ज्योतिषाचार्य श्री विनोद जैन (प्रभु)
दैनिक सदभावना पाती
इंदौर। दशलक्षण पर्व का नौवां दिन उत्तम आकिंचन्य धर्म को समर्पित है। आकिंचन्य का मूल भाव है—आत्मा के अतिरिक्त किसी भी बाहरी या आंतरिक वस्तु को अपना न मानना और उसके प्रति ममत्व को कम करना। जैन दर्शन में केवल वस्तु का पास होना ही परिग्रह नहीं माना गया, बल्कि वस्तु के प्रति आसक्ति, मूर्च्छा और ‘मेरा’ होने का भाव परिग्रह का महत्वपूर्ण कारण है।
आकिंचन्य का अर्थ—मेरा क्या है?
मनुष्य जीवन में सबसे गहरा शब्द है—मेरा। मेरा घर, मेरा धन, मेरा परिवार, मेरा पद, मेरा सम्मान और यहां तक कि शरीर के प्रति भी अत्यधिक ममत्व। उत्तम आकिंचन्य हमें इस भाव पर विचार करने की प्रेरणा देता है कि संसार की वस्तुएं स्थायी रूप से हमारी नहीं हैं। आत्मा और परद्रव्य के भेद का चिंतन करते हुए ममत्व को घटाना ही इस धर्म की साधना है।
दशलक्षण धर्म पूजा में कहा गया है—परिग्रह चौबीस भेद, त्याग करैं मुनिराज जी।
तिसना भाव उछेद, घटती जान घटाइए॥ अर्थात परिग्रह के चौबीस भेदों का त्याग व्यवहार आकिंचन्य है और तृष्णा के भाव का क्षय निश्चय आकिंचन्य की दिशा है। गृहस्थ भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार परिग्रह और तृष्णा को धीरे-धीरे घटाने का अभ्यास कर सकता है।
24 प्रकार के परिग्रह
जैन परंपरा में परिग्रह को 10 बाह्य और 14 आभ्यंतर भेदों में समझाया गया है। बाह्य परिग्रह में भूमि/क्षेत्र, भवन, धन, धान्य, पशुधन आदि संपत्तियां तथा वस्त्र, पात्र आदि संग्रह की वस्तुएं आती हैं। आभ्यंतर परिग्रह में मिथ्यात्व, चार कषाय—क्रोध, मान, माया, लोभ—और नौ नोकषाय शामिल हैं। इसका संदेश केवल वस्तुएं छोड़ देना नहीं है। असली प्रश्न यह है कि क्या वस्तुएं हमारे पास हैं या हम वस्तुओं के वश में हैं? आकिंचन्य बाहरी संग्रह के साथ-साथ भीतर की पकड़ को भी ढीला करने की साधना है।
जहां तृष्णा, वहां चिंता
पूजा में कहा गया है—उत्तम आकिँचन गुण जानो, परिग्रह-चिंता दुख ही मानो।
फाँस तनक-सी तन में सालै, चाह लँगोटी की दुख भालै॥ शरीर में छोटी-सी फांस भी लगातार पीड़ा देती है, उसी तरह मन में छोटी-सी इच्छा भी चिंता का कारण बन सकती है। इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म लेती है और मनुष्य तृष्णा के इस क्रम में उलझता जाता है। इसलिए आकिंचन्य का अभ्यास इच्छाओं को पहचानने और उन्हें अनावश्यक रूप से बढ़ने न देने से शुरू होता है।
मुनि का निष्परिग्रह और गृहस्थ का आकिंचन्य
दिगंबर मुनिराज बाह्य और आंतरिक परिग्रह के पूर्ण त्याग की दिशा में साधना करते हैं। पूजा में उनकी निष्परिग्रह अवस्था की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है—धनि नगन पर तन-नगन ठाढ़े, सुर-असुर पायनि परैं। यह पंक्ति बाहरी वैभव की तुलना में निष्परिग्रह और आत्मसंयम की आध्यात्मिक प्रतिष्ठा को सामने रखती है। वहीं गृहस्थ के लिए आकिंचन्य का अर्थ संसार छोड़ देना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए धन-संपत्ति के प्रति अत्यधिक ममत्व को घटाना और उसका सदुपयोग करना है। जैन परंपरा गृहस्थ के लिए परिग्रह की मर्यादा और तृष्णा को कम करने पर भी बल देती है।
धन हो, लेकिन धन का मोह न हो
पूजा में एक अत्यंत व्यावहारिक संदेश आता है—घर मांहि तिसना जो घटावै, रूचि नहीं संसार सौ। बहु धन बुरा हू भला कहिये, लीन पर उपगार सौ॥ अर्थात बहुत धन होना अपने आप में आकिंचन्य के विपरीत बात नहीं है; प्रश्न है धन के प्रति हमारी आसक्ति और उसके उपयोग का। यदि संपत्ति का उपयोग परोपकार, सेवा, शिक्षा, चिकित्सा और जरूरतमंदों की सहायता में होता है तथा मन उसमें डूबा नहीं रहता, तो गृहस्थ जीवन में भी आकिंचन्य की भावना विकसित की जा सकती है।
त्याग से आगे—ममत्व का त्याग
आठवें धर्म उत्तम त्याग में हमने वस्तु, धन या संपत्ति को देने और छोड़ने की भावना सीखी। नौवां धर्म उससे एक कदम भीतर ले जाता है—वस्तु छोड़ने के साथ उस पर अपने अधिकार और ‘मेरा’ होने की मानसिक पकड़ को भी कम करना। इसलिए सरल शब्दों में— त्याग है—देना। आकिंचन्य है—यह मेरा है इस ममत्व को छोड़ना। जब मन संग्रह से अधिक आत्मचिंतन, उपयोग और परोपकार की ओर बढ़ता है, तब आकिंचन्य का भाव जीवन में उतरना शुरू होता है। जैन दर्शन में बाह्य परिग्रह के त्याग का उद्देश्य भी अंततः आंतरिक राग-द्वेष और ममत्व की शुद्धि से जुड़ा है।
उत्तम आकिंचन्य का आज के जीवन में संदेश
आज के समय में आकिंचन्य का अर्थ सब कुछ छोड़ देना नहीं, बल्कि जरूरत और लालच के बीच अंतर समझना है। जितना आवश्यक है उतना रखें, अनावश्यक संग्रह घटाएं, संपत्ति को साधन मानें साध्य नहीं, और मेरे से आगे बढ़कर हमारे तथा सबके हित की भावना विकसित करें। उत्तम आकिंचन्य हमें यह स्मरण कराता है कि वस्तुएं हमारे जीवन में रहें, लेकिन हमारा जीवन वस्तुओं में न उलझे। ममत्व जितना घटेगा, मन उतना हल्का होगा और आत्मचिंतन के लिए उतनी ही जगह बनेगी।
मंगल मंत्र -ॐ ह्रीं उत्तम आकिंचन्यधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा॥


