- क्या है EWS और LIG का नियम?
- नीति की हत्या और लूपहोल का खेल –
- नीतिगत अंतर्विरोध: केंद्र की कड़ाई बनाम राज्य की ढिलाई
- पैटर्न 1: डबल डिलाइट – डेवलपरों पर मेहरबान सिस्टम, बार-बार मिल रही “चुनिंदा गरीबों” को सरकारी सौगात!
- पैटर्न 2: ‘डमी बेनेफिशियरी सिंडिकेट’ – मजदूर के नाम पर अलॉटमेंट, धनवानों के हाथ में चाबी!
- मोडस ऑपेरेंडी (खेलने का तरीका):
- यह टेबल दर्शाती है कि कैसे आरक्षित भूखंडों को ‘हॉट केक’ की तरह इन्वेस्टर के हवाले किया जा रहा है:
- नियम उल्लंघन पर सदभावना पाती के तीखे सवाल.. क्या कॉलोनी सेल और पंजीयन कार्यालय में ‘अंधेर नगरी-चौपट राजा’ का खेल चल रहा है? जब एक अलॉटमेंट हो गया तो दूसरा अलॉटमेंट और रजिस्ट्री कैसे हुई? क्या शासकीय विभाग सिर्फ रसूखदार डेवलपर्स की फाइलों पर मुहर लगाने के लिए बने है? क्या नियम विरुद्ध काम करने वालों पर कार्रवाई होगी या शासन की ‘विशेष मेहरबानी’ जारी रहेगी? ‘सार्थक विनायक’, ‘बी.आर. गोयल’ और ‘युवराज पाटीदार’ जैसे डेवलपर्स का रजिस्ट्रेशन (लाइसेंस) कॉलोनी सेल कब निरस्त करेगा?
डॉ देवेंद्र मालवीय
इंदौर। क्या आपने कभी सोचा है कि एक शहर कैसे बनता है? शहर केवल अमीरों और रसूखदारों से नहीं, बल्कि उस हर व्यक्ति से बनता है जो इसकी नींव में अपना पसीना बहाता है। इसी मानवीय सोच और समानता के अधिकार को कायम रखने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें एक विशेष नियम लागू करती हैं। जब भी कोई बिल्डर या डेवलपर नई कॉलोनी विकसित है, तो उसके लिए यह अनिवार्य होता है कि वह जमीन का एक हिस्सा समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और निम्न आय वर्ग (LIG) के लिए आरक्षित रखे।
क्या है EWS और LIG का नियम?
सरल शब्दों में समझें तो सरकार बिल्डर को कहती है कि आप अमीरों के लिए बड़े बंगले और महंगे प्लॉट तो काटिए, लेकिन उसी कैंपस में कुछ प्लॉट उन गरीबों के लिए भी सस्ते दाम पर रखिए जिनकी आय कम है।
EWS (Economically Weaker Section) एवं LIG (Low Income Group) – जिनकी सालाना आय 3 से 6 लाख रुपये के बीच है। इन प्लॉटों की कीमत बाजार भाव से काफी कम होती है ताकि एक मजदूर, ड्राइवर, छोटा दुकानदार या कम वेतन वाला कर्मचारी भी अपने परिवार को ‘छत’ दे सके। यह कोई ‘खैरात’ नहीं, बल्कि सरकार द्वारा सुनिश्चित किया गया सामाजिक न्याय है।
नीति की हत्या और लूपहोल का खेल –
केंद्र सरकार ने PMAY 2.0 (सितंबर 2024) एवं अन्य पुरानी कई योजनाओं के जरिए इन प्लॉटों / आवासों के लिए बहुत कड़े नियम बनाए हैं ताकि असली हकदार को ही फायदा पहुचें। परन्तु, मध्य प्रदेश में निजी कालोनियों के लिए प्रशासन आज भी 24 दिसंबर 2014 के पुराने राजपत्र की धूल फांक रहा है। राज्य के नियमों में जानबूझकर ऐसी ‘काँट-छाँट’ और ‘लूपहोल’ (कानूनी खामियां) छोड़ी गई हैं ? जिनका फायदा उठाकर भू-माफिया और बड़े निवेशक इन गरीबों के हिस्से की जमीन डकार रहे हैं। “भले ही राज्य के नियम पुराने हों, लेकिन वे भारत के संविधान और केंद्र की आवास नीति के मूल सिद्धांतों (Transparency & Accountability) से ऊपर नहीं हो सकते। गरीबों के हक की जमीन पर अमीरों का कब्जा किसी भी नियम के तहत ‘वैध’ नहीं ठहराया जा सकता।”
नीतिगत अंतर्विरोध: केंद्र की कड़ाई बनाम राज्य की ढिलाई
| विषय | केंद्र सरकार (PMAY 2.0/नई गाइडलाइन) | मध्यप्रदेश शासन (पुराने लूपहोल्स/2014 नियम) | माफिया को मिलने वाला लाभ (खामी) |
| लॉक-इन पीरियड (बिक्री पर रोक) | न्यूनतम 5 से 10 वर्ष: अलॉटमेंट के बाद 5 से 10 साल तक प्लॉट बेचना या ट्रांसफर करना प्रतिबंधित है। | गायब या अस्पष्ट: कई मामलों में कोई समय सीमा नहीं है, जिससे 3 दिन में भी प्लॉट बिक रहे हैं। | निवेशक तुरंत प्लॉट खरीदकर ऊंचे दामों पर पलटा (Flip) देते हैं। |
| सत्यापन (Verification) | आधार और बायोमेट्रिक अनिवार्य: एक आधार पर पूरे देश में केवल एक बार लाभ संभव है। | केवल कागजी खानापूर्ति: ‘सम्पदा’ सॉफ्टवेयर में आधार लिंक होने के बाद भी मल्टीपल रजिस्ट्रियां नहीं रुक रहीं। | एक ही व्यक्ति 19-19 प्लॉट हथियाने में कामयाब हो जाता है। |
| पात्रता की जांच | सख्त आय सीमा: परिवार की कुल आय का हलफनामा और बैंक स्टेटमेंट अनिवार्य। | स्व-घोषणा (Self-Declaration): केवल एक शपथ पत्र पर भरोसा कर लिया जाता है, भौतिक जांच शून्य है। | रसूखदार और बिल्डर खुद को ‘कागजी गरीब’ बताकर निवेश कर लेते हैं। |
| हस्तांतरण नियम | विशेष परिस्थिति: केवल मृत्यु या गंभीर स्थिति में ही कलेक्टर की अनुमति से ट्रांसफर। | ओपन ट्रांसफर: साधारण ‘हस्तांतरण पत्र’ के जरिए प्लॉट को किसी को भी बेचना आसान बना दिया गया है। | ‘पासिंग द पार्सल’ खेल धड़ल्ले से चल रहा है। |
| खरीदार की श्रेणी | केवल व्यक्तिगत परिवार: लाभ केवल परिवार के मुखिया को ही मिल सकता है। | व्यावसायिक छूट: फर्म या ‘वेंचर’ के नाम पर भी प्लॉट दर्ज होने दिए जा रहे हैं। | लोग 7-7 प्लॉट व्यावसायिक उपयोग के लिए ले रहे हैं। |
शिकायतकर्ता द्वारा साझा किए गए इनपुट्स के बाद
‘दैनिक सदभावना पाती’ ने बेहद सीमित संसाधनों में सिर्फ इंदौर के इस महाघोटाले की परतों को उघाड़ा है। शासन के पास असीमित शक्तियाँ और डिजिटल डेटा मौजूद है; यदि मंशा साफ़ हो, तो पुरे प्रदेश में इस जालसाजी की जड़ों तक पहुँचना मुश्किल नहीं है। हमारी पड़ताल में भ्रष्टाचार के जो अचूक पैटर्न सामने आए हैं, वे चीख-चीख कर गरीबों के हक की लूट की गवाही दे रहे हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए अब शिकायतकर्ता इन पुख्ता दस्तावेजों के साथ दिल्ली स्थित प्रवर्तन निदेशालय (ED) में शिकायत दर्ज करने की तैयारी में है। ताकि यह साफ हो सके कि गरीबों के नाम पर अलॉट हुए इन बेशकीमती प्लाटों के पीछे किसका काला धन लगा है और यह मनी लॉन्ड्रिंग का खेल कहा तक फैला है।
पैटर्न 1: डबल डिलाइट – डेवलपरों पर मेहरबान सिस्टम, बार-बार मिल रही “चुनिंदा गरीबों” को सरकारी सौगात!
नियम कहता है कि ईडब्ल्यूएस/एलआईजी योजना का लाभ जीवन में केवल एक बार ही लिया जा सकता है, ताकि हर गरीब को छत मिल सके। लेकिन इंदौर में रसूखदार डेवलपर्स और ‘कलेक्टर कार्यालय के कॉलोनी सेल’ के बीच ऐसी “जुगलबंदी” बैठी है कि नियम-कायदे दफ्तर की फाइलों में दफन हो गए हैं। यहाँ कुछ ‘खास’ लोग इतनी बार गरीब बनते हैं कि शासन उन्हें नई कॉलोनी में एक नया आरक्षित प्लॉट गिफ्ट कर देता है। यह इत्तेफाक नहीं, बल्कि गरीबों के हक की जमीन पर “सुनियोजित डकैती” है।
देखिये, कैसे एक ही नाम पर बार-बार पिघल रहा है शासन का दिल:
केस 1 – मंजय चौहान: मंजय चौहान पिता जयमंगल चौहान ने दिनांक 03/03/2023 को सार्थक विनायक रियल बिल्ट की कॉलोनी ‘सिंगापुर राधा कुंज’ का आरक्षित भूखंड E-04 अलॉट (रजिस्ट्री) करवाया। आश्चर्य की बात देखिए, इसी डेवलपर के अगले प्रोजेक्ट “सिंगापुर मॉडर्न सिटी-ए” में दिनांक 25/02/2025 को भूखंड क्रमांक E-43 शासन से पुनः अलॉट कराकर उसकी रजिस्ट्री भी करा ली। क्या सिस्टम को दो साल में एक ही नाम नहीं दिखा?</p>
केस 2 – शैफाली श्रीवास्तव: शैफाली ने दिनांक 07/11/2022 को मेसर्स सार्थक विनायक रियल बिल्ट की कॉलोनी “द ग्रैंड मराठा” का आरक्षित भूखंड L-15 अलॉट करवाया। इसी डेवलपर के अगले प्रोजेक्ट “सिंगापुर ब्रिटिश ग्रैंड” में दिनांक 22/05/2024 को भूखंड क्रमांक L-02 शासन से पुनः अलॉट करा लिया। शासन की लिस्ट में शायद इनका नाम ‘परमानेंट वीआईपी गरीब’ की श्रेणी में दर्ज है।</p>
केस3 – निशा ने दिनांक 19/09/2022 को मेसर्स सार्थक विनायक रियल बिल्ट की कॉलोनी “द ग्रैंड मराठा” का आरक्षित भूखंड L-07 अलॉट करवाया। खेल देखिये—इस भूखंड को महज 14 दिन बाद 03/10/2022 को बेच दिया। इसके बाद फिर इसी ग्रुप सार्थक विनायक रियल बिल्ट के अगले प्रोजेक्ट “सिंगापुर मॉडर्न सिटी-ए” में भूखंड क्रमांक L-13, दिनांक 14/02/2025 को शासन से पुनः अलॉट करवा लिया। इसे कहते हैं आपदा में अवसर!</p>
केस 4 – कैलाश लड़ईया: कैलाश लड़ईया पिता भैय्यालाल ने बी.आर. गोयल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड की कॉलोनी ‘बीआरजी हिल व्यू-2’ का दिनांक 24/11/2022 को आरक्षित भूखंड क्रमांक E-08 अलॉट करवाया। जब मन नहीं भरा, तो इसी ग्रुप की अगली कॉलोनी ‘बीआरजी हिल व्यू-2 एक्सटेंशन’ में दिनांक 12/08/2024 को आरक्षित भूखंड क्रमांक E-03 पुनः अलॉट करवा लिया।</p>
केस 5 – चन्द्रकला ने युवराज पाटीदार की कॉलोनी ‘अवध वाटिका’ में दिनांक 27/02/2020 को आरक्षित भूखंड क्रमांक 07 अलॉट करवाया। फिर इसी डेवलपर की अगली कॉलोनी ‘अवध होम्स’ में दिनांक 17/08/2023 को आरक्षित भूखंड क्रमांक EWS-12 शासन से पुनः अलॉट करवा लिया।</p>
पैटर्न 2: ‘डमी बेनेफिशियरी सिंडिकेट’ – मजदूर के नाम पर अलॉटमेंट, धनवानों के हाथ में चाबी!
यह भू-माफियाओं का सबसे शातिर और सबसे ज्यादा खेला जाने वाला खेल है, जहाँ नियम और गरीबी दोनों का सरेआम मजाक उड़ाया जाता है। इसमें माफिया खुद को कानून की नज़रों से बचाने के लिए ‘मुखौटों’ (Dummies) का इस्तेमाल करता है। इस खेल में चेहरा गरीब का होता है, लेकिन पैसा और दिमाग माफिया का।
मोडस ऑपेरेंडी (खेलने का तरीका):
कठपुतली की तलाश, सबसे पहले माफिया अपने अधीन काम करने वाले मजदूरों, ड्राइवरों या बाहरी शहरों के गरीबों को पकड़ते हैं। इन डमी लोगों के दस्तावेजों (आधार, फोटो) का उपयोग कर ‘प्रथम अलॉटमेंट’ की फाइल कलेक्टर कार्यालय के कॉलोनी सेल में दौड़ाई जाती है। चूंकि ये दिखने में ‘पात्र’ लगते हैं, इसलिए इन्हें आसानी से अलॉटमेंट मिल जाता है। जैसे ही अलॉटमेंट लेटर हाथ में आता है, माफिया के एजेंट सक्रिय हो जाते हैं और शहर के ‘सक्षम खरीदारों’ (Investors) को ढूंढ लाते हैं। यहाँ असली जादू शुरू होता है—उस मजदूर के नाम से सीधे उस धनवान ग्राहक के नाम पर रजिस्ट्री करवा दी जाती है। बेचारे मजदूर को हाथ में चंद हजार रुपये थमा दिए जाते हैं, जबकि माफिया और बिचौलिए लाखों का ‘मुनाफा’ डकार कर किनारे हो जाते हैं।
खुलासा: चंद घंटों और दिनों में कैसे बदल जाते हैं गरीबों के भूखंडों के मालिक?
यह टेबल दर्शाती है कि कैसे आरक्षित भूखंडों को ‘हॉट केक’ की तरह इन्वेस्टर के हवाले किया जा रहा है:
| कॉलोनी का नाम | आरक्षित प्लॉट नंबर | ‘डमी’ खरीदार (पहली रजिस्ट्री) | ‘असली’ खरीदार (दूसरी रजिस्ट्री) | समय का अंतर |
| ट्रेजर ड्रीम्स ईस्ट | TD-E-EWS-028 | आशा ठाकुर (07-03-2024) | सरिता चौहान (09-03-2024) | मात्र 2 दिन |
| रूद्र ग्रीन्स | E-1 (EWS) | आकाश सेन (07-07-2023) | उमाशंकर धाकड़ (10-07-2023) | मात्र 3 दिन |
| ओयस्टर ग्रीन माउन्ट | L-04 (LIG) | आनंद बारिया (08-10-2025) | अरुण अग्रवाल (13-10-2025) | मात्र 5 दिन |
| रुद्र ग्रीन्स | E-5 (EWS) | करण सेन (05-06-2023) | जितेन्द्र चौहान (09-06-2023) | मात्र 4 दिन |
| आनंद ग्रीन्स | L-1 (LIG) | उमराव सिंह (19-12-2023) | कमल/सतीश (01-01-2024) | मात्र 12 दिन |
| डिवाइन पार्क | E-20 (EWS) | कमलेश भट्ट (22-09-2025) | दीपिका (06-10-2025) | मात्र 14 दिन |
नियम उल्लंघन पर सदभावना पाती के तीखे सवाल..
क्या कॉलोनी सेल और पंजीयन कार्यालय में ‘अंधेर नगरी-चौपट राजा’ का खेल चल रहा है? जब एक अलॉटमेंट हो गया तो दूसरा अलॉटमेंट और रजिस्ट्री कैसे हुई? क्या शासकीय विभाग सिर्फ रसूखदार डेवलपर्स की फाइलों पर मुहर लगाने के लिए बने है? क्या नियम विरुद्ध काम करने वालों पर कार्रवाई होगी या शासन की ‘विशेष मेहरबानी’ जारी रहेगी? ‘सार्थक विनायक’, ‘बी.आर. गोयल’ और ‘युवराज पाटीदार’ जैसे डेवलपर्स का रजिस्ट्रेशन (लाइसेंस) कॉलोनी सेल कब निरस्त करेगा?
नियम कहते है – म.प्र. नियम 1998/2014: धाराएं स्पष्ट कहती हैं कि ऐसे गंभीर मामलों में तत्काल अलॉटमेंट शून्य होने चाहिए और डेवलपर का लाइसेंस निरस्त कर उसे ब्लैकलिस्ट करना चाहिए।
शुरुआती 2 बड़े पैटर्न आपने देखे, बाकी के चौंकाने वाले खुलासे पढ़िए कल भाग-2 में..


