अमृत को छोड़ा, सब्ज़ी को खाया,
अमृत को ही हमने ख़रपतवार बताया…
धरती बोल पड़ी ओ बाबू,
“तूने मेरा वरदान गँवाया”…
चौलाई खड़ी थी हिल-हिल के,
नुनिया दे रही थी पुकार,
दूब घास झुक-झुक कहती—
“मैं हूँ औषधि, मत कर तिरस्कार।”
बथुआ भी बोला चुपके से—
“हम तन-मन का बल बढ़ाई,
तू हमको कचरा समझे,
फिर कैसे धरती मुस्काई?”
अमृत तो खेतों में उगता,
सदियों से यह रीत चली,
हम ही अपनी आँख मूँद के,
कुदरत से लड़ बैठे भली।
अब लौट चलें फिर गाँव की ओर,
जड़-पत्ते का मान बढ़ाएँ,
जो अमृत को हमने ठुकराया—
उसको फिर से घर ले आएँ।


