व राहु दोष के कुप्रभावों से मुक्ति प्राप्त होती है। पीपल में श्री हरि विष्णु का वास भी माना जाता है। यदि आप प्रतिदिन पीपल में जल देते हैं तो आपके जीवन के दुख दूर होते हैं।

ये पाठ करने से दूर होते हैं सभी कष्ट
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि प्रातःकाल दुर्गा सप्तशती के कवच, कीलक, अर्गला स्तोत्र का पाठ किया जाए तो कुंडली में बुध और शुक्र की स्थिति मजबूत होती है। इसके साथ ही मां दुर्गा के आशीर्वाद से आपके जीवन के सभी कष्ट और परेशानियां दूर होती हैं और आपके कार्य पूर्ण होते हैं।

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गंगा दशहरा का महत्व, मुहूर्त और खास बातें.

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हिन्दू पंचांग के अनुसार, प्रति वर्ष ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा पर्व मनाया जाता है। इस बार यह तिथि 20 जून 2021, रविवार को मनाई जा रही है। आइए जानते हैं गंगा दशहरा क्यों खास हैं, जानिए इस पर्व का महत्व।

गंगा दशहरा का महत्व.

धार्मिक मान्यता के अनुसार, गंगा मां की आराधना करने से व्यक्ति को दस प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है। गंगा ध्यान एवं स्नान से प्राणी काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, ईर्ष्या, ब्रह्महत्या, छल, कपट, परनिंदा जैसे पापों से मुक्त हो जाता है। गंगा दशहरा के दिन भक्तों को मां गंगा की पूजा-अर्चना के साथ दान-पुण्य भी करना चाहिए। गंगा दशहरा के दिन सत्तू, मटका और हाथ का पंखा दान करने से दोगुना फल की प्राप्ति होती है।

गंगा दशहरा शुभ मुहूर्त.

गंगा दशहरा शनिवार, 19 जून 2021 को शाम 06:50 मिनट से दशमी तिथि का प्रारंभ होगा, जो 20 जून 2021, रविवार शाम 04:25 मिनट तक रहेगी। अत: गंगा दशहरा पर्व रविवार, 20 जून 2021, दशमी तिथि को मनाया जाएगा।

जानिए खास बातें.

1. गंगा दशहरा पर्व सनातन संस्कृति का एक पवित्र त्योहार है।

2. धार्मिक मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि इस दिन मां गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था।

3. गंगा दशहरा के दिन पवित्र नदी गंगा में स्नान करने से मनुष्य अपने पापों से मुक्त हो जाता है।

4. गंगा, नदी स्नान के साथ-साथ इस दिन दान-पुण्य करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन सत्तू, मटका और हाथ का पंखा दान करने की मान्यता है।

5. मंत्र- नमो भगवते दशपापहराये गंगाये नारायण्ये रेवत्ये शिवाये दक्षाये अमृताये विश्वरुपिण्ये नंदिन्ये ते नमो नम:

6. गंगा दशहरा के दिन अपने पितृ को याद करके उन्हें जल अर्पण करना चाहिए।

7. शास्त्रों के अनुसार गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान के बाद सूर्यदेवता को जल अर्घ्य देना चाहिए, तत्पश्चात दान अवश्य करना चाहिए।

8. देवी भागवत के अनुसार शतशः योजन दूर बैठा मनुष्य भी यदि गंगा के नाम का उच्चारण करता है, तो वह पापों से मुक्त होकर भगवान श्रीहरि के धाम को प्राप्त करता है।

9. गंगा भगवान विष्णु का स्वरूप है। इसका प्रादुर्भाव भगवान के श्रीचरणों से ही हुआ है। तभी तो गंगा (मां) के दर्शनों से आत्मा प्रफुल्लित तथा विकासोन्मुखी होती है।

10. यदि कोई भी श्रद्धालु स्नान से पहले गंगा का आवाहन करता है और नदी में डुबकी लगाने से पहले उसी में गंगा की उपस्थिति की अनुभूति करता है।

 

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जानें पूजाघर में घंटी रखने के कारण और फायदे

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मंदिर या घर के पूजाघर में आपने देखा होगा गरुड़ घंटी यहाँ, जानते हैं इसके 10 कारण और फायदे।

कारण

1. हिंदू धर्म अनुसार सृष्टि की रचना में ध्वनि का महत्वपूर्ण योगदान मानता है। ध्वनि से प्रकाश की उत्पत्ति और बिंदु रूप प्रकाश से ध्वनि की उत्पत्ति का सिद्धांत हिंदू धर्म का ही है। इसलिए घंटी रूप में ध्वनि को मंदिर या पूजाघर में रखा जाता है।

2. जब सृष्टि का प्रारंभ हुआ तब जो नाद था, घंटी की ध्वनि को उसी नाद का प्रतीक माना जाता है।

3. घंटी के रूप में सृष्टि में निरंतर विद्यमा नाद ओंकार या ॐ की तरह है जो हमें यह मूल तत्व की याद दिलाता है।

4. घंटियां 4 प्रकार की होती हैं:- 1.गरूड़ घंटी, 2.द्वार घंटी, 3.हाथ घंटी और 4.घंटा।

5. गरुड़ घंटी छोटी-सी होती है जिसे एक हाथ से बजाया जा सकता है।

6. द्वार घंटी द्वार पर लटकी होती है। यह बड़ी और छोटी दोनों ही आकार की होती है।

7. हाथ घंटी पीतल की ठोस एक गोल प्लेट की तरह होती है जिसको लकड़ी के एक गद्दे से ठोककर बजाते हैं।

8. घंटा बहुत बड़ा होता है। कम से कम 5 फुट लंबा और चौड़ा। इसको बजाने के बाद आवाज कई किलोमीटर तक चली जाती है।

9. भगवान गरुड़ के नाम पर है गरुड़ घंटी जिस का मुख गरुड़ के समान ही होता है। भगवान गरुड़ को विष्णु का वाहन और द्वारपाल माना जाता है। अधिकतर मंदिरों में मंदिर के बाहर आपको द्वार पर गरुड़ भगवान की मूर्ति मिलेगी। दक्षिण भारत के मंदिरों में अक्सर इसे देखा जा सकता है।

10. घंटी या घंटे को काल का प्रतीक भी माना गया है। ऐसा माना जाता है कि जब प्रलय काल आएगा तब भी इसी प्रकार का नाद यानि आवाज प्रकट होगी

जानें  फायदे :

1. घंटी विशेष प्रकार का नाद होता है जो आसपास के वातावरण को शुद्ध करता है। इससे वातावरण हमेशा शुद्ध और पवित्र बना रहता है। ऐसा कहते हैं कि घंटी बजाने से वातावरण में एक कंपन पैदा होता है। इस कंपन के वायुमंडल में फैलने से जीवाणु, विषाणु इस तरह के सूक्ष्म जीव आदि नष्ट हो जाते हैं और वातावरण शुद्ध हो जाता है।

2. घर के पूजाघर या मंदिर में प्रात: और संध्या को ही आरती करते वक्त घंटी बजाने का नियम है। वह भी लयपूर्ण। इससे हमारा मन शांत होकर तनाव हट जाता है।

3. जिन स्थानों पर घंटी बजने की आवाज नियमित आती है वहां से नकारात्मक शक्तियां हटती है। नकारात्मकता हटाने से समृद्धि के द्वारा खुलते हैं। इससे सभी तरह के वास्तुदोष भी दूर हो जाते हैं।

4. स्कंद पुराण के अनुसार घंटी बजाने से मानव के सौ जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

5. यह भी कहा जाता है कि घंटी बजाने से देवताओं के समक्ष आपकी हाजिरी लग जाती है।

 

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शनि जयंती पर 10 मंत्रों से खोलें सफलता के सुनहरे द्वार 10 और जून को है साल का पहला सूर्य ग्रहण, क्या इससे राशियां होंगी प्रभावित ?

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गुरुवार को शनि जयंती है। शनि जयंती या प्रति शनिवार इन विशेष मंत्रों के जाप से यश, सुख, समृद्धि, कीर्ति, पराक्रम, वैभव, सफलता और अपार धन-धान्य के साथ प्रगति के द्वार खुलते हैं। किसी एक मंत्र का चयन करें और अवश्य जपें….

1. ॐ शं शनैश्चराय नम:

2. ॐ प्रां. प्रीं. प्रौ. स: शनैश्चराय नम:

3. ॐ नीलांजन समाभासम्। रविपुत्रम यमाग्रजम्।

छाया मार्तण्डसंभूतम। तम् नमामि शनैश्चरम्।।

4. सूर्यपुत्रो दीर्घेदेही विशालाक्ष: शिवप्रिय: द

मंदचार प्रसन्नात्मा पीडां हरतु मे शनि:

5. ॐ शमाग्निभि: करच्छन्न: स्तपंत सूर्य शंवातोवा त्वरपा अपास्निधा:

6. शनि स्तोत्र

नमस्ते कोणसंस्‍थाचं पिंगलाय नमो एक स्तुते

नमस्ते बभ्रूरूपाय कृष्णाय च नमो ए स्तुत

नमस्ते रौद्रदेहाय नमस्ते चांतकाय च

नमस्ते यमसंज्ञाय नमस्ते सौरये विभो

नमस्ते मंदसज्ञाय शनैश्चर नमो ए स्तुते

प्रसाद कुरू देवेश दिनस्य प्रणतस्य च

कोषस्थह्म पिंगलो बभ्रूकृष्णौ रौदोए न्तको यम:

सौरी शनैश्चरो मंद: पिप्लदेन संस्तुत:

एतानि दश नामामी प्रातरुत्थाय ए पठेत्

शनैश्चरकृता पीडा न कदचित् भविष्यति

7. वैदिक शनि मंत्र: ॐ शन्नोदेवीर- भिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये शंय्योरभिस्त्रवन्तुनः।

8. ॐ भूर्भुव: स्व: शन्नोदेवीरभिये विद्महे नीलांजनाय धीमहि तन्नो शनि: प्रचोदयात्

9. ॐ ह्रिं नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम। छाया मार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्।।

10. कोणस्थः पिंगलोबभ्रुः कृष्णो रौद्रोन्तको यमः। सौरिः शनैश्चरो मन्दः पिप्पलादेन संस्तुतः।। एतानि दशनामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्। शनैश्चर कृता पीड़ा न कदाचिद्भविष्यति।।

इसके अलावा नित्य प्रातः शनिदेव के दस नामों का स्मरण करने से भी शनि की पीड़ा शांति होती है।

इस साल का पहला सूर्य ग्रहण 10 जून को लगने जा रहा है और उस दिन अमावस्या होने के कारण इस ग्रहण का महत्व और बढ़ गया है। इस दिन शनि जयंती भी होगी और शनि वक्री चाल चल रहे होंगे। ज्योतिष में सूर्य व शनि को पिता पुत्र माना जाता है और सूर्य ग्रहण के समय शनि का वक्री होना शनि का प्रभाव बढ़ाने वाला होगा। लिहाजा जिन राशियों पर शनि की साढ़ेसाती व ढैया चल रही है, उन्हें खासतौर पर सावधान रहना होगा। इस ग्रहण के समय मृगशिरा नक्षत्र रहेगा। उस समय मंगल कर्क राशि में , राहु, बुध , सूर्य व चंद्रमा वृषभ राशि में, शुक्र मिथुन राशि में, देवगुरु बृहस्पति कुंभ राशि में, शनि मकर राशि में व केतु वृश्चिक राशि में गोचर कर रहे होंगे। 10 जून गुरुवार को लगने जा रहा साल का यह पहला सूर्य ग्रहण भारतीय समय के मुताबिक दोपहर करीब 1:42 पर शुरू होकर शाम 6:41 पर खत्म होगा। 5 घंटे के इस ग्रहण में 3 मिनट 48 सेकंड तक वलयाकार स्थिति बनेगी।

 

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इन जगहों पर नहीं लगानी चाहिए पितरों की तस्वीरें, हो सकती है भारी हानि

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कुंडली में पितृ दोष की समस्या को दूर करने के लिए कई प्रकार के उपायों के बारे में बताया गया है। इसके अतिरिक्त वास्तु दोष में भी पितरों की फोटो लगाने से पहले कुछ बातों पर ध्यान देने को कहा गया है। कई लोग अपने घर के बुजुर्गों की फोटो निधन के पश्चात् देवी- देवताओं की फोटो के साथ लगाते हैं, जिससे उन पर उनका आशीर्वाद बना रहे। शास्त्रों के अनुसार, पितरों की फोटो ईश्वर की फोटो के साथ नहीं लगाना चाहिए। इससे घर में अशुभता बढ़ती है। पितरों की फोटो सही दिशा में लगाने से घर परिवार में कृपा बनी रहती है तथा घर के सदस्यों को फायदा होता है।

वास्तु शास्त्र के अनुसार, पितरों की फोटो लगाते वक़्त इस बात का ध्यान रहें कि उनकी पूजा हमेशा दक्षिण तथा पश्चिम दिशा में होनी चाहिए। उत्तर और पूर्व दिशा को ईश्वर की दिशा माना गया है। इस दिशा में पितरों की फोटो लगाने से देवी- देवता नाराज हो जाते है।

वास्तु शास्त्र कहता है कि पूजा घर की दीवारों पर भी पितरों की फोटो नहीं लगाना चाहिए। इन फोटो को लगाने से समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

वास्तु के मुताबिक, घर के बेडरूम, सीढ़ियों और रसोई घर के स्थान पर पितरों की फोटो नहीं लगाना चाहिए। इससे घर में क्लेश होता है। यदि आप घर के बीचों बीच पितरों की फोटो लगाते हैं तो आपके मान सम्मान को हानि पहुंच सकती हैं। पितरों की फोटो ऐसी जगह पर न लगाएं जहां आपकी नजरें बार- बार पड़ती हैं इससे आपको समस्यां हो सकती है। आप घर के हॉल या मुख्य बैठक के दक्षिण दिशा में पितरों की फोटो लगा सकते हैं।

 

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