उम्र घर की -अमित सेठी

By
sadbhawnapaati
"दैनिक सदभावना पाती" (Dainik Sadbhawna Paati) (भारत सरकार के समाचार पत्रों के पंजीयक – RNI में पंजीकृत, Reg. No. 2013/54381) "दैनिक सदभावना पाती" सिर्फ एक समाचार...
7 Min Read

वैश्विक मानव समाज के ज़हन में यह प्रश्न सदियों से विराजित है , और हर निर्माणकर्ता द्वारा अपने वास्तुविद से अमूमन पूछा ही जाता है… कि
क्या उम्र होगी मेरे घर की ?

मेरा परिवार कब तक इस आशियाने में रह सकेगा ?

विचारणीय है …

अमित सेठी, आर्किटेक्ट

आर्किटेक्ट वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्तर दे इस प्रश्न का , तो जवाब यही होगा की….
निर्माण में प्रयुक्त होने वाली समस्त आधारभूत सामग्रियां जैसे रेत, सीमेंट, लोहा, पत्थर, लकड़ी इत्यादि की सामूहिक औसत उम्र ही मकान की उम्र होती है ।

वर्तमान युग में बिल्डिंग कोड्स के भारतीय मानकों अनुसार, ये उम्र करीब पचास वर्ष की होती है । ज्यादातर निर्माणों में, इस तरह मकान की मियाद तय कर सकते हैं, और इसे ही भवन की “वैज्ञानिक उम्र “ भी कह सकते हैं ।
शुद्ध वैज्ञानिक परिभाषा के अनुसार एक मकान हमारा छत्र बनकर धूप, गर्मी, बारिश, ठंड, तूफान और कभी कभी भूकंप से भी हमें सुरक्षा प्रदान करता है। ऐसा करते हुए, जो सुरक्षित समय बीतता है या बीत सकता है, सिविल इंजीनियरिंग के मापदंडों द्वारा, इस काल को भवन की अनुमानित उम्र कहते हैं ।

लेकिन, एक वास्तुविद (आर्किटेक्ट ) के अल्पकालिक अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि किसी भी निर्माण/मकान की उम्र, और दो दृष्टिकोणों द्वारा आंकी जा सकती है । वो नज़रिया व्यवहारिक भी हो सकता है और भावनात्मक भी,  जिन्हे हम एक घर की व्यवहारिक उम्र और भावनात्मक उम्र की संज्ञा प्रदान कर सकते हैं ।

एक घर की व्यवहारिक उम्र, निर्धारण में कई महत्वपूर्ण कारक होते हैं, जैसे परिवार में सदस्यों का घटना या बढ़ना, रिश्तों की परिभाषाओं का परिवर्तन, सामाजिक ताने बाने से तारतम्य, आर्थिक समीकरणों की चंचलता, इत्यादि । घर की वैज्ञानिक उम्र बाकी रहने के बावजूद हम घर त्यागने अथवा बदलने पर मजबूर हो सकते हैं , क्योंकि जीवन स्थाई समीकरणों का गुलाम नहीं होता है ।

घर के बच्चों के बाहर चले जाने पर घरों को बड़ा होते देखा है ,
सदस्यों के बढ़ जाने पर अक्सर घर को छोटा होते भी देखा है ,
कई घरों को आर्थिक तूफानों में बह जाते हुए भी देखा है ,
संपन्नता के पोषित होने पर , घरों को सेवा निवृत होते हुए भी देखा है ।

कभी नई पीढ़ी के नए नज़रिए व्यवहारिक उम्र के पूर्ण हो जाने की ख़बर देते हैं , तो कभी रिश्तों का बदल जाना घरों की उम्र कम कर जाता है । उम्र के पूरा हो जाने पर, किला ढह ही जाता है, चाहे उम्र वैज्ञानिक हो या फिर व्यवहारिक ।

एक और दृष्टिकोण पर प्रकाश डालना चाहता हूं , इन विचारों की श्रृंखला के चलते ….मेरे घर की भावनात्मक उम्र ।

क्या होती है बेजान पत्थरों से बने घर की भावनात्मक उम्र ?
ये वही भावना है, जो मकान को मकान से घर बनाती है । घर का भावनात्मक जन्म, उसकी नींव डलने से कई पहले, कल्पनाओं के साए तले हो जाता है।
घर बनाने के पश्चात तो अच्छी बुरी घटनाओं और परिस्थितियों के मिश्रण से भावनात्मक उम्र परवान चढ़ती है । घर से जुड़ाव ही एक व्यक्ति, एक परिवार को घर से एकरूप करता है । भावनाओं की अभिव्यक्ति जो होती है, ड्योडी से छत तक, रिश्तों की गर्माहट जो फैलती है, आंगन से रसोई तक, अपनापन ..जो दिखता है बगियाओं से शयनकक्षों तक, विश्वास …जो बसता है पूजा घर से तिजोरी घर तक, बस यही सब घटनाएं घर को भावनात्मक तस्वीर का रूप देती हैं । शायद यही मकान बनाने का मूल उद्देश्य भी है, और घर होने का सही मायना भी।

मकान की भावनात्मक उम्र का विस्तार, कई पीढ़ियों को आनंदित कर सकता है । मैने कई घरों को जहन में जिंदा देखा है, चाहे खंडर हो जाएं वो सब, पर मैने उन्हे अपनी उम्र जीते हुए देखा है। मैने पुरानी हवेलियों से लेकर, छोटी छोटी चालों को आज भी यादों में खड़े देखा है। मैने कई बुजुर्गों को खंडरो में भी चहचहाते हुए देखा है। आज भी वो इमारतें अपनी भावनात्मक उम्र पूरी नहीं होने का जश्न मनाती हैं, जीर्ण शीर्ण मीनारों को भावनाओं के स्तंभों पर टिके हुए भी देखा है।

आज भी कुछ मकान अपनी भावनात्मक उम्र पूरी न होने का जश्न मनाते से प्रतीत होते हैं। नींव कमज़ोर हो शायद, हौसलों से दीवारें बचाते हैं। मैंने पीढ़ी दर पीढ़ी इन मकानों को साथ निभाते भी देखा है, और कुछ अधूरे घरों को बनने से पहले ही बिखर जाते हुए भी देखा है।

जरूरतें घर को पैदा करती हैं, और फिर घर जरुरतें पूरी करता है।

यही सत्य है …
घर अगर …जरुरतें पूरी न कर पाए , तो चाहे उसकी वैज्ञानिक उम्र बाकी हो, वो किसी काम का नहीं रहता।

अंततः एक वास्तुविद होने के नाते, मैं कहना चाहता हूं, मकान सदैव वैज्ञानिक, व्यवहारिक एवं भावनात्मक सामग्री के संयोजन से ही बनाए जाना चाहिए और इनका संतुलन ही सही मायनो में निर्माण को घर बनाता है। यही मकान की प्राण प्रतिष्ठा है शायद, जो हर वास्तुविद करना चाहता है, और करता भी है। धन से पत्थर, लोहा ,लकड़ी इत्यादि तो जुटाया जा सकता है, परंतु जब तक प्रेम, विश्वास और रिश्ते उत्पन्न नहीं होते अर्थात् घर उत्पन्न नहीं होता।

इसी समझ के विकसित होने पर एक वास्तविक आर्किटेक्ट तैयार होता है …

अमित सेठी
आर्किटेक्ट

Share This Article
Follow:
"दैनिक सदभावना पाती" (Dainik Sadbhawna Paati) (भारत सरकार के समाचार पत्रों के पंजीयक – RNI में पंजीकृत, Reg. No. 2013/54381) "दैनिक सदभावना पाती" सिर्फ एक समाचार पत्र नहीं, बल्कि समाज की आवाज है। वर्ष 2013 से हम सत्य, निष्पक्षता और निर्भीक पत्रकारिता के सिद्धांतों पर चलते हुए प्रदेश, देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण खबरें आप तक पहुंचा रहे हैं। हम क्यों अलग हैं? बिना किसी दबाव या पूर्वाग्रह के, हम सत्य की खोज करके शासन-प्रशासन में व्याप्त गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार को उजागर करते है, हर वर्ग की समस्याओं को सरकार और प्रशासन तक पहुंचाना, समाज में जागरूकता और सदभावना को बढ़ावा देना हमारा ध्येय है। हम "प्राणियों में सदभावना हो" के सिद्धांत पर चलते हुए, समाज में सच्चाई और जागरूकता का प्रकाश फैलाने के लिए संकल्पित हैं।