- EWS-LIG महाघोटाला – भाग 3
- पैटर्न 7: ‘वेंचर/फर्म’ के नाम पर कब्जा – गरीबों के हक पर ‘व्यावसायिक’ डाका, क्या गरीबों के प्लॉट अब कंपनियों की जागीर हैं?
- थोक निवेश’ का कच्चा चिट्ठा:
- पैटर्न 8: ‘रातों-रात अमीर’ होने का करिश्मा – शपथ पत्र का मजाक
- बड़ा खुलासा: ‘गरीबी’ के चोले में छिपे रसूखदार
- प्रशासन से सीधे सवाल: (श्री शिवाय वेंचर): जब ‘F’ श्रेणी (फर्म) के पैन कार्ड पर व्यावसायिक संस्था ‘श्री शिवाय वेंचर’ थोक में प्लॉट खरीद रही थी, तो पंजीयन विभाग ने इसे व्यक्तिगत आवास मानकर हरी झंडी कैसे दी?
- सदभावना अपील – कब थमेगा गरीबों के हक का यह ‘व्यावसायिक कत्लेआम’?
- हम इन सारे मामलों की शिकायत Enforcement Directorate (ED) में करेंगे – आर.के. सिंह (शिकायतकर्ता)
EWS-LIG महाघोटाला – भाग 3
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Property in Indore – ‘दैनिक सद्भावना पाती’ के पिछले दो अंकों में आपने उन अलग-अलग पैटर्न्स को पढ़ा, जिनके जरिए इंदौर के रसूखदारों और बिल्डरों ने गरीबों के हक पर डाका डाला। आज की कड़ी में हम उस ‘अदृश्य जालसाजी’ की परतों को खोल रहे हैं, जहाँ प्रशासन की रहस्यमयी चुप्पी और भू-माफियाओं की चालाकी ने मिलकर एक भ्रष्ट समानांतर व्यवस्था खड़ी कर दी है। यह केवल जमीनों की हेराफेरी नहीं, बल्कि डिजिटल इंडिया के दौर में आधार कार्ड, झूठे शपथ पत्रों और सरकारी सॉफ्टवेयर ‘सम्पदा’ की सुरक्षा को दी गई सीधी चुनौती है।
आज के विशेष खुलासे में पढ़िए — कैसे ‘वेंचर और फर्म्स’ के नाम पर गरीबों के प्लॉटों का ‘व्यावसायिक वध’ किया गया और कैसे ‘रातों-रात अमीर’ होने का करिश्मा दिखाकर सरकारी शपथ पत्रों का मजाक उड़ाया गया। क्या गरीबों के लिए आरक्षित जमीन अब रसूखदार कंपनियों की जागीर बन चुकी है? पढ़िए इस महाघोटाले की तीसरी और सबसे विस्फोटक कड़ी।
पैटर्न 7: ‘वेंचर/फर्म’ के नाम पर कब्जा – गरीबों के हक पर ‘व्यावसायिक’ डाका, क्या गरीबों के प्लॉट अब कंपनियों की जागीर हैं?
इंदौर के भू-माफियाओं ने जालसाजी का एक नया और खतरनाक तरीका खोज निकाला है। नियम कहते हैं कि आरक्षित श्रेणी (EWS/LIG) के भूखंड केवल उस गरीब व्यक्ति के लिए हैं जिसके पास अपना घर नहीं है। लेकिन यहाँ ‘श्री शिवाय वेंचर’ (Shri Shivay Venture Indore) जैसी व्यावसायिक संस्थाओं ने इन भूखंडों को ‘थोक’ में खरीदकर इसे एक कमर्शियल वेंचर बना दिया है। ‘ओयस्टर रिट्रीट-2’ कॉलोनी (Oyster Retreat 2 Colony) में जो खेल खेला गया, वह प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गहरा कलंक है।
थोक निवेश’ का कच्चा चिट्ठा:
| प्लॉट क्रमांक | प्रथम अलॉटी (जिससे खरीदा) | प्रथम रजिस्ट्री/अलॉटमेंट तिथि | मूल खरीदार का नाम PAN कार्ड (AFKFS3431E) |
द्वितीय रजिस्ट्री/हस्तांतरण तिथि |
| E-01 | अमित पटेल | 30-08-2024 | श्री शिवाय वेंचर (मुकेश चौहान) | 1/12/2025 |
| E-04 | कृष्णा कुमार शर्मा | 23-09-2024 | श्री शिवाय वेंचर (मुकेश चौहान) | 20-08-2025 |
| E-06 | अमित कुमार बागड़ी | 30-08-2024 | श्री शिवाय वेंचर (मुकेश चौहान) | 20-08-2025 |
| E-13 | राहुल सोलंकी | 30-08-2024 | श्री शिवाय वेंचर (मुकेश चौहान) | 20-08-2025 |
| L-02 | मुकेश मंडलोई | 23-09-2024 | श्री शिवाय वेंचर (मुकेश चौहान) | 20-08-2025 |
| L-04 | अनुराग बादर | 30-08-2024 | श्री शिवाय वेंचर (मुकेश चौहान) | 20-08-2025 |
| L-06 | कुलदीप धीमान | 27-09-2024 | श्री शिवाय वेंचर (मुकेश चौहान) | 13-10-2025 |
टेबल यह साबित करता है कि यह कोई सामान्य खरीदी-बिक्री नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘बल्क डील’ थी। यही वह बिंदु है जहाँ नियम टूटते हैं। EWS/LIG के प्लॉट केवल ‘पात्र व्यक्तियों’ (Individual Persons) के लिए होते हैं ताकि वे अपना घर बना सकें। किसी ‘फर्म’ या ‘कंपनी’ (F-श्रेणी पैन धारक) को ये प्लॉट हस्तांतरित करना सामाजिक न्याय और सरकारी नीति का सीधा उल्लंघन है, क्योंकि कंपनियां ‘गरीब’ या ‘बेघर’ की श्रेणी में नहीं आतीं।
केंद्र और राज्य सरकार की आवास नीतियों के अनुसार, आरक्षित भूखंड केवल ‘व्यक्तिगत आवास’ के लिए हैं। किसी कंपनी या ‘वेंचर’ द्वारा व्यावसायिक लाभ के लिए इन्हें खरीदना कानूनन अपराध है। पड़ताल में सामने आया कि जिन अलॉटियों के नाम पर पहले प्लॉट दर्ज थे, उन्होंने मात्र कुछ ही महीनो में श्री शिवाय वेंचर (मुकेश चौहान) बेच दिए। यह सीधे तौर पर ‘बेनामी संपत्ति’ का मामला है, जहाँ चेहरा किसी और का है और पैसा किसी व्यावसायिक वेंचर का लगा है।
पैटर्न 8: ‘रातों-रात अमीर’ होने का करिश्मा – शपथ पत्र का मजाक
पहले ‘गरीब’ बनकर प्लॉट लिया, फिर उसी कॉलोनी में थोक में खरीदे अन्य भूखंड!
यह पैटर्न भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा है। इसमें व्यक्ति पहले शासन के सामने ‘गरीब और कम आय’ होने का शपथ पत्र देकर एक आरक्षित प्लॉट अलॉट करवाता है। लेकिन चमत्कार देखिए—महज कुछ ही महीनों के भीतर उसी व्यक्ति के पास इतना पैसा आ जाता है कि वह उसी कॉलोनी में अन्य कई आरक्षित भूखंड ‘कैश’ में खरीद लेता है। क्या प्रशासन इन शपथ पत्रों की जांच करने की जहमत उठाएगा?
बड़ा खुलासा: ‘गरीबी’ के चोले में छिपे रसूखदार
| मामला | नाम एवं विवरण | पहला कदम (गरीब बनकर अलॉटमेंट) | दूसरा कदम (अमीर बनकर थोक खरीदी) | समय का अंतर |
| केस 1 | राकेश साहा | 19 अप्रैल 2024: ममता गोल्डन वैली में प्लॉट नं. 09 अलॉट कराया। | जनवरी 2025: इसी कॉलोनी में 3 अन्य भूखंड (नंबर 7, 8, 4) खरीद लिए। | मात्र 8 महीने |
| केस 2 | दिव्या | 20 सितम्बर 2023: गोल्ड सिटी-02 में EWS-01 प्लॉट अलॉट कराया। | अप्रैल 2025: इसी कॉलोनी में 2 अन्य LIG भूखंड (L-15, L-16) खरीद लिए। | 17 महीने |
| केस 3 | मुकेश सालवे | मार्च 2023: अन्य लोगों/अलॉटी से 2 LIG प्लॉट (L-995, L-996) खरीदे। | 16 अक्टूबर 2024: फिर भी ‘गरीब’ बनकर शासन से L-984 अलॉट करवा लिया। | विचित्र स्थिति |
प्रशासन से सीधे सवाल:
(श्री शिवाय वेंचर): जब ‘F’ श्रेणी (फर्म) के पैन कार्ड पर व्यावसायिक संस्था ‘श्री शिवाय वेंचर’ थोक में प्लॉट खरीद रही थी, तो पंजीयन विभाग ने इसे व्यक्तिगत आवास मानकर हरी झंडी कैसे दी?
(श्री शिवाय वेंचर): जब ‘F’ श्रेणी (फर्म) के पैन कार्ड पर व्यावसायिक संस्था ‘श्री शिवाय वेंचर’ थोक में प्लॉट खरीद रही थी, तो पंजीयन विभाग ने इसे व्यक्तिगत आवास मानकर हरी झंडी कैसे दी?
(रातों-रात अमीर): राकेश साहा जैसे लोग, जो 8 महीने पहले ‘गरीब’ बनकर अलॉटमेंट लेते हैं, उनके पास अचानक लाखों की ‘थोक खरीदी’ का फंड कहाँ से आया? क्या इनके पहले शपथ पत्र की जांच नहीं होनी चाहिए?
नियमों की धज्जियां और प्रशासन की विफलता: कम आय का झूठा शपथ पत्र देकर सरकारी लाभ लेना और फिर तुरंत अन्य संपत्तियां खरीदना IPC की धारा 181/193 के तहत सीधा अपराध और मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA) का गंभीर मामला है, जिसकी जांच जरूरी है कि एक साथ कई प्लॉट के लिए करोड़ों का फंड कहाँ से आया। साथ ही, आरक्षित भूखंडों को किसी व्यावसायिक ‘वेंचर’ या कंपनी के नाम पर खरीदना ‘हितों के टकराव’ (Conflict of Interest) और म.प्र. नियम 2014 (नियम 11) का खुला उल्लंघन है। मुकेश सालवे जैसे रसूखदारों को पहले से प्लॉट होने के बावजूद दोबारा आवंटन करना स्क्रूटनी कमेटी की भारी विफलता है। शासन को इन सभी मामलों में आय प्रमाण पत्रों की फोरेंसिक जांच कराकर तत्काल FIR दर्ज करनी चाहिए।
सदभावना अपील – कब थमेगा गरीबों के हक का यह ‘व्यावसायिक कत्लेआम’?
यह केवल जमीनों की हेराफेरी का मामला नहीं है, बल्कि उन हजारों बेघर आंखों के सपनों के साथ हुआ विश्वासघात है, जो ताउम्र पाई-पाई जोड़कर एक अदद छत की उम्मीद करते हैं। आज जब रसूखदार बिल्डर और ‘कागजी गरीब’ मिलकर इन आरक्षित जमीनों पर अपनी तिजोरियां भर रहे हैं, तो सवाल केवल भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के साथ हुए भद्दे मजाक का है। क्या इंदौर का विकास गरीबों की बस्तियों को उजाड़कर या उनके हक को निगलकर किया जाएगा? ‘दैनिक सद्भावना पाती’ शासन और प्रशासन से मांग करता है कि गरीबों के कोटे की जमीन को निवेश का जरिया बनाने वाले कॉलोनाइजर्स के लाइसेंस तत्काल रद्द किए जाएं और उन पर कड़ी आपराधिक धाराएं लगाई जाएं। साथ ही, भविष्य में ऐसी धोखाधड़ी रोकने के लिए EWS/LIG आवंटन प्रक्रिया को पूरी तरह बायोमेट्रिक (आधार फिंगरप्रिंट) से लिंक करना अनिवार्य हो, ताकि फर्जी शपथ पत्रों का यह खेल जड़ से खत्म हो सके।
प्रशासन को चाहिए कि वह व्यावसायिक संस्थाओं और रसूखदारों के नाम हुई ऐसी तमाम संदेहास्पद रजिस्ट्रियों को तत्काल प्रभाव से शून्य घोषित करे। ‘दैनिक सदभावना पाती’ की यह जांच यहाँ खत्म नहीं होती; हमारी कलम तब तक शांत नहीं बैठेगी, जब तक आखिरी पात्र व्यक्ति को उसका कानूनी हक नहीं मिल जाता। यह लड़ाई जारी रहेगी, क्योंकि यह केवल खबर नहीं, बल्कि आम आदमी के सरोकार की पत्रकारिता है।
जिला प्रशासन यह सुनिश्चित करेगा की योजना का लाभ मूल लाभार्थी को हो, यदि कोई गलत मंशा से काम हो रहा है तो हम कार्यवाही करेंगे
– प्रदीप सोनी (एसडीएम एवं प्रभारी, कॉलोनी सेल कलेक्टर कार्यालय इंदौर)
हम इन सारे मामलों की शिकायत Enforcement Directorate (ED) में करेंगे – आर.के. सिंह (शिकायतकर्ता)
क्या कहते है प्रॉपर्टी मामलों के विधि विशेषज्ञ –
“कानून केवल प्रक्रिया नहीं बल्कि ‘मंशा’ (Mens Rea) देखता है; यदि भू-माफियाओं का उद्देश्य गरीबों के हक को व्यावसायिक लाभ के लिए निगलना है, तो वह कृत्य ‘शून्य और अवैध’ है। केंद्र सरकार की PMAY गाइडलाइंस और बेनामी कानून के तहत, राज्य के शिथिल नियमों की आड़ में गरीबों के हक पर किया गया ऐसा कोई भी हमला कानूनी रूप से कभी सही नहीं हो सकता। यदि मंशा गलत है, तो शासन को इन आवंटनों को रद्द कर कड़ी दंडात्मक कार्यवाही करनी ही होगी।


