सोशल मीडिया (X) पर हाल ही में यह दावा तेजी से फैला कि अमेरिकी सेना कतर, बहरीन, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सीरिया और जॉर्डन सहित पूरे खाड़ी क्षेत्र से अपने सैन्य ठिकाने समेट रहा है। इन दावों के साथ सैनिकों की रवानगी के वीडियो प्रसारित किए गए। हालांकि, पेंटागन के आधिकारिक बयान ने उक्त दावों को ख़ारिज करने की कोशिश की है पर अमरीका का हाल का इतिहास देखा जाये तो वे दावे सही प्रतीत होते हैं।
पेंटागन के अनुसार, केवल इराक में ‘ऑपरेशन इनहेरेंट रिज़ॉल्व’ (OIR) मिशन औपचारिक रूप से समाप्त हुआ है और 30 सितंबर 2026 को इरबिल एयर बेस से अंतिम अमेरिकी टुकड़ी की वापसी हुई है। इस मिशन का मुख्यालय अब जॉर्डन स्थानांतरित कर दिया गया है। यद्यपि ईरानी हमलों से कुछ सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचा है और फ़ोर्स रिस्ट्रक्चरिंग की समीक्षा जारी है, लेकिन व्यापक सैन्य वापसी की कोई घोषणा नहीं हुई है।
इसके बावजूद, वैश्विक मंच पर अमेरिका की इस रणनीतिक गतिविधि को लेकर संशय गहराना स्वाभाविक है। इतिहास गवाह है कि वाशिंगटन की विदेश नीति प्रायः एक तय ढर्रे पर चलती है। जिन देशों ने अमेरिकी निर्देशों का पालन नहीं किया, उन्हें ‘आतंकवाद का केंद्र’ या ‘जनसंहार के हथियारों’ (WMD) से लैस घोषित कर दिया गया। तत्पश्चात, सैन्य हस्तक्षेप किया गया। लेकिन कठिन परिस्थितियों, विषम मौसम और स्थानिक प्रतिरोध के चलते अंततः वियतनाम और अफगानिस्तान की तर्ज पर अमेरिकी सेनाओं को पीछे हटना पड़ा।
इराक से हालिया वापसी को अमेरिका रणनीतिक पुनर्संयोजन (Strategic Realignment) के रूप में दिखाने की कोशिश कर रहा है परंतु, ऐतिहासिक अनुभवों के आधार पर वैश्विक समुदाय इसे अमेरिका की गिरती क्षेत्रीय विश्वसनीयता और ‘रणनीतिक थकावट’ के संकेत के रूप में देख रहा है। अमेरिका का इतिहास ही उसकी वर्तमान प्रतिबद्धताओं पर संदेह की सबसे बड़ी वजह बना हुआ है।


