भय और अंधकार का नाश करती हैं मां कालरात्रि

नवरात्रि के सातवें दिन होती है शुभंकरी देवी की आराधना, साहस, आत्मबल और धर्म की रक्षा का देती हैं संदेश

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sadbhawnapaati
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ज्योतिषाचार्य श्री विनोद जैन (प्रभु),
दैनिक सदभावना पाती

इंदौर। मां कालरात्रि का दिव्य स्वरूप -शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। इस वर्ष सप्तमी तिथि 17 अक्टूबर, शनिवार को है। मां का स्वरूप भले ही अत्यंत उग्र और भयंकर दिखाई देता है, लेकिन भक्तों के लिए वे कल्याणकारी हैं। इसी कारण उन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि मां की आराधना भय, निराशा और संकटों का सामना करने का साहस प्रदान करती है।

पौराणिक कथा और महिमा

देवी के कालरात्रि स्वरूप का वर्णन दुर्गा-परंपरा और देवी माहात्म्य से जुड़ी धार्मिक कथाओं में मिलता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, देवी ने दुष्ट शक्तियों के विनाश के लिए अपना उग्र रूप धारण किया। शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज जैसे असुरों के विरुद्ध देवी के युद्ध का वर्णन देवी माहात्म्य में मिलता है। मां कालरात्रि का नाम अंधकार और भय के विनाश से जोड़ा जाता है। उनका संदेश है कि अन्याय और नकारात्मक परिस्थितियों के सामने हार मानने के बजाय विवेक तथा साहस से उनका सामना करना चाहिए।

मां का स्वरूप और प्रतीक

मां कालरात्रि का वर्ण अंधकार के समान श्याम है। उनके केश खुले हुए, तीन नेत्र तेजस्वी और श्वास अग्नि के समान बताई गई है। वे गर्दभ अर्थात गधे पर सवार रहती हैं। उनके चार हाथों में से दो अभय और वरद मुद्रा में होते हैं, जबकि अन्य हाथों में लोहे का अस्त्र और खड्ग दर्शाए जाते हैं। यह स्वरूप बताता है कि मां अपने भक्तों को निर्भयता प्रदान करती हैं और दुष्ट प्रवृत्तियों का विनाश करती हैं।

आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्त्व

योग की कुछ परंपराओं में मां कालरात्रि को सहस्रार चक्र से जोड़ा जाता है, जिसे आध्यात्मिक चेतना और आत्मबोध का प्रतीक माना गया है। वैदिक ज्योतिष की प्रचलित मान्यता में उनका संबंध शनि ग्रह से भी बताया जाता है। शनि को कर्म, अनुशासन और न्याय का कारक माना जाता है। ज्योतिषाचार्य श्री विनोद जैन (प्रभु), इंदौर के अनुसार, मां की उपासना को कठिन समय में धैर्य, आत्मबल और सकारात्मक संकल्प बनाए रखने की साधना के रूप में देखा जा सकता है। शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या के दौरान भी अनेक श्रद्धालु मां का स्मरण करते हैं; हालांकि पूजा से ग्रह-दोष या जीवन की बाधाएं निश्चित रूप से समाप्त होने का दावा नहीं किया जा सकता।

मंत्र, पूजा-विधि और भोग
मां कालरात्रि का मूल मंत्र है— “ॐ देवी कालरात्र्यै नमः॥”

उनका ध्यान करते समय यह श्लोक पढ़ा जाता है—

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्त शरीरिणी॥

पूजा में स्वच्छता, श्रद्धा और शांत मन का विशेष महत्त्व है। मां को गुड़ अथवा गुड़ से बने पदार्थों का भोग अर्पित करने की परंपरा है। घी का दीपक जलाकर दुर्गा सप्तशती, मां के मंत्रों और स्तुति का पाठ किया जा सकता है। भक्त अपनी परंपरा के अनुसार 108 बार मूल मंत्र का जाप भी करते हैं।

नक्षत्रों का संदर्भ और मां का संदेश

पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद— इन तीनों नक्षत्रों के स्वामी पारंपरिक वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति माने जाते हैं। इनके उल्लेख को ज्योतिषीय संदर्भ के रूप में समझना चाहिए, न कि मां कालरात्रि के विशेष आशीर्वाद का शास्त्रीय प्रमाण। मां कालरात्रि हमें सिखाती हैं कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, साहस और विश्वास का दीपक बुझने नहीं देना चाहिए। सच्ची शक्ति भय पैदा करने में नहीं, बल्कि भय पर विजय पाकर सत्य, न्याय और धर्म के मार्ग पर अडिग रहने में है।

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