कविता – हमने अपना आशियाना जला के, औरों के चिराग रोशन किए हैं।

Rajendra Singh
By
Rajendra Singh
पर्यावरण संरक्षण एवं जैविक खेती के प्रति प्रशिक्षण
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हमने अपना आशियाना जला के,
औरों के चिराग रोशन किए हैं।
अपने चिलमन में आग लगा के,
जहाँ रोशन किए हैं।

धूप सहकर भी छाँव दी सबको,
अपने हिस्से के साये जला के।
राहों में फूल बिछा दिए हमने,
अपने पैरों के छाले छुपा के।

साँसों में राखों की खुशबू लिए,
हर जलते घर को बहारें दी हैं।
ख़ुद तन्हाइयों में डूबे रहे,
औरों को महफ़िलें सौंपी हैं।

हम चिराग़ों की क़िस्मत लिए थे,
जलना था, और रोशनी बन गए।
ख़ुद की हसरतें राख कर डालीं,
औरों के सपनों के रंग बन गए।

साए में अपने उन्हें रख लिया,
जो अंधेरों से घबराए थे।
ख़ुद के हिस्से की रोशनी देकर,
चिराग उनके जलाए थे।

हर दर्द को हँसी में ढाल कर,
हमने खुशियों के गीत गाए।
जलकर भी बुझने ना पाए,
बस औरों के लिए जलते जाए।

कभी आँधी बने, कभी आँच भी,
कभी मोम की तरह पिघलना पड़ा।
हर हाल में हम मुस्कुराए,
अपनी हस्ती को जलाना पड़ा।

हमने अपना आशियाना जला के,
औरों के चिराग रोशन किए हैं।
अपने चिलमन में आग लगा के,
जहाँ रोशन किए हैं।

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