प्रेषक- मिर्ज़ा ज़ाहिद बेग़ इंदौर
नए साल की पहली शाम ही इंदौर के शायरी पसन्द आवाम को बेहतरीन शायरी और सूफियाना कव्वाली के खुशनुमा रंगों से सराबोर कर गई । शहर के आनंद मोहन माथुर आडिटोरियम में तेज सर्दी के बावजूद देर रात तक सैकड़ों लोग मेहमान शायरों और मशहूर कव्वाल रईस अनीस साबरी की सूफियाना कव्वाली का बेदार होकर लुत्फ़ लेते रहे।
जी हां सही समझे साहेबान मैं बात कर रहा हूँ राहत इंदौरी फाउंडेशन के बैनर तले हुए अजीमुश्शान मुशायरे की जिसे देश-दुनिया में विद्रोही शायर के रूप में मशहूर इंदौर की शान और पहचान मरहूम राहत इंदौरी साहब की 76 वीं यौमे विलादत के मुबारक़ मौके पर उनके फरजंद मशहूर शायर सतलज राहत,फैसल राहत और उनके दोस्त-अहबाब ने 1 जनवरी 2026 की शाम मुनक़्क़िद किया था। आयोजन का यह लगातार 6ठा साल था।
राहत फाउंडेशन की यह रवायत रही है कि वह हमेशा वक़्त की पाबंद रही है। तय शुदा वक़्त शाम ठीक 5.30 बजे कव्वाल रईस अनीस साबरी अपने साजिंदों और साथी कव्वालों के साथ मंच पर तशरीफ़ लाए और फ़िर अगले लगभग तीन घंटों तक उन्होंने खचाखच भरे आडिटोरियम में मौजूद कव्वाली और मुशायरे के शौकीनों को अपनी सुरीली आवाज़,साजिंदों की शानदार संगत और रूह को रूहानी एहसास देने वाले दमदार म्यूजिक के साथ बेहतरीन कव्वालियों से नवाज़ा।
क्या नहीं था उनके कलाम में?
उनमें था सूफियाना रंग,उनमें थी गरीब नवाज़ की आजिज़ी,उनमें थी राहत साहब की चुनिंदा ग़ज़लों की बेमिसाल बंदिश और उनमें था राहत साहब के फरजंद शायर सतलज राहत के चुनिंदा मिसरों का बाक़माल संयोजन।
उनके हर क़लाम को इन्दोरियन्स की भरपूर दाद मिली।
राहत साहब की इस ग़ज़ल ने तो मानो उन्हें दीवाना बना दिया-
*”कैसा नारा कैसा कोल अल्ला बोल,*
*अभी बदलता है माहौल अल्ला बोल*
*कैसे साथी कैसे यार सब मक्कार*
*सबकी नियत डांवाडोल अल्ला बोल*
*मक्कारों से नाता तोड़ सबको छोड़*
*भेज कमीनों पर लाहौल अल्ला बोल*”
उनकी हर कव्वाली पर राहत साहब के दर्जनों शैदाई लगातार रुपयों की बारिश करते रहे-झूमते रहे। चूंकि वक़्त बहुत हो चुका था और अभी मुशायरा बाक़ी था इसलिए आयोजकों को सुनने वालों के न चाहते हुए भी कव्वाली को रोक कर मुशायरा शुरू करना पड़ा।
रात लगभग 8.30 पर सदर ए मुशायरा जनाब अज़ीज़ इरफ़ान साहब,शकील आज़मी और संपत सरल ने शमा रौशन कर मुशायरे की शुरुआत की। मुशायरे की निज़ामत डॉ संदीप शर्मा ने की।
उन्होंने सबसे पहले दावत ए सुखन नौजवान शायर मलिक रिजवान को दी। उन्होंने पढ़ा-
“कौन सी सूरत बक़ा है और फ़ना क्या चीज़ है
इब्तिदा कहते किसे हैं इंतिहा क्या चीज़ है
चांद के टुकड़े किए सूरज को भी पलटा दिया
मुस्तफा ने बता दिया मोज़ज़ा क्या चीज़ है।
एक तेरी दीद से ही ज़ख्म सारे भर गए
बीमार क्या जाने दवा क्या चीज़ है।”
मलिक रिज़वान की आवाज़ में अभी कच्चा पन झलक रहा था पर अभी उनके सामने सारी उम्र पड़ी है तय मानिए कि यह नौजवान जल्द ही बड़े शायरों में शुमार होगा।
बाराबंकी से आए सलीम सिद्दीकी ने अपना कलाम पेश किया-
“तबील रात है आगे
घना अंधेरा है
अभी चिराग बना लो अभी सबेरा है।
इतनी आसानी से कैसे भला हारेंगे तुम्हें
थक गए लब तो हम आंखों से पुकारेंगे तुम्हें
तुम तो नज़रों से गिराने के भी लायक नहीं हो
तुम समझते हो किसी जंग में मारेंगे तुम्हें।
वक़्त तेजी से गुजरता जा रहा था वक़्त की तंगी के बीच मखमली आवाज़ के मालिक खुर्शीद आलम आए और उन्होंने आते ही समां बांध दिया-
“चाहत खुलूस और मोहब्बत के शहर में
राहत की बात कीजिए राहत के शहर में”
“तुमने जिसे पुकारा होगा
तीर उसी ने मारा होगा
प्यार की जब तारीख लिखोगे
पहला नाम हमारा होगा।”
“खुदा का शुक्र है मां बाप के करीब हूं मैं
न जाने कितने रईसों से रईस हूँ मैं”
“किसने सोचा था अपने घर
ऐसे भी मंज़र होंगे
होठों पर शमशीर ए बगावत
हाथों में खंजर होंगे”
फिर उन्होंने अपनी मखमली आवाज में तरन्नुम में ग़ज़ल पढ़ी-
“जो फूल बहारों में भी मुरझाए हुए हैं
इल्जाम ए मोहब्बत की सजा पाए हुए हैं।”
“वो ताज पे और तख्त पे इतराए हुए हैं
ये सब मेरे अज़दाद के ठुकराए हुए हैं।”
“जागीर के परचम तो फना हो गए लेकिन
किरदार के परचम है जो लहराए हुए हैं।”
“जो छीनने आए हैं मेरे मुंह का निवाला
वो मेरे बुजुर्गों का नमक खाए हुए हैं।”
“तुम खैर अगर चाहो तो हम से न उलझना
हम शेर हैं और ज़ख्म अभी खाए हुए हैं।”
खुर्शीद हैदर मुशायरा लूट रहे थे और उनकी ग़ज़लों की मोहब्बत में डूबे लोग अभी उन्हें खामोशी से समात फ़रमा ही रहे थे कि वक़्त की कमी के कारण संपत सरल साहब ने पहले निज़ामत कर रहे डॉ संदीप शर्मा को अपनी घड़ी दिखा कर इशारा किया और फ़िर खुद ने ग़ज़ल पढ़ रहे खुर्शीद हैदर को टोका इससे खुर्शीद हैदर संपत सरल से खफ़ा हो गए और उनकी लय टूट सी गई। मुशायरों के आदाब जानने वालों को संपत सरल द्वारा चालू ग़ज़ल के बीच शायर को टोकना कहीं से भी ठीक नहीं लगा । बैठने के बहुत देर बाद तक खुर्शीद और संपत में हल्की नोंक झोंक होती रही। उनके बीच में पसरा यह तनाव बाक़ी मुशायरे में भी झलकता रहा।
मशहूर शायर मरहूम मुनव्वर राणा के बेटे तबरेज़ मुनव्वर राणा जब अपना क़लाम पेश कर रहे थे तो उनका लहज़ा देख कर बरबस मुनव्वर राणा साहब याद आते थे।
उन्होंने पढ़ा-
“करता था जो दिलों पर हुकूमत चला गया
हम कैसे मान लें कि वो राहत चला गया।”
“है मुझको दर्द कितना ये कहां मेरा हुलिया बताता है
यतीमी मुझ पर है गालिब मेरा चेहरा बताता है।”
“जिस उम्र में बिगड़ना था उसमें संभल गए
इतना नहीं बदलना था जितना बदल गए
कुछ ऐसी तेरी याद के आंसू में थी तपिश
पोछना जो चाहा तो
हाथ जल गए”
दिल्ली से आए आदिल रशीद ने पढ़ा-
“मुझे भी सुर्खरू होने का मौका क्यों नहीं देते
मोहब्बत है अगर मुझसे तो धोखा क्यों नहीं देते
ये तुमसे कौन कहता है कि मुझे बढ़कर सहारा दो
अगर दुश्मन नहीं हो तुम तो रास्ता क्यों नहीं देते।”
उर्दू के स्टूडेंट्स और पूर्व पुलिस महानिदेशक डॉ महेंद्र सिकरवार ने कुछ शेर पेश किए-
“जिसने इक रोज भी अपने जमीर को मारा होगा
क्या तुम्हे नहीं लगता कि उस रोज वह खुद से भी हारा होगा।”
“दुनिया की नसीहतों को कभी कभी मान लेना चाहिए
अपने गैरों का फर्क जान लेना चाहिए।”
डॉ सिकरवार का उर्दू सीखने का ज़ुनून काबिले तारीफ है। निज़ामत कर रहे संदीप शर्मा ने बताया कि उन्होंने अभी-अभी 5000 उर्दू अल्फाजों को सीखकर अपने उर्दू शब्दकोष में इज़ाफ़ा किया है। उर्दू अदब को उनसे बहुत उम्मीदें हैं।
शायरों की लिस्ट में सबसे आख़िर में डायस संभाला फ़िलॉस्फर शायर शकील आज़मी साहब ने-
“कुछ मोहब्बत की बात करते हैं।
आओ राहत की बात करते हैं।”
आगे उन्होंने पढ़ा-
“दिल बसे थे मगर उजड़ रहे थे
हम मोहब्बत की जंग लड़ रहे थे
इश्क भी उन दिनों ज़्यादा था
जिन दिनों हम ज्यादा लड़ रहे थे
बात ऐसी कि कोई बात न थी
हम उसी बात पर झगड़ रहे थे
एक ही दिन में सब नहीं हुआ ख़त्म
हम कई रोज़ से बिछड़ रहे थे।
उनकी एक और ग़ज़ल कुछ यूँ थी-
“तोहमते इश्क के मजमून से बंधे हुए हैं
हम गुनहगार हैं कानून से बंधे हुए हैं
दिल्ली हर रात हमें ख़्वाब में पुकारती है
और हम नींद में रंगून से बंधे हुए हैं।
एक काटो तो कई और रगें कटती हैं
जितने रिश्ते हैं सब खून से बंधे हुए हैं।”
शकील आज़मी इंदौर से और इंदौर उनसे खूब गुँथा हुआ है। दर्शकों की फरमाइश पर उन्होंने एक से बढ़ कर एक शेर पढ़े पर वक़्त की तंगी की वज़ह से उन्हें और उनके चाहने वालों को मन मसोस कर कम पर ही सब्र करना पढ़ा।
सबसे आखिर में आए वर्तमान दौर के व्यंग्य के हस्ताक्षर संपत सरल साहब उन्होंने-
सबसे पहले इंदौर में हुए दूषित जल हादसे पर करारा प्रहार किया।
फिर उन्होंने कहा कि जिन्होंने आजादी का आंदोलन नहीं देखा वे अब गुलामी की प्रक्रिया देख लें।
चुटिले प्रहारों के बीच उन्होंने रेखांकित किया कि इंदौर जहां राहत साहब का शहर है तो वहीं शरद जोशी जी का भी शहर है।
समय कि कमी को देखते हुए उन्होंने अपनी दो संक्षिप्त व्यंग्य रचनाएं ब्रेकिंग न्यूज और एक आदर्श भारतीय गांव पढ़ीं और भरपूर दाद बटोरी।
निज़ामत कर रहे डॉ संदीप शर्मा की साफ़गोई की दाद देनी होगी कि उन्होंने शुरुआत में ही उर्दू अदब के इस बड़े प्रोग्राम की निज़ामत के लिए अपने आप को मिसफिट बताया और उर्दू अदब से पूरी तरह वाक़िफ न होने की कमी को मंज़ूर भी किया। आगे प्रोग्राम के दौरान उनकी यह कमी झलकी भी और खली भी।
हालांकि अभी ग़ज़लों के शौकीनों की शायरी की प्यास अधूरी थी पर आधी रात बीत चुकी थी इसलिए प्रोग्राम को ख़त्म करना ही पड़ा। वही मुशायरा कामयाब माना जाता है जिसमें श्रोताओं को यह अफ़सोस रहे कि मुशायरा ख़त्म क्यों हो गया? वे यह न सोचें कि आखिर यह ख़त्म कब होगा ?
बेशक़ इस कसौटी पर यह मुशायरा बेहद कामयाब रहा।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि राहत फाउंडेशन ने हर साल की तरह इस साल भी साल के पहले ही दिन फिर एक बार बेहतरीन मुशायरा कर माइल स्टोन स्थापित कर दिया है इसके लिए फैसल राहत और सतलज राहत की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है। इंदौर के शायरी के शौकीनों को राहत फैमिली और राहत फाउंडेशन के साथियों का अखलाक और उनके द्वारा किया गया ख़ैरमक़दम हमेशा याद रहता है और वे इस मुशायरे का बेसब्री से साल भर इंतज़ार करते हैं।


