Mohini Ekadashi Katha: भगवान विष्णु ने मोहिनी बनकर छीना असुरों से अमृत, पढ़ें मोहिनी एकादशी की पौराणिक कथा

By
sadbhawnapaati
"दैनिक सदभावना पाती" (Dainik Sadbhawna Paati) (भारत सरकार के समाचार पत्रों के पंजीयक – RNI में पंजीकृत, Reg. No. 2013/54381) "दैनिक सदभावना पाती" सिर्फ एक समाचार...
3 Min Read

मोहिनी एकादशी कुछ जगहों पर आज 22 मई, शनिवार को मनाई जा रही हैं वहीं वैष्णव जन कल यानी कि 23 मई को मोहिनी एकादशी का व्रत रखेंगे क्योंकि उदया तिथि 23 मई को ही है. मोहिनी एकादशी पर भक्त आज भगवान विष्णु की पूजा अर्चना कर रहे हैं. शाम को भक्त कथा का पाठ करेंगे. मान्यताओं के अनुसार, मोहिनी एकादशी के दिन ही भगवान विष्णु ने मोहिनी का वेष धारण किया था ताकि वो असुरों से अमृत कलश लेकर देवताओं को दे सकें. यही कारण है कि यह एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है. आज हम आपके लिए लेकर आए हैं मोहिनी एकादशी की पौराणिक कथा…

मोहिनी एकादशी की पौराणिक कथा:

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब समुद्र मंथन के दौरान जब अमृतकलश निकला तो देवताओं और असुरों में अमृत के बंटवारे को लेकर छीनाझपटी मच गई. असुर देवताओं को अमृत नहीं देना चाहते थे जिस वजह से भगवान विष्णु ने एक बहुत रूपवती स्त्री मोहिनी का रूप धारण किया और असुरों को रिझा कर उनसे अमृतकलश लेकर देवताओं को अमृत बांट दिया. इसके बाद से सारे देवता अमर हो गए. यह घटनाक्रम वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को हुआ इसलिए इसे मोहिनी एकादशी कहा गया.

[expander_maker id=”1″ more=”आगे पढ़े ” less=”Read less”]

मोहिनी एकादशी की व्रत कथा 2:

पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन समय में सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नामक एक नगर था. जहां पर एक धनपाल नाम का वैश्य रहता था, जो धन-धान्य से परिपूर्ण था. वह सदा पुण्य कर्म में ही लगा रहता था. उसके पांच पुत्र थे. इनमें सबसे छोटा धृष्ट बुद्धि था. वह पाप कर्मों में अपने पिता का धन लुटाता रहता था. एक दिन वह नगर वधू के गले में बांह डाले चौराहे पर घूमता देखा गया. इससे नाराज होकर पिता ने उसे घर से निकाल दिया तथा बंधु-बांधवों ने भी उसका साथ छोड़ दिया.

वह दिन-रात दु:ख और शोक में डूब कर इधर-उधर भटकने लगा. एक दिन वह किसी पुण्य के प्रभाव से महर्षि कौण्डिल्य के आश्रम पर जा पहुंचा. वैशाख का महीना था. कौंडिल्य गंगा में स्नान करके आए थे. धृष्टबुद्धि शोक के भार से पीड़ित हो मुनिवर कौण्डिल्य के पास गया और हाथ जोड़कर बोला, ब्राह्मण ! द्विजश्रेष्ठ ! मुझ पर दया कीजिए और कोई ऐसा व्रत बताइए जिसके पुण्य के प्रभाव से मेरी मुक्ति हो.’

तब ऋषि कौण्डिल्य ने बताया कि वैशाख मास के शुक्लपक्ष में मोहिनी नाम से प्रसिद्ध एकादशी का व्रत करो. इस व्रत के पुण्य से कई जन्मों के पाप भी नष्ट हो जाते हैं. धृष्ट बुद्धि ने ऋषि की बताई विधि के अनुसार व्रत किया. जिससे वह निष्पाप हो गया और दिव्य देह धारण कर स्वर्गलोक को प्राप्त हुआ.

 [/expander_maker]

Share This Article
Follow:
"दैनिक सदभावना पाती" (Dainik Sadbhawna Paati) (भारत सरकार के समाचार पत्रों के पंजीयक – RNI में पंजीकृत, Reg. No. 2013/54381) "दैनिक सदभावना पाती" सिर्फ एक समाचार पत्र नहीं, बल्कि समाज की आवाज है। वर्ष 2013 से हम सत्य, निष्पक्षता और निर्भीक पत्रकारिता के सिद्धांतों पर चलते हुए प्रदेश, देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण खबरें आप तक पहुंचा रहे हैं। हम क्यों अलग हैं? बिना किसी दबाव या पूर्वाग्रह के, हम सत्य की खोज करके शासन-प्रशासन में व्याप्त गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार को उजागर करते है, हर वर्ग की समस्याओं को सरकार और प्रशासन तक पहुंचाना, समाज में जागरूकता और सदभावना को बढ़ावा देना हमारा ध्येय है। हम "प्राणियों में सदभावना हो" के सिद्धांत पर चलते हुए, समाज में सच्चाई और जागरूकता का प्रकाश फैलाने के लिए संकल्पित हैं।