ज्योतिषाचार्य श्री विनोद जैन (प्रभु)
इंदौर। दशलक्षण पर्व का आठवां दिन उत्तम त्याग धर्म को समर्पित है। जैन दर्शन में त्याग केवल किसी वस्तु को छोड़ देना नहीं, बल्कि दान, परोपकार और भीतर के राग-द्वेष से ऊपर उठने की साधना है। दशलक्षण धर्म पूजा में उत्तम त्याग को चार प्रकार के दान—आहार, औषधि, शास्त्र और अभय—से जोड़ा गया है तथा निश्चय की दृष्टि से राग-द्वेष के त्याग को भी उत्तम त्याग का महत्वपूर्ण स्वरूप बताया गया है।
उत्तम त्याग का मूल संदेश
पूजा में कहा गया है—उत्तम त्याग करै जो कोई, भोगभूमि-सुर-शिवसुख होई।। त्याग का उद्देश्य केवल किसी वस्तु से दूरी बनाना नहीं, बल्कि ममत्व और आसक्ति को कम करना है। वस्तु हमारे पास हो सकती है, लेकिन उसके प्रति अत्यधिक मोह और यह केवल मेरा है का भाव मन को बांध देता है। इसलिए त्याग बाहरी जीवन को भी उदार बनाता है और भीतर को भी हल्का करता है।
दान के चार स्वरूप
जैन परंपरा में त्याग-दान के चार प्रमुख प्रकार बताए गए हैं—आहारदान, औषधिदान, शास्त्रदान और अभयदान। उत्तम पात्रों को इन दानों का अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रदान करना त्यागधर्म का व्यवहार पक्ष माना गया है।
आहारदान भूख की आवश्यकता पूरी करने का माध्यम है।
औषधिदान रोगी के उपचार और स्वास्थ्य की सहायता करता है।
शास्त्रदान ज्ञान और आत्मबोध के मार्ग को आगे बढ़ाता है।
अभयदान भय से मुक्ति और जीवों के प्रति करुणा का भाव जगाता है। जैन परंपरा में अभयदान को विशेष महत्व दिया गया है।
पूजा में कहा गया है—दान चार परकार, चार संघ को दीजिए। धन बिजुली उनहार, नर-भव लाहो लीजिए॥ अर्थात धन और वैभव बिजली की चमक के समान क्षणभंगुर हैं। इसलिए मनुष्य जन्म मिला है तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान और त्याग का लाभ लेना चाहिए।
व्यवहार त्याग और निश्चय त्याग
उत्तम त्याग की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसका बाहरी और आंतरिक—दोनों पक्ष हैं। बाहर से धन, वस्तु, समय या ज्ञान का दान करना व्यवहार त्याग है, जबकि भीतर से राग-द्वेष, आसक्ति और कषायों को छोड़ना निश्चय त्याग की दिशा है। प्रामाणिक जैन स्रोत भी इन दोनों पक्षों का स्पष्ट उल्लेख करते हैं।
इसीलिए पूजा में कहा गया है—उत्तम त्याग कह्यो जग सारा, औषध शास्त्र अभय आहारा।
निहचै राग-द्वेष निरवारै, ज्ञाता दोनों दान सँभारै॥ ज्ञानी व्यक्ति केवल बाहर देने वाला नहीं होता; वह भीतर भी उन भावों को छोड़ने का प्रयास करता है जो आत्मा को अशांत और कर्मबंधन का कारण बनते हैं।
धन कुएं के जल के समान
एक सुंदर उपमा में कहा गया है—दोनों सँभारै कूप-जल सम, दरब घर में परिनया।
निज हाथ दीजे साथ लीजे, खाय खोया बह गया॥ कुएं का पानी लगातार उपयोग में आता रहे तो उपयोगी रहता है। इसी प्रकार धन-संपत्ति का श्रेष्ठ उपयोग केवल संग्रह में नहीं, बल्कि सदुपयोग और योग्य स्थान पर दान में है। अपने हाथ से दिया हुआ साथ जाता है, वाली पंक्ति यह स्मरण कराती है कि जीवन की वास्तविक सार्थकता केवल संचय से नहीं, बल्कि उस संपदा से किए गए सद्कार्यों से जुड़ती है। जैन ग्रंथों में भी यथाशक्ति दान करने और धन के सदुपयोग पर बल दिया गया है।
त्याग केवल धन का नहीं
आज उत्तम त्याग का अर्थ केवल बड़ी राशि दान करना नहीं है। समय का त्याग, ज्ञान का दान, किसी जरूरतमंद की सहायता, रोगी के उपचार में सहयोग, भयभीत जीव की रक्षा और किसी के जीवन में आशा पैदा करना भी त्याग की भावना को व्यवहार में उतार सकते हैं। इसके साथ सबसे कठिन त्याग है—क्रोध का त्याग, अहंकार का त्याग, छल का त्याग और लोभ का त्याग। वस्तु छोड़ देना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन वस्तु के प्रति ममत्व छोड़ना अधिक गहरी साधना है।
त्याग की तीन सीढ़ियां
उत्तम त्याग को जीवन में उतारने का एक सुंदर क्रम समझा जा सकता है—पहले वस्तु का त्याग, फिर उस वस्तु के प्रति ममत्व का त्याग और अंत में -मैं त्यागी हूं- इस अहंकार का भी त्याग। यहीं त्याग साधारण दान से आगे बढ़कर आत्मशुद्धि की साधना बनता है। जैन दर्शन में निश्चय त्याग को विषय-कषायों के त्याग से जोड़ा गया है।
उत्तम त्याग का संदेश
दशलक्षण पर्व हमें क्रमशः भीतर की यात्रा कराता है। संयम हमें रोकना सिखाता है, तप हमें साधना सिखाता है और उत्तम त्याग हमें छोड़ना सिखाता है। जो छोड़ना सीखता है, वही आसक्ति का भार कम कर पाता है। त्याग का अर्थ जीवन से भागना नहीं, बल्कि मोह को कम करके जीवन को अधिक सार्थक बनाना है। इसलिए उत्तम त्याग हमें प्रेरणा देता है—जहां आवश्यकता हो वहां दें, जहां आसक्ति हो वहां छोड़ें और जहां राग-द्वेष हो वहां आत्मचिंतन करें। ॐ ह्रीं उत्तम त्यागधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।


