डॉ देवेंद्र मालवीय
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Shashi Enclave Colony Indore। ग्राम सनावदिया स्थित शशि एन्क्लेव कॉलोनी (Shashi Enclave Colony Sanawadia) में ईडब्ल्यूएस और एलआईजी श्रेणी के लिए आरक्षित भूखंडों के आवंटन और बाद के खरीद-बिक्री लेनदेन को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। एक आरटीआई एक्टिविस्ट ने दैनिक सदभावना पाती को उपलब्ध कराए दस्तावेजों के आधार पर आरोप लगाया है कि कुछ ईडब्ल्यूएस/एलआईजी भूखंड पहले अलग-अलग लोगों के नाम रजिस्टर्ड हुए और बाद में अपेक्षाकृत कम समय में डेवलपर से जुड़े लोगों, पार्टनरों अथवा परिवार से जुड़े व्यक्तियों के नाम वापस पहुंच गए।
आरटीआई एक्टिविस्ट का कहना है कि उपलब्ध रजिस्ट्री रिकॉर्ड में दिखाई दे रहे इस पैटर्न की विस्तृत जांच के लिए वह आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ और प्रवर्तन निदेशालय के समक्ष शिकायत करने की तैयारी में है। यदि संबंधित जांच एजेंसियों से अपेक्षित कार्रवाई नहीं होती है तो मामले को उच्च न्यायालय के समक्ष ले जाने की तैयारी भी की जा रही है।
13 भूखंडों के लेन-देन ने खड़े किए सवाल
आरटीआई एक्टिविस्ट द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों में शशि एन्क्लेव के कम से कम 13 ईडब्ल्यूएस/एलआईजी भूखंडों के लेन-देन का उल्लेख है। इनमें ए-74, ए-106, ए-103, ए-80, ए-76, ए-94, ए-82, ए-81, ए-90, ए-79, ए-85, ए-84 और ए-88 शामिल हैं। दस्तावेजों के मुताबिक कई मामलों में प्रारंभिक खरीदार और बाद के खरीदार अलग-अलग हैं तथा कुछ भूखंड अपेक्षाकृत कम अवधि के भीतर दोबारा हस्तांतरित हुए। उदाहरण के तौर पर ए-76 एलआईजी भूखंड 12 मार्च 2024 को नरेश शुक्ला के नाम पंजीकृत हुआ और 26 मार्च 2024 को भरत बंसल के नाम दर्ज हो गया। यानी दोनों पंजीयन के बीच महज 15 दिन का अंतर बताया गया है। इसी तरह ए-74 एलआईजी का पंजीयन 6 जून 2024 को भरत बंसल और जितेन्द्र राठौड़ के नाम हुआ, जबकि 24 जुलाई 2024 को यही भूखंड अंशुल अग्रवाल के नाम दर्ज होने का उल्लेख है।
ईडब्ल्यूएस श्रेणी में भी इसी तरह के कई उदाहरण सामने रखे गए हैं। ए-85 और ए-84 के प्रारंभिक खरीदार क्रमशः ओमप्रकाश और बलवीर गोस्वामी बताए गए हैं, जबकि बाद के पंजीयन में दोनों भूखंड संजय सेठ के नाम दर्ज हुए। ए-88 पहले शुभम के नाम और बाद में सारांश सेठ के नाम पंजीकृत होने की बात दस्तावेजों में बताई गई है।
डमी खरीदार या सामान्य खरीद-बिक्री?
आरटीआई एक्टिविस्ट का मुख्य सवाल यह है कि क्या ये सभी लेन-देन सामान्य बाजार आधारित खरीद-बिक्री थे या इनके पीछे कोई पूर्व निर्धारित व्यवस्था थी। इसी कारण वह प्रारंभिक खरीदारों की आर्थिक क्षमता, भुगतान के स्रोत, बैंक खातों और बाद में प्राप्त राशि की मनी ट्रेल की जांच की मांग करने की तैयारी में है। जांच का महत्वपूर्ण बिंदु यह भी होगा कि भूखंड खरीदने के लिए रकम वास्तव में किसने उपलब्ध कराई थी और क्या प्रारंभिक खरीदारों तथा बाद में भूखंड प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के बीच कोई वित्तीय या पारिवारिक संबंध था।
गरीबों के हक की जमीन पर कॉलोनाइजर की नजर?
आरोप है कि गरीबों के हक के लिए आरक्षित ईडब्ल्यूएस/एलआईजी भूमि पर कॉलोनाइजर की नजर पड़ गई और आरक्षित भूखंडों को नियमों को दरकिनार कर अपने प्रभाव क्षेत्र में वापस ले लिया गया। एक्टिविस्ट के अनुसार ईडब्ल्यूएस/एलआईजी भूखंडों के आवंटन से जुड़े केंद्रीय नियमन में निर्धारित अवधि तक ऐसे भूखंडों के हस्तांतरण पर प्रतिबंध (लॉक इन पीरियड) रहता है।
आरोप है कि निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद भी यदि भूखंड बेचना हो तो सक्षम प्राधिकारी, विशेषकर कलेक्टर की अनुमति तथा पात्र आरक्षित श्रेणी के व्यक्ति को ही हस्तांतरण की शर्त लागू होती है। इसके विपरीत, यहां ऐसे आरक्षित भूखंड परिवार से जुड़े लोगों और कंपनी के डायरेक्टरों के नाम किए जाने का आरोप है, जो न तो संबंधित आरक्षित श्रेणी के पात्र बताए जा रहे हैं और न ही ईडब्ल्यूएस/एलआईजी लाभार्थी। आरटीआई एक्टिविस्ट का दावा है कि यदि दस्तावेजों और वित्तीय लेन-देन की जांच होती है तो इस पूरी प्रक्रिया में करोड़ों रुपये के संभावित आर्थिक लाभ और कथित धांधली का खुलासा हो सकता है।
पंकज अग्रवाल की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल ?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार संबंधित कंपनी/फर्म में कई डायरेक्टर हैं, लेकिन शिकायत की तैयारी कर रहे आरटीआई एक्टिविस्ट के अनुसार पंकज अग्रवाल कंपनी के प्रमुख कर्ताधर्ता के रूप में सामने आते हैं। इसलिए प्रस्तावित शिकायत में कंपनी के सभी संबंधित निदेशकों, पार्टनरों और लेन-देन से जुड़े व्यक्तियों की भूमिका की जांच की मांग किए जाने की बात कही जा रही है। हालांकि, किसी व्यक्ति की भूमिका या जिम्मेदारी को केवल रजिस्ट्री रिकॉर्ड में नाम आने के आधार पर अपराध सिद्ध नहीं माना जा सकता। इसकी पुष्टि बैंक रिकॉर्ड, आय के स्रोत, दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों की जांच के बाद ही संभव होगी।
सदभावना पाती ने मांगा कंपनी का पक्ष
मामले में दैनिक सदभावना पाती ने संबंधित कंपनी से उसका पक्ष जानने के लिए कई बार ईमेल और व्हाट्सएप के माध्यम से संपर्क किया। विशेष रूप से ईडब्ल्यूएस/एलआईजी भूखंडों के लेन-देन, प्रारंभिक खरीदारों की भूमिका, बाद में हुए हस्तांतरण को लेकर कंपनी से जवाब मांगा गया। समाचार लिखे जाने तक कंपनी की ओर से कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ है। कंपनी की ओर से जवाब मिलने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
अब ईओडब्ल्यू-ईडी की जांच पर नजर
आरटीआई एक्टिविस्ट द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों में दिखाई दे रहे लेन-देन के पैटर्न ने कई सवाल खड़े किए हैं। हालांकि फिलहाल यह एक प्रस्तावित शिकायत और दस्तावेजों के आधार पर उठाए गए आरोप हैं, किसी जांच एजेंसी ने अभी इन आरोपों को सही नहीं ठहराया है। अब देखना होगा कि प्रस्तावित ईओडब्ल्यू-ईडी शिकायत के बाद संबंधित एजेंसियां इन रजिस्ट्री, बैंकिंग लेन-देन और मनी ट्रेल की जांच करती हैं या नहीं। यदि कार्रवाई नहीं होती है तो आरटीआई एक्टिविस्ट द्वारा उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की तैयारी की जा रही है। मामले में आगे की तस्वीर जांच और संबंधित पक्षों के जवाब के बाद ही साफ होगी।


