Contents
- शील की नौ बाड़, भीतर ब्रह्मभाव
- दृष्टि में पवित्रता, व्यवहार में मर्यादा
- काम-विकार से सावधान
- सुंदर शरीर के पीछे की वास्तविकता
- ब्रह्मचर्य : दशलक्षण की अंतिम सीढ़ी
- दस धर्मों की साधना से मुक्ति की दिशा-संसार में विषयाभिलाषा तजि गये जोगीश्वरा।
- मंगल मंत्र -ॐ ह्रीं उत्तम ब्रह्मचर्यधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ज्योतिषाचार्य श्री विनोद जैन (प्रभु)
दैनिक सदभावना पाती
दैनिक सदभावना पाती
इंदौर। दशलक्षण पर्व का दसवां और अंतिम धर्म है उत्तम ब्रह्मचर्य। यह केवल स्त्री-पुरुष संबंधों से विरत रहने का नाम नहीं, बल्कि इन्द्रियों को विषयों से हटाकर अपने आत्मस्वरूप की ओर ले जाने की साधना है। जैन दर्शन में ‘ब्रह्म’ का अर्थ शुद्ध आत्मा और ‘चर्य’ का अर्थ उसमें रमण करना बताया गया है। इसलिए आत्मा में स्थिर होने की भावना ही ब्रह्मचर्य का सर्वोच्च स्वरूप है।
शील की नौ बाड़, भीतर ब्रह्मभाव
पंडित दौलतराम जी की पंक्तियां इस भावना को सुंदर ढंग से व्यक्त करती हैं—शील-बाड़ नौ राख, ब्रह्म-भाव अन्तर लखो। करि दोनों अभिलाख, करहु सफल नरभव सदा॥ अर्थात शीलरूपी बगीचे की रक्षा के लिए नौ बाड़ों को सुरक्षित रखो और भीतर आत्मस्वरूप अर्थात ब्रह्मभाव को देखो। जैन ग्रंथों में ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिए विभिन्न प्रकार की मर्यादाओं और भावनाओं का वर्णन मिलता है। इनमें विषयासक्ति से बचना, काम-विषयक चर्चा से दूर रहना, पूर्व भोगों का स्मरण न करना तथा इन्द्रियों को संयमित रखना प्रमुख हैं।
दृष्टि में पवित्रता, व्यवहार में मर्यादा
उत्तम ब्रह्मचर्य मनुष्य को केवल बाहरी संयम नहीं सिखाता, बल्कि दृष्टि, विचार, वाणी और व्यवहार की पवित्रता का संदेश देता है—उत्तम ब्रह्मचर्य मन आनों, माता बहिन सुता पहिचानों। पर-स्त्री को माता, बहन या पुत्री के समान सम्मान की दृष्टि से देखना और प्रत्येक व्यक्ति के प्रति मर्यादित व्यवहार रखना ब्रह्मचर्य की व्यवहारिक साधना का महत्वपूर्ण अंग है। जैन परंपरा में ब्रह्मचर्य को मन, वचन और काय से संयमित आचरण के रूप में भी समझाया गया है।
काम-विकार से सावधान
दौलतराम जी ने काम-विकार की शक्ति को समझाने के लिए अत्यंत प्रभावशाली उपमा दी है—सहैं बान-बरषा बहु सूरे, टिकैं न नैन-बान लखि कूरे॥ अर्थात युद्ध में बाणों की वर्षा सह लेने वाले वीर भी यदि अपनी दृष्टि और मन पर संयम न रखें तो विषय-विकार के प्रभाव में विचलित हो सकते हैं। इसलिए ब्रह्मचर्य बाहरी परिस्थितियों से अधिक मन की जागरूकता और आत्मसंयम की साधना है।
सुंदर शरीर के पीछे की वास्तविकता
जैन आचार्यों ने शरीर की नश्वरता और अशुचिता का चिंतन इसलिए कराया है ताकि मनुष्य बाहरी आकर्षण में आसक्त न हो। शरीर परिवर्तनशील है और अंततः नश्वर है। इसलिए उसके आकर्षण को ही जीवन का अंतिम सत्य मान लेना विवेकपूर्ण नहीं। यह चिंतन वैराग्य और आत्मदृष्टि को मजबूत करने का माध्यम है।
ब्रह्मचर्य : दशलक्षण की अंतिम सीढ़ी
जैन दर्शन में दसों धर्म परस्पर जुड़े हुए हैं। क्षमा से क्रोध शांत होता है, मार्दव से अहंकार घटता है, आर्जव से कपट दूर होता है, सत्य और शौच से आचरण निर्मल होता है, संयम और तप से इन्द्रिय-विषयों तथा कषायों पर नियंत्रण बढ़ता है, त्याग और आकिंचन्य से ममत्व घटता है और ब्रह्मचर्य मन को आत्मस्वरूप की ओर मोड़ता है। इसीलिए उत्तम ब्रह्मचर्य को केवल दैहिक संयम तक सीमित करना उचित नहीं। इसका उच्चतम अर्थ है—विषय-वासनाओं से विरक्ति और अपने ज्ञानमय आत्मस्वरूप में रमण। जैनकोष में भी ब्रह्मचर्य के निश्चय स्वरूप को आत्मा में रमण के रूप में स्पष्ट किया गया है।
दस धर्मों की साधना से मुक्ति की दिशा-संसार में विषयाभिलाषा तजि गये जोगीश्वरा।
‘ध्यानत’ धरम दस पैंड चढ़िकै, शिव-महल में पग धरा॥ दशलक्षण पर्व की दस सीढ़ियां हमें बाहरी आडंबर से भीतर की यात्रा की ओर ले जाती हैं। अंतिम संदेश यही है कि इन्द्रियों को विषयों में भटकने देने के बजाय आत्मा के स्वरूप को पहचानें और अपने आचरण को संयमित बनाएं। जैन दर्शन में दशलक्षण धर्म को आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग से जोड़ा गया है।
मंगल मंत्र -ॐ ह्रीं उत्तम ब्रह्मचर्यधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दशलक्षण पर्व का यह अंतिम धर्म हमें स्मरण कराता है कि सच्चा ब्रह्मचर्य केवल किसी विषय का त्याग नहीं, बल्कि मन को विषयों से हटाकर आत्मा में स्थिर करने की साधना है। यही संयम, शील और आत्मजागरण की दिशा में आगे बढ़ने का संदेश है।


