भारत अपनी स्वदेशी रक्षा विनिर्माण क्षमता का विस्तार तेजी से कर रहा है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह के अनुसार, देश में लड़ाकू विमानों की दूसरी उत्पादन लाइन स्थापित करने की योजना है। इसका उद्देश्य एक ही स्रोत पर निर्भरता कम करना और उत्पादन क्षमता बढ़ाना है। साथ ही, मिसाइलों के निर्माण में अधिक प्राइवेट कंपनियों को शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है, ताकि उत्पादन में विविधता और स्केल सुनिश्चित हो सके, साथ ही नए- नए इनोवेशन इस क्षेत्र में भी लगातार सुनिश्चित किये जा सकें।
भारत द्वारा किये जा रहे रक्षा निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। पिछले वर्ष यह आंकड़ा 38,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जिसमें आकाश एयर डिफेंस मिसाइल जैसी प्रणालियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। भारत 2030 के निर्धारित लक्ष्य से लगभग दो वर्ष पहले, यानी 2028 तक 50,000 करोड़ रुपये के रक्षा निर्यात लक्ष्य को हासिल कर सकता है। यह उपलब्धि न केवल आर्थिक बल्कि सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
आकाश जैसी प्रणालियों की सफलता वैश्विक बाजार में भारतीय रक्षा उत्पादों की विश्वसनीयता बढ़ा रही है। लागत प्रभावी और युद्ध में टेस्ट किये हुए सिस्टम कई देशों को आकर्षित कर रहे हैं। निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी और सार्वजनिक उपक्रमों के साथ सहयोग से रक्षा क्षेत्र का औद्योगिक आधार मजबूत हो रहा है।
यह बदलाव भारत को रक्षा उपकरणों के आयातक से निर्यातक के रूप में स्थापित कर रहा है। लड़ाकू विमानों की दूसरी उत्पादन लाइन और मिसाइल निर्माण में विस्तार से आत्मनिर्भरता मजबूत होगी तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की भूमिका और प्रभावी बनेगी। रक्षा क्षेत्र में यह प्रगति न केवल सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करेगी, बल्कि देश की रणनीतिक स्वायत्तता को भी नई ऊंचाई देगी, साथ ही भारत की अर्थव्यवस्था भी इससे मजबूत हो जाएगी।


