Indore News । करीब तीन वर्षों तक चली लंबी और कड़ी अदालती सुनवाई के बाद पॉक्सो एक्ट से जुड़े एक गंभीर आपराधिक प्रकरण में न्यायालय ने मुख्य आरोपी राज प्रजापत को दोषमुक्त कर दिया। इस पूरे मामले में अधिवक्ता सागर प्रजापत (Advocate Sagar Prajapat) की सशक्त पैरवी, सटीक कानूनी रणनीति और सुप्रीम कोर्ट के स्थापित न्याय सिद्धांतों पर आधारित दलीलों ने निर्णायक भूमिका निभाई। न्यायालय ने अपने फैसले में अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत पीड़िता की उम्र से संबंधित दस्तावेजों को संदेहास्पद और अविश्वसनीय मानते हुए कहा कि उम्र का निर्धारण ठोस, प्रमाणिक और कानूनसम्मत साक्ष्यों के अभाव में नहीं किया जा सकता।
अभियोजन का दावा: नाबालिग होने का आरोप –
अभियोजन पक्ष के अनुसार इस प्रकरण में राज प्रजापत मुख्य आरोपी था, जबकि कुछ अन्य व्यक्तियों को सह-आरोपी के रूप में मामले में शामिल किया गया था। अभियोजन का आरोप था कि घटना 22 दिसंबर 2021 से 16 जनवरी 2022 के बीच घटित हुई, पीड़िता नाबालिग थी और इसी आधार पर पॉक्सो एक्ट की धाराएं लगाई गईं। अभियोजन ने मोबाइल कॉल, कथित मुलाकातों और कुछ डिजिटल साक्ष्यों के साथ-साथ मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर पीड़िता की आयु 18 वर्ष से कम होना दर्शाया।
बचाव पक्ष की दलील: उम्र साबित नहीं –
ट्रायल के दौरान अधिवक्ता सागर प्रजापत (Advocate Sagar Prajapat) ने प्रभावी ढंग से यह स्थापित किया कि पीड़िता की उम्र से संबंधित कोई भी दस्तावेज कानूनन भरोसेमंद नहीं है। मेडिकल रिपोर्ट केवल अनुमान पर आधारित पाई गई, जबकि स्कूल रिकॉर्ड और अन्य अभिलेख आपस में विरोधाभासी थे। अभियोजन उम्र को संदेह से परे सिद्ध करने में पूरी तरह असफल रहा, जिससे पॉक्सो एक्ट के तहत लगाए गए आरोप स्वतः कमजोर हो गए।
सह-आरोपियों पर भी नहीं टिक पाए आरोप –
अन्य सह-आरोपियों के संबंध में अभियोजन का कहना था कि उन्होंने मुख्य आरोपी को सहयोग या संरक्षण दिया और घटना के बाद परिस्थितियों को प्रभावित करने का प्रयास किया। हालांकि न्यायालय ने पाया कि उनके विरुद्ध कोई प्रत्यक्ष, स्वतंत्र और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जा सके। आरोप केवल कथनों और परिस्थितिजन्य तथ्यों पर आधारित रहे और किसी भी सह-आरोपी की भूमिका संदेह से परे सिद्ध नहीं हो सकी।
पुलिस जांच पर अदालत की सख्त टिप्पणी –
न्यायालय ने अपने निर्णय में पुलिस जांच को लेकर भी गंभीर टिप्पणियां कीं, अदालत के अनुसार जांच के दौरान पीड़िता की उम्र निर्धारण की कानूनन निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। जन्म प्रमाण पत्र जैसे प्राथमिक साक्ष्य संकलित नहीं किए गए, मेडिकल अनुमान को ही अंतिम सत्य मानकर चार्जशीट दाखिल कर दी गई और स्कूल रिकॉर्ड सहित अन्य दस्तावेजों की विधिवत जांच नहीं की गई। इसके अलावा डिजिटल साक्ष्यों की चेन ऑफ एविडेंस स्पष्ट नहीं की जा सकी और सह-आरोपियों की भूमिका की स्वतंत्र पुष्टि भी नहीं कराई गई।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बदली दिशा –
बहस के दौरान अधिवक्ता सागर प्रजापत (Advocate Sagar Prajapat) ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण न्याय दृष्टांत “सुनील विरुद्ध स्टेट ऑफ हरियाणा (एसीसी 742/2010)” का प्रभावी हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि यदि पीड़िता की अनुमानित आयु किसी प्रमाणिक अभिलेख से समर्थित नहीं है, तो केवल अनुमान के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती। निचली अदालत ने इसी सिद्धांत को अपनाते हुए माना कि अनुमानित उम्र के आधार पर पॉक्सो एक्ट के तहत दोष सिद्ध करना न्यायोचित नहीं है।
तीन साल की पैरवी, हर मोर्चे पर मजबूती –
करीब तीन वर्षों तक चले इस ट्रायल में दर्जनों गवाहों की जिरह और सैकड़ों पन्नों के दस्तावेजों के विश्लेषण के बीच अधिवक्ता सागर प्रजापत (Advocate Sagar Prajapat) ने अभियोजन के हर कमजोर बिंदु को उजागर किया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जब उम्र जैसा बुनियादी तथ्य ही प्रमाणित नहीं हो पाता, तब पॉक्सो एक्ट जैसे कठोर कानून के तहत दोषसिद्धि टिक नहीं सकती।
न्यायालय का स्पष्ट संदेश –
अपने फैसले में न्यायालय ने यह भी स्पष्ट संदेश दिया कि कानून की कठोरता के बावजूद, जब अभियोजन संदेह से परे मामला सिद्ध नहीं कर पाता, तब आरोपी को संदेह का लाभ देना न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है। यह निर्णय न केवल इस प्रकरण में आरोपी के लिए राहत लेकर आया, बल्कि पॉक्सो मामलों में पुलिस जांच, उम्र निर्धारण और साक्ष्य संकलन की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। कानूनी हलकों में इसे अधिवक्ता सागर प्रजापत की एक बड़ी और प्रभावशाली पेशेवर जीत के रूप में देखा जा रहा है।
नोट: पीड़िता की पहचान गोपनीय रखते हुए नाम प्रकाशित नहीं किया गया है।

