अरुणाचल प्रदेश के अंजॉ जिले में लोहित नदी पर बना 800 फुट से अधिक लंबा करोती पुल सीमावर्ती क्षेत्रों की जीवन रेखा है। यह पुल काहो जैसे भारत के पूर्वी सीमांत गांवों को मुख्य भूमि से जोड़ता है, जहां भौगोलिक कठिनाइयां, तेज धारा और सुरक्षा चुनौतियां सामान्य जीवन को जटिल बना देती हैं। हाल ही में एक ओवरलोडेड डम्पर के कारण इस पुल को नुकसान पहुंचा। सामान्य परिस्थितियों में नागरिक मशीनरी यहां काम नहीं कर सकती थी, लेकिन बॉर्डर रोड आर्गेनाईजेशन (बीआरओ) के कर्मयोगियों ने विपरीत परिस्थितियों में इंजीनियरिंग की मिसाल पेश की।
प्रोजेक्ट उदयक के 116 आरसीसी/48 टीएफ की टीम ने उच्च जोखिम वाले वातावरण में सबसे पहले स्थिति को स्थिर किया और फंसे हुए डम्पर को सुरक्षित बाहर निकाला। इसके बाद चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में आवश्यक मरम्मत कार्य पूरा कर पुल को हल्के वाहनों के आवागमन के लिए फिर से खोल दिया गया। महानिदेशक बॉर्डर रोड्स (डीजीबीआर) ने लेफ्टिनेंट कर्नल एपीएस नेगी, कैप्टन मयंक जोशी, कैप्टन शुभम एम नेसारगी, इक्विपमेंट/मैकेनिक देवेंद्र कुमार और एमटी/ड्राइवर सुखजीत सिंह की पेशेवर प्रतिबद्धता की सराहना की।
यह घटना केवल एक पुल की मरम्मत की कहानी नहीं है। यह दर्शाती है कि भारतीय सशस्त्र बल और बीआरओ केवल युद्ध या रक्षा कार्यों तक सीमित नहीं हैं। वे उन सीमांत क्षेत्रों में जीवन को सुचारू बनाए रखते हैं, जहां मौसम, भूगोल और सुरक्षा की असामान्य स्थितियां नागरिक तंत्र की क्षमता से परे होती हैं। ‘श्रामेण सर्वम् साध्यम्’ का सिद्धांत यहां साकार होता है। करोती पुल का पुनर्स्थापन सीमा अवसंरचना की मजबूती और रणनीतिक गतिशीलता का जीवंत प्रमाण है। सीमांत सुरक्षा केवल बंदूकों से नहीं, बल्कि ऐसी अदम्य इंजीनियरिंग क्षमता से भी सुनिश्चित होती है।


