- पंचमी से शुरू होती है दस धर्मों की साधना
- बाहरी सफाई से पहले जरूरी है मन की सफाई
- पंचमी—उत्तम क्षमा : क्रोध पर विजय
- षष्ठी—उत्तम मार्दव : अहंकार का त्याग
- अष्टमी—उत्तम शौच : लोभ और असंतोष से मुक्ति
- नवमी—उत्तम सत्य : सत्य के साथ संयम
- एकादशी—उत्तम तप : इच्छाओं पर विजय
- त्रयोदशी—उत्तम आकिंचन्य : ‘मेरा कुछ नहीं’
- दैनिक साधना—पूजा, स्वाध्याय और आत्मनिरीक्षण
- अनंत चतुर्दशी और क्षमावाणी
- सच्चा दशलक्षण—आत्मा के निकट जाना
ज्योतिषाचार्य श्री विनोद जैन (प्रभु)
इंदौर। जैन दर्शन में धर्म केवल पूजा-पाठ और व्रत-उपवास तक सीमित नहीं है। धर्म का वास्तविक स्वरूप आत्मा की ओर लौटना, राग-द्वेष से मुक्त होना और जीवन में अहिंसा, संयम, तप तथा त्याग को उतारना है। इसी आत्मशुद्धि की साधना का महान अवसर है दशलक्षण महापर्व। दिगंबर जैन समाज में भाद्रपद शुक्ल पंचमी से अनंत चतुर्दशी तक मनाया जाने वाला यह दस दिवसीय पर्व आत्मा को क्रोध, मान, माया, लोभ और अन्य विकारों से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है।
पंचमी से शुरू होती है दस धर्मों की साधना
दिगंबर जैन परंपरा में दशलक्षण पर्व का आरंभ भाद्रपद शुक्ल पंचमी से होता है। वर्षा ऋतु में साधु-संत एक स्थान पर रहकर स्वाध्याय, ध्यान और साधना करते हैं। श्रावक-श्राविकाओं के लिए भी यह समय सांसारिक व्यस्तताओं से कुछ समय हटकर धर्म, संयम और आत्मचिंतन में लगाने का अवसर है। पर्व का मूल भाव है—आत्मा के निकट ठहरना। सालभर के व्यवहार में हुए कर्मबंधों के प्रति जागरूक होकर तप, स्वाध्याय, प्रायश्चित्त और संयम के माध्यम से आत्मशुद्धि का प्रयास करना ही इसका उद्देश्य है।
बाहरी सफाई से पहले जरूरी है मन की सफाई
हम शरीर, घर और आसपास की सफाई करते हैं, लेकिन मन में जमा क्रोध, अहंकार, छल, लोभ, ईर्ष्या और द्वेष को अक्सर भूल जाते हैं। दशलक्षण पर्व हमें इसी आंतरिक सफाई की याद दिलाता है। हर दिन एक उत्तम धर्म की आराधना करते हुए उसके विपरीत भाव को कम करने का प्रयास किया जाता है।
पंचमी—उत्तम क्षमा : क्रोध पर विजय
उत्तम क्षमा का अर्थ केवल किसी को माफ कर देना नहीं, बल्कि मन से वैर और बदले की भावना समाप्त करना है। क्रोध विवेक को ढकता है, जबकि क्षमा आत्मबल बढ़ाती है। इस दिन संकल्प हो—जिससे मन में शिकायत है, उसे क्षमा करें और स्वयं भी द्वेष से मुक्त हों।
षष्ठी—उत्तम मार्दव : अहंकार का त्याग
मार्दव अर्थात विनय और निरभिमानता। जाति, धन, रूप, ज्ञान, पद या शक्ति का अहंकार आत्मिक उन्नति में बाधक है। वास्तविक महानता विनम्रता में है। इसलिए ‘मैं’ को छोटा कर विनय को जीवन में स्थान देना ही मार्दव की साधना है।
सप्तमी—उत्तम आर्जव : सरलता और निष्कपटता
आर्जव का अर्थ है मन, वचन और कर्म की एकरूपता। मन में कुछ और, वाणी में कुछ और और व्यवहार में कुछ और होना कपट है। आर्जव हमें छल, दिखावे और दोहरे व्यवहार से दूर रहकर सरल और निष्कपट बनने की प्रेरणा देता है।
अष्टमी—उत्तम शौच : लोभ और असंतोष से मुक्ति
उत्तम शौच केवल बाहरी स्वच्छता नहीं, बल्कि मन की निर्मलता है। लोभ, असंतोष और अनावश्यक संग्रह मन को अशांत करते हैं। संतोष और निर्लोभता अपनाकर परिग्रह के प्रति आसक्ति कम करना ही इस धर्म का संदेश है।
नवमी—उत्तम सत्य : सत्य के साथ संयम
सत्य ऐसा हो जो हितकारी, मित और प्रिय हो। झूठ, निंदा, चुगली और कटु वचन से बचना भी सत्य धर्म की साधना है। सत्य बोलना जरूरी है, लेकिन सत्य को किसी को चोट पहुंचाने का माध्यम नहीं बनाना चाहिए।
दशमी—उत्तम संयम : जीवन में अनुशासन
संयम का अर्थ केवल भोजन पर नियंत्रण नहीं, बल्कि मन, वाणी और इंद्रियों पर अनुशासन है। जीवदया, अहिंसक जीवनशैली, आहार-विहार में मर्यादा, रात्रिभोजन त्याग और इच्छाओं पर नियंत्रण संयम को मजबूत करते हैं। आज के समय में अनावश्यक उपभोग और मनोरंजन पर नियंत्रण भी संयम का हिस्सा है।
एकादशी—उत्तम तप : इच्छाओं पर विजय
तप केवल उपवास नहीं है। इसका उद्देश्य इच्छाओं का निरोध और आत्मशक्ति को जागृत करना है। उपवास, एकासन, रसपरित्याग के साथ स्वाध्याय, ध्यान, प्रायश्चित्त और कायोत्सर्ग भी तप की साधना हैं। तप शरीर को कष्ट देने के लिए नहीं, मन और इच्छाओं पर विजय पाने के लिए है।
द्वादशी—उत्तम त्याग : ममत्व से मुक्ति
त्याग केवल वस्तु छोड़ना नहीं, बल्कि उसके प्रति ‘मेरा’ की भावना कम करना है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार आहार, औषधि, ज्ञान, अभय आदि का दान करना त्याग की भावना को मजबूत करता है। त्याग स्वार्थ को कम कर आत्मिक उदारता बढ़ाता है।
त्रयोदशी—उत्तम आकिंचन्य : ‘मेरा कुछ नहीं’
आकिंचन्य का अर्थ है परिग्रह और ममत्व से मुक्ति। धन, घर, पद, प्रतिष्ठा और शरीर परिवर्तनशील हैं। जैन दर्शन आत्मा और पर-पदार्थ के भेद को समझने की प्रेरणा देता है। चिंतन हो—मैं वस्तुओं से भिन्न चैतन्य आत्मा हूं।
चतुर्दशी—उत्तम ब्रह्मचर्य : आत्मा में रमण
ब्रह्मचर्य का व्यापक अर्थ है अपनी आत्मा में रमण करना। विचार, वाणी और व्यवहार की पवित्रता, इंद्रिय संयम और आत्मध्यान इसके महत्वपूर्ण पक्ष हैं। बाहरी विषयों से मन हटाकर आत्मचिंतन की ओर ले जाना ही ब्रह्मचर्य की वास्तविक साधना है।
दैनिक साधना—पूजा, स्वाध्याय और आत्मनिरीक्षण
दशलक्षण पर्व में प्रातः स्नान कर शुद्ध वस्त्रों में जिनालय जाकर अभिषेक, शांतिधारा और अष्टद्रव्य से जिनपूजन करें। देव-शास्त्र-गुरु की आराधना, णमोकार मंत्र और मंगल पाठ के साथ प्रतिदिन के दशलक्षण धर्म की पूजा करें। दिन में अपनी शक्ति के अनुसार तत्त्वार्थसूत्र, समयसार, छहढाला, मूलाचार और श्रावकाचार आदि का स्वाध्याय करें तथा जिनवाणी सुनें। शाम को स्तवन, भक्तामर, सामायिक और प्रतिक्रमण के माध्यम से दिनभर के व्यवहार की समीक्षा करें। रात को कायोत्सर्ग करते हुए स्वयं से पूछें—आज कहां क्रोध, अहंकार, कपट या लोभ आया?
व्रत और नियम—सामर्थ्य के अनुसार साधना
दशलक्षण में उपवास, एकासन, रसत्याग, रात्रिभोजन त्याग आदि किए जाते हैं। लेकिन व्रत का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि आत्मसंयम बढ़ाना है। इसलिए साधना अपनी क्षमता और परिस्थितियों के अनुसार करनी चाहिए। दस दिनों में ब्रह्मचर्य, अहिंसा, रात्रिभोजन त्याग, जमीकंद एवं अनावश्यक आहार से बचाव, स्वाध्याय और संयम जैसे नियम अपनाए जा सकते हैं।
अनंत चतुर्दशी और क्षमावाणी
अनंत चतुर्दशी दशलक्षण पर्व की साधना के पूर्णत्व का दिन है। दस दिनों की यात्रा क्षमा से शुरू होकर ब्रह्मचर्य तक पहुंचती है। पर्व की वास्तविक सफलता तब है जब इन दस दिनों में अर्जित गुण पूरे वर्ष हमारे व्यवहार में दिखाई दें।
क्षमावाणी पर सभी जीवों से क्षमा मांगते हुए कहा जाता है—
खामेमि सव्वे जीवा,
सव्वे जीवा खमंतु मे।
मित्ती मे सव्व भूएसु,
वेरं मज्झं न केणइ।।
अर्थात—मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूं, सभी जीव मुझे क्षमा करें। मेरा सभी जीवों के प्रति मैत्री भाव है और किसी के प्रति मेरा वैर नहीं है।
सच्चा दशलक्षण—आत्मा के निकट जाना
यदि दस दिन पूजा करने के बाद भी क्रोध वही रहे, स्वाध्याय के बाद अहंकार वही रहे और क्षमावाणी के बाद भी वैर बना रहे तो साधना अधूरी है। सच्चा दशलक्षण वह है जिसमें मन अधिक शांत, वाणी अधिक मधुर, व्यवहार अधिक सरल और जीवन अधिक संयमित हो।
दशलक्षण हमें सिखाता है—अहिंसा से जीवन शुद्ध हो, संयम से व्यवहार शुद्ध हो, तप से कर्मों की निर्जरा हो, त्याग से ममत्व घटे, क्षमा से वैर समाप्त हो और आत्मचिंतन से जीव अपने शुद्ध स्वरूप को पहचान सके।
यही दशलक्षण महापर्व है।
यही आत्मशुद्धि की साधना है।
और यही जैन धर्म का सनातन संदेश है।


