स्ट्रेट ऑफ़ हॉरमुज़ में एक बार फिर भारतीय नाविकों की सुरक्षा खतरे में पड़ गई है। एंटिगुआ एंड बारबुडा ध्वज वाले मालवाहक जहाज एमवी केप दाओ पर दो अज्ञात प्रोजेक्टाइल (संभवतः टारपीडो) से हमला हुआ। जहाज ओमान के तट के पास से भारत की ओर जा रहा था। हमले से जहाज में आग लग गई। ओमान की रॉयल नेवी ने 27 चालक दल के सदस्यों को बचाया, जिनमें 19 भारतीय शामिल थे। वाइपर सूरज यादव (उत्तर प्रदेश) की हमले में गंभीर चोटें लगने के चलते मौत हो गई। एक अन्य नाविक घायल हुआ।
विदेश मंत्रालय ने हमले की निंदा की, शोक व्यक्त किया और कमर्शियल शिपिंग पर हमलों को रोकने की अपील की। शायद भारत सरकार ने ऐसा करके अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली है पर आम भारतीय लोगों के मन में यह सवाल बार- बार आ रहा है कि आखिर कब तक भारत के सपूत स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज में इसी तरह से शहीद होते रहेंगे, वह भी तब जब ईरान, अमरीका और इस्राएल के तिकोने संघर्ष में भारत किसी भी तरह से न तो शामिल है, न ही किसी का भी साथ दे रहा है।
यह घटना अकेली नहीं है। जून 2026 में अमेरिकी हमलों में एमटी सेटेबेलो पर तीन भारतीय, पटनाला सुरेश, आदित्य शर्मा और शिवानंद चौरासिया, मारे गए थे। जुलाई में ईरानी मिसाइल हमलों में एमटी मोम्बासा और अल बहिया पर एक भारतीय की मौत हुई तथा कई घायल हुए। मार्च से अब तक कई हमलों में जान गंवाने वाले भारतीय नाविकों की संख्या सबसे अधिक रही है।
हॉरमुज़ विश्व का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। भारत के हजारों नाविक यहाँ काम करते हैं। बार-बार होने वाले हमले न केवल मानवीय त्रासदी हैं बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार के लिए भी खतरा हैं। भारतीय नौसेना क्षेत्र में गश्त और सुरक्षा सहयोग बढ़ा रही है, पर चुनौती जटिल है। कूटनीति को भी तेज करने की जरूरत है, ईरान, अमेरिका और क्षेत्रीय देशों से मजबूत संवाद जरूरी है ताकि नागरिक शिपिंग सुरक्षित रहे।
नाविकों की सुरक्षा राष्ट्रीय दायित्व है। आश्वासन पर्याप्त नहीं। ठोस कार्रवाई और अंतरराष्ट्रीय दबाव ही इस संकट का समाधान दे सकता है।


