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Indore Jhanki – 2 साल बाद फिर परंपरा पहियों पर

इंदौर में आज मचेगी झांकियों की धूम 
शक्ति यादव.
विश्व प्रसिद्ध अनंत चतुर्दशी चल समारोह को लेकर इंदौर पुलिस और जिला प्रशासन ने तैयारियां लगभग पूरी कर ली हैं। पूरे झांकी मार्ग को 6 सेक्टरों में बांटा गया है। लगभग ढाई हजार से अधिक सुरक्षा बल तैनात रहेगा, वहीं 80 हाईराइज बिल्डिंग से जवान निगरानी करेंगे।
अखाड़े में धारदार हथियार लेकर चलना पूर्णत: प्रतिबंधित रहेगा अखाड़े के खलीफा तलवार को केवल प्रतीक के रूप में लेकर जुलूस में रहेंगे। तलवार के अतिरिक्त बनेठी और एक पटा प्रत्येक अखाड़े को लेकर चलने की अनुमति रहेगी। यदि किसी भी तरह के घातक हथियार किसी के पास पाया जाता है तो पुलिस द्वारा उसे तत्काल रूप से जब्त किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश अनुसार डीजे पर प्रतिबंध पूर्व की तरह इस वर्ष भी जारी रहेगा। झांकी एवं अखाड़ा प्रबंधक इस बात को सुनिश्चित करेंगे कि उनके साथ प्रोसेशन में आगे बढ़ने वाले साथी किसी भी तरह के मादक एवं नशीले पदार्थों का सेवन ना करें। झांकी मार्ग पर प्रोसेशन के सुचारू रूप से आगे बढ़ने के लिए झांकी एवं अखाड़ा आपस में सद्भाव बनाए रखेंगे।
झांकियों का यह होगा क्रम
चल समारोह में निकलने वाली झांकियों का क्रम पूर्व वर्षों की भांति निम्न अनुसार रहेगा- 1.खजराना गणेश मंदिर, 2. इंदौर विकास प्राधिकरण, 3. नगर निगम, 4.होप टेक्सटाईल (भण्डारी मिल), 5. कल्याण मिल, 6.मालवा मिल, 7. हुकुमचंद मिल, 8. स्वदेशी मिल, 9. राजकुमार मिल, 10. स्पूतनिक ट्यूटोरियल एकेडमी, 11. जय हरसिद्धी माँ सेवा समिति, 12. श्री शास्त्री कार्नर नवयुवक मंडल।
इस बार क्या खास
2 साल बाद पूरा शहर उत्साह के साथ तैयार हैं. मिलो ने अपनी तैयारियां पूरी कर ली हैं, हर मिल की दो से तीन थीम पर झांकियां तैयार हैं, इनके साथ चलने वाले अखाड़े भी चुस्त हैं. आज शाम 7:00 बजे चिकमंगलूर चौराहे पर कलेक्टर मनीष सिंह द्वारा झांकियों का पूजन कर श्रीगणेश किया जाएगा.
झांकी का इतिहास और वर्तमान जो जानना है आपके लिए जरुरी 
देश का सबसे स्वच्छ शहर दो और चीजों के लिए प्रसिद्ध है, एक यहां का खाना और दूसरा शहर के त्यौहार, चाहे फिर वह गैर हो या फिर झांकियां. सन 1924 में शुरू की गई इस झांकी परंपरा को आज भी इंदौर पूरी शिद्दत से निभा रहा है.सन 1924 में सेठ हुकुमचंद मिल द्वारा झांकी परंपरा की शुरुआत हुई, उस समय झांकी को मिल मजदूरों द्वारा तैयार किया जाता था एवं उत्साह के साथ बैलगाड़ी पर झांकियां निकाली जाती थी, धीरे-धीरे यह परंपरा हो गया इसमें मालवा मिल, स्वदेशी मिल, कल्याण मिल, राजकुमार मिल आदि भी शामिल होने लगे बाद में प्रशासन ने भी इसे अपना लिया और नगर निगम एवं आईडीए ने भी अपनी झांकियां तैयार कर ली तब से हर अनंत चतुर्दशी पर्व धूमधाम से झांकियां निकाली जा रही है.

आसन नहीं थी डगर 
इन झांकियों को बनाना भी एक कठिन कार्य है. इन्हें बनाने के लिए कुशल कारीगरों की टीम डेढ़ से दो महीने तक अपना सर्वस्व देती है. समय के साथ झांकियों की बनावट में भी बदलाव आया, जो झांकियां पहले बैलगाड़ी पर निकाली जाती थी अब बड़े बड़े वाहनों पर सुसोभित है.

इलेक्ट्रिकल रोशनी ने अब लालटेन एवं गैस बत्ती की जगह ले ली. झांकियों को बनाने में अहम समस्या पूंजी भी है, एक झांकी को तैयार करने में छह से सात लाख का खर्च आता है हालांकि नगर निगम एवं आईडीए द्वारा कुछ सहायता राशि प्रदान की जाती है, जो कि पर्याप्त नहीं होती.
पहले झांकियां मिल में तैयार हो जाती थी लेकिन अब इसके लिए अलग से शेड की आवश्यकता होती है, जिसमें लागत लगती है. परंतु उत्साह के आगे सारी परेशानियां फीकी है.
इंदौर अपनी झांकियों को लेकर इतना उत्साहित रहता है कि आपातकाल के समय भी यह परंपरा निरंतर जारी रही. वर्ष 2020, 2021 कोरोना का दौर रहा, जिसकी मार यहां भी देखने को मिली, और 2 साल झांकियां नहीं निकल पाई. परंतु इस बार तीन गुना उत्साह के साथ शहर तैयार है अपनी संस्कृति को दर्शाने के लिए.
क्या होता है इन झांकियों  में ?
झांकियां भावनाओं को दिखाने का सबसे सटीक माध्यम मालूम होता है. इन झांकियों की प्रत्येक वर्ष एक थीम होती है, जो कि राष्ट्रीय, सामाजिक, धार्मिक मुद्दों को दर्शाती है.
यह झांकियां सदभावना का प्रतीक है, यहां न केवल धार्मिक कहानियां दर्शाई जाती हैं बल्कि आम जनजीवन में चल रही विसंगतियों को भी दिखाया जाता है. इन झांकियों के साथ अखाड़े भी मौजूद होते हैं जो भारतीय परंपरा की पुरातन पहलू को अग्रसर रखते हैं. यह अखाड़े आत्मरक्षा की प्राथमिक शाला हैं.
10 वर्ष से लेकर 60 साल तक के कलाकार विशेष साधनों से करतब दिखाते हैं, परंतु इन सब के गर्भ में बसता है आत्मरक्षा का वह गुण जो हर किसी के लिए जरूरी है. अखाड़ों द्वारा की जाने वाली करतब बंदिश में यह सिखाया जाता है कि कैसे एक निहत्थे व्यक्ति हथियारबंद व्यक्तियों से लड़ सकता है. इसके अलावा बनेठी, पटा, गदका फरी, चक्री आदि का भी उपयोग किया जाता है, ये अखाड़े उनके लिए विशेष अभ्यास करते हैं, और अपना सर्वश्रेष्ठ देते हैं.
इनका कहना है.
झांकी में शामिल होने वाले रामनाथ अखाड़े के मुन्ना जी का हना है कि “प्रशासन द्वारा सहयोग किया जाता है, लेकिन अब हथियार प्रदर्शन पर रोक लगा दी है, तो हम अपनी परम्परा को उस तरह से नही दिखा पाते जैसे पहले किया करते थे”
कल्याण मिल गणेश उत्सव समिति के अध्यक्ष हरनाम सिंह धारीवाल कहते हैं “प्रशासन की तरफ से देने वाली सहायता राशि पर्याप्त नही होती, पहले हमे मीलों से सारी सहायता प्राप्त हो जाती थी पर अब हमें खुद के खर्चों पर शेड बनाने पड़ते है जिसमे खर्च आता है, जब हमने यह मुद्दा कलेक्टर के सामने उठाया तो उन्होंने यह आश्वासन दिया की अगले सालों में दी जाने वाली सहायता दो गुना कर दी जाएगी”
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