मौत से ठन गई, जी भर के जिया, फिर क्यों डरूँ?

Rajendra Singh
By
Rajendra Singh
पर्यावरण संरक्षण एवं जैविक खेती के प्रति प्रशिक्षण
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मौत से ठन गई, जी भर के जिया,
फिर क्यों डरूँ?

मन से न मरूँ, तन से न हारूँ,
धधकती इस छाती में अंगार उतारूँ।
लहू में बहती है मिट्टी की शान,
हर साँस कहे मुझसे—रुकना है अपमान।

अँधेरों से भिड़कर सूरज उगाऊँ,
जो झुके न तूफ़ानों में, वही परचम उठाऊँ।
कदम अगर काँपे तो इतिहास जले,
वीरों की राह में डर कैसे पले?

थकना गुनाह है, डरना पाप है,
जीते-जी मर जाना सबसे बड़ा श्राप है।
जो गिरकर उठे वही अमर कहलाए,
जो रुका एक पल, वो खुद से हार जाए।

मिट्टी का बेटा हूँ, मिट्टी की सौगंध,
हर वार सहूँ, रहूँ प्रचंड।
जब तक साँस है सीने में, आग है जंग,
लड़ता रहूँ—अंतिम क्षण तक दंग।

ना सौदे करूँ मैं सच के नाम पर,
ना झुकूँ कभी भी झूठ के जाम पर।
जो राष्ट्र, धर्म और धरती पुकारे,
वहीं मेरा पथ है—वहीं मेरे नारे।

आँच आए यदि संस्कारों पर,
तो वज्र बनूँ मैं प्रहारों पर।
मेरे मौन में भी रणघोष बजे,
मेरी चाल से ही सिंहासन हिले।

मैं राख नहीं, चिनगारी हूँ,
हर युग की जिम्मेदारी हूँ।
जो बुझा न पाए काल स्वयं,
मैं वही ज्वाला, वही तैयारी हूँ।

मौत से ठन गई, जी भर के जिया,
डर से नहीं, धर्म से जिया।
वीर हूँ मैं – कायर नहीं,
आज नहीं, कभी नहीं।

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