भ्रामक विज्ञापन और अधूरा निर्माण पड़ा भारी, उपभोक्ता आयोग का सख्त फैसला

सदस्य लालजी तिवारी की अहम भूमिका में बिल्डर पर कड़ा आदेश

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"दैनिक सदभावना पाती" (Dainik Sadbhawna Paati) (भारत सरकार के समाचार पत्रों के पंजीयक – RNI में पंजीकृत, Reg. No. 2013/54381) "दैनिक सदभावना पाती" सिर्फ एक समाचार...
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इंदौर। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग क्रमांक–2, इंदौर ने रियल एस्टेट क्षेत्र में भ्रामक विज्ञापनों और उपभोक्ताओं के साथ धोखाधड़ी के एक गंभीर मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए बिल्डर के खिलाफ महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। यह फैसला आयोग के सदस्य लालजी तिवारी (Lal Ji Tiwari) की सशक्त भूमिका और तथ्यपरक विवेचना के कारण उपभोक्ता हितों के लिए मिसाल बन गया है।

यह मामला शोभना भावसार बनाम जी-9 इन्फोटेक प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य से जुड़ा है, जिसमें परिवादिया ने आरोप लगाया था कि आकर्षक विज्ञापनों के जरिए प्लॉट बेचने के बाद न तो वादे अनुसार निर्माण कराया गया और न ही तय सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं।

आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि बिल्डर द्वारा समाचार पत्रों में प्रकाशित विज्ञापनों में मात्र 21,000 रुपये में प्लॉट बुकिंग, मकान निर्माण तक ईएमआई फ्री, एमपीईबी व रजिस्ट्री फ्री, 90 प्रतिशत तक होम लोन सुविधा और 2.67 लाख रुपये की सब्सिडी जैसे दावे किए गए थे, लेकिन वास्तविकता में इन शर्तों का पालन नहीं किया गया।

लालजी तिवारी की निर्णायक भूमिका

मामले की सुनवाई के दौरान सदस्य लालजी तिवारी (Lalji Tiwari) ने विज्ञापन, भुगतान रसीदों, रजिस्ट्री दस्तावेजों और बैंक रिकॉर्ड का बारीकी से परीक्षण करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि—

“भ्रामक विज्ञापन उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत गंभीर अपराध है और उपभोक्ता को उसके वैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।”

उनकी इस स्पष्ट राय ने मामले की दिशा तय की और आयोग को निष्कर्ष तक पहुँचाने में निर्णायक भूमिका निभाई।

आयोग का अंतिम आदेश

आयोग ने बिल्डर को निर्देश दिए कि—

  • परिवादिया को 45 दिनों के भीतर प्लॉट का कब्जा सौंपा जाए,

  • मानसिक व शारीरिक पीड़ा के लिए 15,000 रुपये क्षतिपूर्ति,

  • वाद व्यय के रूप में 10,000 रुपये अदा किए जाएं।

इन जजों की पीठ ने दिया फैसला

इस महत्वपूर्ण आदेश की पीठ में—

  • विकास राय (अध्यक्ष)

  • लालजी तिवारी (सदस्य)

  • श्रीमती सरोज मिरगे (सदस्य)
    शामिल रहे।

रियल एस्टेट सेक्टर के लिए चेतावनी

यह फैसला न केवल परिवादिया को न्याय दिलाने वाला है, बल्कि रियल एस्टेट क्षेत्र में कार्यरत बिल्डरों के लिए भी कड़ा संदेश है कि झूठे विज्ञापन और अधूरी योजनाएं अब नहीं चलेंगी

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