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ज्योतिषाचार्य श्री विनोद जैन (प्रभु)
दैनिक सदभावना पाती
इंदौर। आश्विन कृष्ण अमावस्या इस वर्ष 10 अक्टूबर 2026, शनिवार को पड़ रही है। इसे सनातन परंपरा में सर्वपितृ अमावस्या, पितृमोक्ष अमावस्या और महालया अमावस्या के नाम से जाना जाता है। यह पितृपक्ष का अंतिम दिन होता है और शनिवार होने के कारण इसे शनि अमावस्या भी कहा जाएगा। पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि 9 अक्टूबर रात 9:35 बजे शुरू होकर 10 अक्टूबर रात 9:19 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को ही मनाई जाएगी।
पितृपक्ष का अंतिम और महत्वपूर्ण दिन
आश्विन कृष्ण अमावस्या को पितृपक्ष का समापन माना जाता है। सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि इस दिन उन सभी पितरों के लिए भी श्राद्ध-तर्पण किया जा सकता है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात न हो अथवा किसी कारण उनका श्राद्ध निर्धारित तिथि पर न हो पाया हो। 2026 के पंचांग में भी 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के रूप में दर्ज किया गया है। सनातन परंपरा में यह दिन केवल कर्मकांड का नहीं, बल्कि स्मरण, कृतज्ञता और अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान का दिन माना जाता है। पितरों को जल अर्पित कर परिवार की परंपरा और संस्कारों को याद करने की परंपरा इसी भावना से जुड़ी है।
शनिवार पड़ने से शनि अमावस्या का महत्व
अमावस्या जब शनिवार को आती है तो पारंपरिक पंचांगों में इसे शनि अमावस्या या शनिश्चरी अमावस्या कहा जाता है। शनि को कर्म और न्याय का प्रतीक माना जाता है। इसलिए इस दिन शनि आराधना, सेवा, संयम और जरूरतमंदों की सहायता को विशेष महत्व दिया जाता है। पितृपक्ष की अमावस्या और शनिवार का यह संयोग धार्मिक दृष्टि से लोगों के लिए कर्म, कृतज्ञता और आत्ममंथन का अवसर बन जाता है। हालांकि किसी विशेष दोष या परेशानी के निवारण के लिए अपनी परंपरा के योग्य पुरोहित से विधि पूछना उचित रहेगा।
महालया से शक्ति आराधना की ओर प्रवेश
महालया अमावस्या का विशेष सांस्कृतिक महत्व बंगाल सहित पूर्वी भारत में है। इस दिन पितरों को विदाई देकर शक्ति आराधना की शुरुआत की भावना जुड़ी हुई है। 10 अक्टूबर के बाद 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि का आरंभ होगा। पंचांग में 11 अक्टूबर 2026 को आश्विन शुक्ल प्रतिपदा और नवरात्रि का प्रथम दिन दर्ज है। अर्थात 10 अक्टूबर को एक ओर पितृपक्ष का समापन होगा, वहीं अगले दिन से देवी आराधना का नया अध्याय शुरू होगा।
तर्पण और श्राद्ध की परंपरा
सर्वपितृ अमावस्या पर परंपरागत रूप से जल, काले तिल और कुशा से तर्पण किया जाता है। पितरों का नाम और गोत्र स्मरण करते हुए दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल अर्पित करने की परंपरा है। इसका मूल भाव है—अपने पूर्वजों को याद करना और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना। श्राद्ध में अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र अथवा अन्य सामग्री का दान किया जाता है। जरूरतमंद को भोजन कराना, गौ-सेवा अथवा किसी भूखे व्यक्ति की सहायता करना भी इसी सेवा-भाव से जोड़ा जा सकता है।
शनि अमावस्या पर दान और सेवा
शनिवार होने के कारण काले तिल, उड़द, सरसों का तेल, वस्त्र आदि के दान की परंपरा भी बताई जाती है। लेकिन इस दिन का सबसे बड़ा संदेश केवल वस्तु का दान नहीं, बल्कि समय, श्रम और अहंकार का त्याग माना जा सकता है। जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करना, बुजुर्गों का सम्मान करना, श्रमिकों के प्रति संवेदनशील होना और किसी भूखे को भोजन कराना शनि आराधना की भावना से जुड़ा व्यावहारिक रूप माना जा सकता है।
सुबह से शाम तक क्या करें?
प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें और अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पितरों का तर्पण करें। श्राद्ध की विधि परिवार के पुरोहित अथवा जानकार व्यक्ति से पूछकर करना उचित है। पंचांगों में श्राद्ध के लिए कुतुप और अपराह्न काल को महत्वपूर्ण माना गया है; इनका स्थानीय समय शहर के अनुसार बदलता है, इसलिए अपने क्षेत्र के पंचांग के अनुसार मुहूर्त देखना चाहिए। शाम को श्रद्धानुसार पीपल के पास अथवा शनि मंदिर में दीपक जलाया जा सकता है। इस दिन निंदा, झूठ, क्रोध और कठोर वाणी से बचने तथा मन को शांत रखने की परंपरागत सलाह दी जाती है।
‘निज हाथ दीजे, साथ लीजे’ का संदेश
सर्वपितृ अमावस्या का आध्यात्मिक संदेश यही है कि जीवन में जो कुछ मिला है, उसमें पूर्वजों का योगदान स्वीकार किया जाए। संपत्ति, ज्ञान, संस्कार और परिवार की परंपरा केवल व्यक्तिगत उपलब्धियां नहीं, बल्कि पीढ़ियों की देन हैं। इसलिए अमावस्या हमें कृतज्ञता, कर्म और त्याग का अर्थ समझाती है। जो केवल अपने लिए संचित किया जाता है वह यहीं रह जाता है, जबकि सेवा, दान और अच्छे कर्म समाज और परिवार में आगे बढ़ते हैं।
अंधकार से प्रकाश की ओर
10 अक्टूबर की अमावस्या पितृपक्ष के एक अध्याय का समापन करेगी और 11 अक्टूबर से शुरू होने वाली शारदीय नवरात्रि नए आध्यात्मिक चरण की शुरुआत करेगी। इसलिए इस दिन का संदेश भय नहीं, बल्कि स्मरण, क्षमा, कृतज्ञता, सेवा और आत्मचिंतन है। पितरों को श्रद्धापूर्वक याद करें, जरूरतमंद की सहायता करें और अपने कर्मों को बेहतर बनाने का संकल्प लें—यही इस विशेष अमावस्या का सबसे सार्थक संदेश माना जा सकता है।


