भारतीय थलसेना के सेनाध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने रिटायरिंग ऑफिसर्स सेमिनार (आरओएस) के दौरान उन अधिकारियों से सीधा संवाद किया, जो 30 अप्रैल 2026 को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। इस अवसर पर उन्होंने उनके लंबे सैन्य जीवन में राष्ट्र और संगठन के प्रति निभाई गई निःस्वार्थ सेवा की मुक्त कंठ से सराहना की। साथ ही उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सेवानिवृत्ति के बाद भी ये अनुभवी अधिकारी राष्ट्र-निर्माण में सकारात्मक भूमिका निभाते रहेंगे।
यह आयोजन मात्र औपचारिक विदाई का कार्यक्रम नहीं था। सेनाध्यक्ष ने स्पष्ट रूप से कहा कि इन अधिकारियों का योगदान थलसेना की मजबूती का आधार रहा है और भविष्य में भी उनका ज्ञान तथा अनुभव देश की सुरक्षा तथा विकास की प्रक्रिया में उपयोगी सिद्ध होगा। इस दौरान इन्फैंट्री स्कूल के कमांडेंट लेफ्टिनेंट जनरल गजेंद्र जोशी, जो स्वयं 30 अप्रैल को सेवानिवृत्त हो रहे हैं, का भी विशेष सम्मान किया गया। उनकी व्यावसायिक उपलब्धियों और नेतृत्व क्षमता को रेखांकित करते हुए सेनाध्यक्ष ने उन्हें पुष्पगुच्छ देकर श्रद्धांजलि अर्पित की।
भारतीय थलसेना की यह परंपरा वास्तव में अनुपम है। विश्व की अधिकांश सेनाओं में सेवानिवृत्ति को करियर का अंत माना जाता है, लेकिन यहां इसे राष्ट्रसेवा के एक नए अध्याय की शुरुआत के रूप में देखा जाता है। सेना प्रमुख द्वारा स्वयं इन अधिकारियों से मुलाकात करना, उनके अनुभवों को सम्मान देना और उन्हें भविष्य की जिम्मेदारियों के लिए प्रोत्साहित करना थलसेना के मूल्यों, समर्पण, निरंतरता और एकजुटता, का जीवंत प्रमाण है। यह परंपरा न केवल सेवानिवृत्त अधिकारियों के मनोबल को ऊंचा रखती है, बल्कि युवा सैनिकों और अधिकारियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनती है।
आज के बदलते सुरक्षा परिदृश्य में जब थलसेना आधुनिक युद्ध प्रौद्योगिकी और नई चुनौतियों का सामना कर रही है, तब ऐसे कार्यक्रम ज्ञान के हस्तांतरण और संस्थागत स्मृति को जीवंत रखने का प्रभावी माध्यम सिद्ध होते हैं। ‘रक्षा सम्वाद’ स्तंभ इस अनूठी परंपरा की हार्दिक सराहना करता है, जो दर्शाती है कि भारतीय सेना अपने जवानों को कभी ‘पूर्व’ नहीं मानती, वे सदैव राष्ट्र की सेवा में सक्रिय रहते हैं।


