उत्तम संयम : जीवों की रक्षा और इन्द्रियों पर विजय

दशलक्षण पर्व का छठा धर्म सिखाता है—बाहर के संसार को जीतने से पहले अपने मन और इन्द्रियों को जीतना जरूरी है

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ज्योतिषाचार्य श्री विनोद जैन (प्रभु)

Astrologers in Indore। दशलक्षण पर्व के छठे दिन उत्तम संयम धर्म की आराधना की जाती है। जैन दर्शन में संयम का अर्थ केवल कुछ नियमों का पालन करना नहीं, बल्कि जीवों के प्रति करुणा, हिंसा से विरति, इन्द्रिय-विषयों पर नियंत्रण और मन की चंचलता को साधना है। शास्त्रीय विवेचन में संयम के दो प्रमुख पक्ष बताए गए हैं—प्राणी संयम और इन्द्रिय संयम। षट्काय जीवों की रक्षा प्राणी संयम है और पांच इन्द्रियों तथा मन पर विजय पाना इन्द्रिय संयम।

दशलक्षण पूजा में इसी भाव को अत्यंत सुंदर ढंग से कहा गया है—उत्तम संयम पालै ज्ञाता,
नर-भव सफल करै ले साता। मनुष्य जीवन दुर्लभ है और इस दुर्लभ जीवन को संयम, विवेक और आत्म-साधना में लगाना ही उसकी सार्थकता है।

संयम रूपी रत्न को संभालो, पूजा में कहा गया है—

काय छहों प्रतिपाल, पंचेन्द्रिय मन वश करो। संजम-रतन संभाल, विषय-चोर बहु फिरत हैं॥ यहां छह काय के जीवों की रक्षा और पांच इन्द्रियों तथा मन को वश में करने की प्रेरणा दी गई है। छह काय में पृथ्वीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय और त्रसकाय जीवों का उल्लेख होता है। जैन दर्शन में इन जीवों के प्रति सावधानी और अहिंसा को प्राणी संयम का महत्वपूर्ण अंग माना गया है। दूसरी ओर हमारी आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा—ये पांच इन्द्रियां लगातार विषयों की ओर आकर्षित होती रहती हैं। इनके साथ मन भी अपनी इच्छाओं और कल्पनाओं को बढ़ाता रहता है। इसलिए पूजा में इन्हें -विषय-चोर- के रूपक से समझाया गया है। संयम रूपी रत्न की रक्षा करनी है तो इन आकर्षणों पर विवेक का पहरा आवश्यक है।

छह काय के जीवों के प्रति करुणा, उत्तम संयम का अर्थ केवल स्वयं को रोकना नहीं, बल्कि दूसरे जीवों के प्रति संवेदनशील होना भी है। पूजा में कहा गया है—ठाही पृथ्वी जल आग मारुत, रूख त्रस करुना धरो। सपरसन रसना घ्रान नैना, कान मन सब वश करो॥ इसका भाव है कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति और त्रस जीवों के प्रति करुणा रखो तथा अपनी पांचों इन्द्रियों और मन को संयमित करो। यही उत्तम संयम की सुंदरता है—बाहर जीवों के प्रति दया और भीतर अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण। जैन आचार में सावधानी का विशेष महत्व है। चलना, बैठना, उठना, बोलना, भोजन करना—हर कार्य में यथासंभव सावधानी रखना भी संयम की साधना का हिस्सा है। गृहस्थ जीवन में पूर्ण मुनि-संयम संभव न हो तो भी अपनी क्षमता के अनुसार नियम, व्रत और अहिंसात्मक आचरण अपनाना संयम की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

संयम का अर्थ इच्छाओं को दबाना नहीं, साधना है

कई बार संयम को केवल रोक-टोक या त्याग के रूप में देखा जाता है। वास्तव में संयम का उद्देश्य मनुष्य को भीतर से स्वतंत्र बनाना है। यदि मन हर आकर्षण के पीछे भागता रहे तो व्यक्ति बाहर से स्वतंत्र दिखाई देने के बावजूद भीतर से अपनी इच्छाओं का गुलाम हो सकता है। इन्द्रियों को वश में करना उनका विरोध करना नहीं, बल्कि उनका स्वामी बनना है। भोजन सामने हो तो आवश्यकता के अनुसार ग्रहण करना, क्रोध आए तो तुरंत प्रतिक्रिया न देना, आकर्षक वस्तु देखकर अनावश्यक संग्रह न करना, किसी के प्रति ईर्ष्या उठे तो उसे पहचानना—ये सब दैनिक जीवन में संयम के छोटे-छोटे अभ्यास हैं।

उत्तम संजम गहु मन मेरे—मन को दिया गया संदेश,

पूजा में कहा गया है—उत्तम संजम गहु मन मेरे, भव-भव के भाजैं अघ तेरे। सुरग-नरक-पशुगति में नाहीं, आलस-हरन करन सुख ठाँहीं॥ यह अपने ही मन को दिया गया एक आत्म-संबोधन है। मनुष्य का मन बार-बार विषयों की ओर भागता है, इसलिए उसे बार-बार समझाना पड़ता है कि वास्तविक सुख केवल भोगों में नहीं है। संयम जीवन में जागरूकता लाता है। इच्छाओं के पीछे भागने के बजाय व्यक्ति यह तय करना सीखता है कि क्या करना है और क्या नहीं करना है। यही विवेक धीरे-धीरे जीवन को अनुशासित करता है।

संयम दुर्लभ है, इसलिए इसकी रक्षा जरूरी

जैन शास्त्रीय व्याख्याओं में संयम को दुर्लभ बताया गया है। मनुष्य जन्म मिलने के बाद भी सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और संयम की साधना सहज नहीं होती। इसलिए प्राप्त अवसर को केवल भोग-विलास में गंवाने के बजाय आत्मकल्याण में लगाना चाहिए।

इसी भाव को पूजा की पंक्तियां और अधिक तीव्र बनाती हैं—जिस बिना नहिं जिनराज सीझे, तू रुल्यो जग-कीच में। इक घरी मत विसरो करो नित, आयु जम-मुख बीच में॥ इसका संदेश है कि जीवन अनिश्चित है और समय निरंतर बीत रहा है। इसलिए संयम को कल पर टालना उचित नहीं। जो आत्म-सुधार आज किया जा सकता है, उसे कल के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए।

गृहस्थ जीवन में संयम कैसे आए?

संयम केवल मुनियों का विषय नहीं है। शास्त्रीय व्याख्याओं में स्पष्ट किया गया है कि गृहस्थ भी एकदेश संयम का पालन कर सकते हैं। अपनी क्षमता के अनुसार हिंसा से बचना, भोजन में मर्यादा रखना, व्यसनों से दूर रहना, अनावश्यक भोग से बचना, समय का सदुपयोग करना और क्रोध-वाणी पर नियंत्रण रखना—ये सभी संयम के व्यावहारिक रूप हैं। आज के जीवन में संयम का एक अर्थ डिजिटल और उपभोग-संयम भी समझा जा सकता है—हर सूचना देखना जरूरी नहीं, हर इच्छा पूरी करना जरूरी नहीं और हर बात पर प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं।

प्राणी संयम और इन्द्रिय संयम

जैन दर्शन के अनुसार उत्तम संयम को सरल शब्दों में दो भागों में समझा जा सकता है—

प्राणी संयम — किसी जीव को अनावश्यक पीड़ा न देना, षट्काय जीवों की यथासंभव रक्षा करना और सावधानीपूर्वक आचरण करना।
इन्द्रिय संयम — पांचों इन्द्रियों और मन को विषयों के पीछे अनियंत्रित रूप से भागने से रोकना।
दोनों एक- दूसरे से जुड़े हैं। बाहर हिंसा रोकने के लिए भीतर विवेक चाहिए और भीतर की इच्छाओं को साधने के लिए करुणा और जागरूकता आवश्यक है।

पांचवें धर्म के बाद छठे धर्म का संदेश –

उत्तम शौच ने लोभ छोड़कर संतोष सिखाया। अब उत्तम संयम कहता है—जो लोभ और तृष्णा को पहचान लिया है, अब अपनी इन्द्रियों और मन को भी दिशा दो।

  • क्षमा ने क्रोध को शांत किया,
  • मार्दव ने अहंकार को कम किया,
  • आर्जव ने छल-कपट से दूर किया,
  • सत्य ने वाणी को निर्मल किया,
  • शौच ने लोभ और तृष्णा पर विचार कराया,
  • और अब संयम जीवन को अनुशासन देने की साधना है।

उत्तम संयम का सार – संयम का अर्थ जीवन से आनंद समाप्त करना नहीं, बल्कि अनियंत्रित इच्छाओं से मुक्त होकर सही आनंद को पहचानना है। जिस मनुष्य को अपनी वाणी पर संयम है, उसके संबंध सुरक्षित रहते हैं। जिसे भोजन पर संयम है, उसका शरीर अनुशासित रहता है। जिसे क्रोध पर संयम है, उसके संबंधों में शांति रहती है। जिसे इन्द्रियों और मन पर संयम है, उसकी आत्म-साधना आगे बढ़ती है।

इसलिए उत्तम संयम हमें एक सरल सूत्र देता है— जीवों के प्रति करुणा रखो, इन्द्रियों पर विवेक रखो, मन पर अनुशासन रखो और हर कार्य में सावधानी रखो।

उत्तम संयम धर्म का संकल्प -ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा। उत्तम संयम हमें याद दिलाता है कि संसार को जीतना बड़ी बात नहीं, अपने भीतर उठती इच्छाओं, विषय-वासनाओं और असावधानी पर विजय पाना वास्तविक साधना है।

जहां करुणा है, वहां प्राणी संयम है। जहां विवेक है, वहां इन्द्रिय संयम है। और जहां मन संयमित है, वहीं आत्म-साधना का मार्ग प्रशस्त होता है।

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