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(विचार मंथन) एमएसपी की ओर 

लेखक-सिद्धार्थ शंकर

केंद्र सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर एमएसपी और किसानों की अन्य मांगों को लेकर एक कमेटी का गठन कर दिया है। जीरो बजट आधारित कृषि को बढ़ावा देने, फसल का पैटर्न बदलने और न्यूनतम समर्थन मूल्य को ज्यादा असरदार व पारदर्शी बनाने  के लिए एक समिति का गठन कर दिया गया है। समिति न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली को मजबूत करने  के उपाय सुझाएगी। बताया जा रहा है कि कमेटी में 16 सदस्यों को नामित किया गया है। कमेटी में दस लोगों की जगह सरकारी अधिकारियों  के लिए रखे गए हैं। संयुक्त किसान मोर्चा की ओर से कोई नाम नहीं दिए जाने के कारण कमेटी में उस के किसी प्रतिनिधि को जगह नहीं मिली है। हालांकि, तीन स्थान उसके लिए खाली रखा गया है। यानी कमेटी में अध्यक्ष समेत कुल 29 सदस्य होंगे। पूर्व कृषि सचिव संजय अग्रवाल को अध्यक्ष बनाया गया है। संयुक्त सचिव (फसल) कमेटी के सदस्य सचिव होंगे। कमेटी बनाने के साथ ही सरकार ने अपना एक वादा पूरा कर दिया है, जिसे लेकर एक साल से भी ज्यादा समय तक किसान आंदोलनरत थे। कुछ महीनों बाद गुजरात और हिमाचल के चुनाव हैं। अगले साल कई राज्यों  के विधानसभा चुनाव होने हैं और इसके बाद लोकसभा चुनाव। ऐसे में, सरकार को लगा होगा कि किसानों की नाराजगी को नजरअंदाज करना राजनीतिक रूप से काफी जोखिम-भरा साबित हो  सकता है। सरकार की कमेटी गठन की घोषणा इसलिए भी सही है क्योंकि एमएसपी की घोषणा  के बाद भी, कई जगह उस दर पर खरीद के लिए किसानों को आंदोलन करना पड़ता है। दरअसल, एमएसपी का मसला ऐसा है जिस पर कृषि विशेषज्ञ और अर्थशास्त्रियों  के बीच भी आम राय आसानी से नहीं बनती दिखती। जहां एक वर्ग का मानना है कि एमएसपी कानून बनने से ही छोटे किसानों को उपज का लाभ मिल पाएगा, वहीं ऐसा नहीं मानने वाला वर्ग कहीं ज्यादा बड़ा है। इसीलिए सरकार इस मुद्दे पर कोई राय नहीं बना पा रही थी। मगर अब इस दिशा में पहल शुरू हो गई है। हालांकि एमएसपी की व्यवस्था देश में छठे दशक  के दौरान खाद्यान्न संकट के दौरान शुरू की गई थी, ताकि सरकार किसानों से उपज खरीदे और भंडार भरे। यह किसानों  के हित  के लिए ही किया गया था। पर आज सरकारी गोदाम गेहूं, चावल आदि से अटे पड़े होने का दावा किया जा रहा है। बात यहीं खत्म नहीं होती। विश्व व्यापार संगठन खाद्यान्न खरीद पर सब्सिडी का विरोध करता रहा है। ऐसे में अगर सब्सिडी बढ़ती रही तो निर्यात का संकट खड़ा हो जाएगा। कहा यह भी जाता रहा है कि एमएसपी से छोटे और सीमांत किसानों को कोई लाभ नहीं होता है, सिर्फ पांच-छह फीसद बड़े किसान ही इसका फायदा उठाते हैं। इससे तो एमएसपी व्यवस्था की प्रासंगिकता पर ही सवाल खड़ा हो जाता है। इस बात से कोई इनकार नहीं करेगा कि किसानों को उपज का पूरा दाम मिलना चाहिए। अगर मौजूदा व्यवस्था से समाधान नहीं निकल रहा है तो इस के लिए नए उपायों पर विचार किया जाना चाहिए। एमएसपी संकट का हल तो कृषि विशेषज्ञों, कृषि अर्थशास्त्रियों और किसान संगठनों  के नुमाइंदों की समिति को ही खोजना होगा। प्रधानमंत्री इस मसले पर समिति बनाने की बात कह चुके हैं। दरअसल, पूरी दुनिया में कृषि और कृषि बाजार का स्वरूप बदल रहा है। हम बाजार आधारित वैश्विक अर्थव्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में वक्त  के साथ बदलने की जरूरत है। सबसे बड़ी बात तो यही कि जो भी कदम उठाए जाएं, वे मुट्ठीभर किसानों  के हितों  के लिए नहीं हो, बल्कि अस्सी फीसद से ज्यादा छोटे और मझोले किसानों  के हितों को पूरा करने वाले हों।
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