- मजबूरी में होटल पहुँचे। वहाँ चाय के दाम देखकर लगा कि अब गैस नहीं, चाय ही विलासिता की वस्तु बन गई है। चाय वाले ने मुस्कुराते हुए कहा—“सर, गैस की किल्लत में हम ही देश की असली रीढ़ हैं।” मैंने मन ही मन सोचा, सच में, अर्थव्यवस्था तो यही संभाल रहा है।
- दूसरे पड़ोसी ने तकनीकी समाधान दिया—“इलेक्ट्रिक कुकर ले लो।” मैंने पूछा—“बिजली का क्या भरोसा?” वह बोले—“बिजली गई तो ऐप से खाना मंगा लो।” अब समझ आया कि रसोई धीरे-धीरे चूल्हे से मोबाइल ऐप में स्थानांतरित हो रही है।
डॉ. गोपालदास नायक, खंडवा
सुबह की शुरुआत चाय से हो, यह हमारे जीवन का अनलिखा नियम है। लेकिन उस दिन जैसे ही रसोई में प्रवेश किया, चूल्हे ने सीधा विरोध दर्ज कर दिया—गैस खत्म! लगा जैसे घर में नहीं, पूरे देश में आपातकाल लग गया हो। पत्नी ने बड़ी सहजता से कहा—“गैस खत्म हो गई है।” मैंने तुरंत प्रतिक्रिया दी, मानो कोई मंत्री घोटाले पर सफाई दे रहा हो—“अरे, अभी तो भरवाया था!” पत्नी बोली—“हाँ, लेकिन आपकी दिन में चार-चार बार चाय और रात के प्रयोगात्मक पकवानों ने इसे समय से पहले शहीद कर दिया।”
अब असली संघर्ष शुरू हुआ—गैस एजेंसी को फोन लगाना। फोन उठते ही वही रिकॉर्डेड आवाज—“आपकी कॉल हमारे लिए महत्वपूर्ण है…” यह सुनकर मन में आया कि अगर इतनी ही महत्वपूर्ण होती, तो सिलेंडर भी समय पर मिल जाता। बड़ी मशक्कत के बाद जवाब मिला—“सर, अभी थोड़ी किल्लत है, तीन-चार दिन लगेंगे।” मैंने दुखी स्वर में कहा—“भाई साहब, घर में चाय बंद हो गई है, यह तो राष्ट्रीय संकट है।” उधर से ठंडा जवाब आया—“सर, बाहर होटल में पी लीजिए।”
मजबूरी में होटल पहुँचे। वहाँ चाय के दाम देखकर लगा कि अब गैस नहीं, चाय ही विलासिता की वस्तु बन गई है। चाय वाले ने मुस्कुराते हुए कहा—“सर, गैस की किल्लत में हम ही देश की असली रीढ़ हैं।” मैंने मन ही मन सोचा, सच में, अर्थव्यवस्था तो यही संभाल रहा है।
घर लौटे तो पत्नी ने नया सुझाव दिया—“क्यों न लकड़ी का चूल्हा जला लें?” मैंने आधुनिकता का हवाला दिया—“हम 21वीं सदी में हैं!” पत्नी बोली—“तो फिर भूखे रहो!” अब आधुनिकता और पेट के बीच युद्ध छिड़ गया और अंततः पेट जीत गया। हम पार्क से टहनियाँ इकट्ठा करने निकल पड़े। एक सज्जन ने टोका—“यह सरकारी संपत्ति है।” मैंने जवाब दिया—“सरकारी तो हम भी हैं, लेकिन आज हम ही जल रहे हैं।”
घर आकर चूल्हा जलाया गया। धुआँ ऐसा उठा जैसे चुनावी वादे हवा में उड़ रहे हों। आँखों से आँसू निकलने लगे—भावुकता के नहीं, धुएँ के कारण। पत्नी ने तंज कसा—“अब समझ में आई गैस की कीमत?” मैंने सिर हिलाकर स्वीकार कर लिया कि गैस केवल ईंधन नहीं, घर की शांति का आधार है।
मोहल्ले में भी हालात कम रोचक नहीं थे। हर घर में एक ही सवाल—“तुम्हारा सिलेंडर आया क्या?” ऐसा लग रहा था जैसे किसी परीक्षा का परिणाम आने वाला हो। एक पड़ोसी ने गर्व से बताया—“हमारे पास तो दो सिलेंडर हैं।” उनकी मुस्कान देखकर लगा कि जैसे उन्होंने कोई चुनाव जीत लिया हो। मन में विचार आया कि देश का असली अमीर वही है जिसके पास अतिरिक्त सिलेंडर हो।
दूसरे पड़ोसी ने तकनीकी समाधान दिया—“इलेक्ट्रिक कुकर ले लो।” मैंने पूछा—“बिजली का क्या भरोसा?” वह बोले—“बिजली गई तो ऐप से खाना मंगा लो।” अब समझ आया कि रसोई धीरे-धीरे चूल्हे से मोबाइल ऐप में स्थानांतरित हो रही है।
गैस की किल्लत ने घर की राजनीति को भी नई दिशा दे दी। पहले जो बातें मामूली हुआ करती थीं, अब बड़े मुद्दे बन गईं—“तुमने समय पर बुकिंग क्यों नहीं की?” “तुमने बताया क्यों नहीं कि खत्म होने वाली है?” माहौल ऐसा था जैसे संसद का विशेष सत्र चल रहा हो और हर कोई अपनी-अपनी पार्टी का पक्ष रख रहा हो।
तीसरे दिन आखिरकार संदेश आया—“आपका सिलेंडर आज डिलीवर होगा।” यह संदेश किसी प्रेम पत्र से कम नहीं लगा। पूरा परिवार दरवाजे पर ऐसे बैठ गया जैसे बारात आने वाली हो। जैसे ही डिलीवरी वाला आया, उसका स्वागत किसी वीआईपी से कम नहीं हुआ। सिलेंडर लगते ही पत्नी ने तुरंत चाय बनाई। मैंने पहला घूँट लिया तो महसूस हुआ कि यह सिर्फ चाय नहीं, बल्कि संघर्ष की जीत का स्वाद है।
इस पूरी घटना ने एक बड़ा सत्य सिखा दिया कि घर की असली शक्ति रसोई में होती है और गैस सिलेंडर वही विकास है जिसके बिना जीवन ठहर जाता है। देश में चाहे कितनी ही बड़ी समस्याएँ क्यों न हों, लेकिन अगर घर में गैस खत्म हो जाए तो वही सबसे बड़ी समस्या बन जाती है। क्योंकि अंततः सच यही है—जहाँ गैस है, वहीं शांति है, और जहाँ नहीं, वहाँ केवल बहस ही बहस है।


