भारतीय सेना की स्वदेशी लाइट टैंक परियोजना जोरावर की कमीशनिंग अब 2028-29 तक खिसक गया है। सेना ने टैंक के कवच को स्टैनाग लेवल-4 से लेवल-6 तक उन्नत करने की माँग की है, ताकि यह 30 मिमी आर्मर-पियर्सिंग राउंड का मुकाबला कर सके। इसका कारण है कि भारतीय नीति निर्धारकों ने हाल ही में रूस- यूक्रेन युद्ध के दौरान इस बात का एहसास किया कि 30 मिमी आर्मर-पियर्सिंग राउंड से साधारण टैंकों को काफी नुक्सान होता है और कई बार वे हमलों के कारण निष्क्रिय तक हो जाते हैं। यह आवश्यकता सुरक्षा को प्राथमिकता देती है, लेकिन वजन और गतिशीलता पर सीधा असर डालती है।
वर्तमान में जोरावर लगभग 25 टन वजन का है और 760 हॉर्सपावर के कमिंस इंजन से संचालित होता है। भारी कवच जोड़ने से वजन 30-32 टन तक पहुँच सकता है। इससे पावर-टू-वेट अनुपात घट जाएगा, पहाड़ी इलाकों में प्रदर्शन प्रभावित होगा और संभवतः अधिक शक्तिशाली इंजन के साथ नए परीक्षणों की जरूरत पड़ेगी। चीन का टाइप-15 टैंक 33-36 टन वजन और 1000 हॉर्सपावर इंजन के साथ तैनात है, लेकिन भारतीय योजनाकार स्पष्ट हैं कि जोरावर उसकी नकल नहीं होनी चाहिए। हमारी भू-रणनीतिक जरूरतें, उच्च हिमालयी क्षेत्रों में तीव्र गतिशीलता और एयर-ट्रांस्पोर्टेबिलिटी, अलग हैं।
सेना कुल 354 टैंकों की योजना बना रही है। शुरुआती 59 टैंक डीआरडीओ और एलएंडटी द्वारा विकसित की जाएँगी। शेष 295 के लिए टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स की टेंडर राशि सबसे कम आयी है, पर अनुबंध अभी अंतिम नहीं हुआ है।
यह सही दिशा है कि हम अपनी परिचालन आवश्यकताओं पर केंद्रित रहें, न कि केवल प्रतिद्वंद्वी के प्लेटफॉर्म की प्रतिकृति बनाएँ। फिर भी, सीमा पर निरंतर तनाव और आधुनिक खतरों को देखते हुए विलंब चिंता का विषय है। स्वदेशी क्षमता निर्माण के साथ-साथ समयबद्धता भी जरूरी है। जोरावर को जल्द से जल्द परिचालन क्षमता हासिल करनी चाहिए, ताकि उत्तरी सीमाओं पर प्रभावी निरोध सुनिश्चित हो सके। सुरक्षा और गति का सही संतुलन ही इसकी सफलता की कुंजी होगा।


