वित्तीय वर्ष 2025-26 (31 मार्च 2026) में भारत के डिफेन्स निर्यात ने अभूतपूर्व ऊंचाई हासिल कर ली है। रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, निर्यात पिछले वर्ष के ₹23,622 करोड़ की तुलना में 62.66 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी के साथ ₹38,424 करोड़ (लगभग 4.1 अरब डॉलर) पहुंच गया है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस उपलब्धि को “भारतीय स्वदेशी क्षमताओं और उन्नत विनिर्माण शक्ति में विश्व स्तर का भरोसा” बताया। उन्होंने कहा कि ₹14,802 करोड़ की यह छलांग डिफेन्स क्षेत्र में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के मजबूत सहयोग का परिणाम है। इस वर्ष डिफेन्स निर्यातकों की संख्या भी 13.3 प्रतिशत बढ़कर 145 हो गई है।
सार्वजनिक क्षेत्र के डिफेन्स उपक्रमों (DPSUs) ने कुल निर्यात का 54.84 प्रतिशत (₹21,071 करोड़) योगदान दिया, जबकि निजी क्षेत्र ने 45.16 प्रतिशत (₹17,353 करोड़) का हिस्सा रखा। निर्यात की गई वस्तुओं में ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल, पिनाका रॉकेट लॉन्चर, आकाश एयर डिफेन्स सिस्टम, ATAGS तोपखाने, रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, आर्मर्ड वाहन, डॉर्नियर-228 विमान, हल्की टॉरपीडो और विशेष नौसैनिक नौकाएं शामिल हैं। ये उत्पाद वर्तमान में 80 से अधिक देशों में पहुंच चुके हैं।
अर्मेनिया, फिलीपींस, अमेरिका और फ्रांस जैसे देश अब भारत से महत्वपूर्ण डिफेन्स उपकरण खरीद रहे हैं। यह प्रवृत्ति भारत को पारंपरिक हथियार आपूर्तिकर्ताओं का विश्वसनीय विकल्प बनाती जा रही है।
रणनीतिक महत्व
यह उपलब्धि मात्र आंकड़ों की सफलता नहीं है। दशकों तक दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक रहने के बाद भारत अब निर्यातक के रूप में उभर रहा है। इससे देश की रणनीतिक स्वायत्तता मजबूत हो रही है, विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ रहा है और लाखों युवाओं को रोजगार के अवसर मिल रहे हैं।
मध्य प्रदेश इस राष्ट्रव्यापी प्रयास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। राज्य में 13,000 से अधिक MSMEs डिफेन्स क्षेत्र से जुड़े हैं जो निर्यात ऑर्डर के लिए क्रिटिकल कंपोनेंट्स सप्लाई कर रहे हैं।
डिफेन्स विशेषज्ञों का मानना है कि यह रिकॉर्ड निर्यात न केवल आत्मनिर्भर भारत अभियान की सफलता दर्शाता है, बल्कि आने वाले वर्षों में भारत को वैश्विक डिफेन्स मार्केट में और मजबूत स्थिति दिलाएगा। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत एक विश्वसनीय और जिम्मेदार डिफेन्स भागीदार के रूप में अपनी पहचान बना रहा है।


