हिंद महासागर क्षेत्र में बदलते सामरिक समीकरणों के बीच अंडमान & निकोबार कमांड का महत्व निरंतर बढ़ता जा रहा है। हाल ही में नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी का अंडमान-निकोबार दौरा केवल एक औपचारिक सैन्य यात्रा नहीं, बल्कि भारत की समुद्री रणनीति के व्यापक परिप्रेक्ष्य को रेखांकित करने वाला संकेत है। वे कल अपनी पत्नि शशि त्रिपाठी के साथ इस द्वीप समूह के श्री विजयपुरम पहुंचे और उनका यह दौरा आज दोपहर को समाप्त हुआ।
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भौगोलिक रूप से मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित हैं, जो वैश्विक व्यापार के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है। इस क्षेत्र पर प्रभावी निगरानी का अर्थ है एशिया-प्रशांत में सामरिक संतुलन पर सीधा प्रभाव। यही कारण है कि चीन अपनी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ नीति के तहत हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति लगातार बढ़ा रहा है।
ऐसे परिदृश्य में अंडमान-निकोबार कमांड भारत के लिए एक ‘फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस’ की भूमिका निभाता है, जहां से नौसेना, वायुसेना और थलसेना संयुक्त रूप से कार्य करती हैं। नौसेना प्रमुख द्वारा ‘ऑपरेशनल सिनर्जी’ और ‘इंटीग्रेशन’ पर दिया गया जोर इस बात का संकेत है कि भविष्य के युद्ध केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि संयुक्त संचालन क्षमता से जीते जाएंगे।
इस दौरे के दौरान सैनिकों की उच्च स्तरीय तत्परता और पेशेवर दक्षता की सराहना भी महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि भारत न केवल अपनी समुद्री सीमाओं की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता में भी सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार है।
वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियों में, अंडमान-निकोबार केवल एक द्वीप समूह नहीं, बल्कि भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ और इंडो-पैसिफिक रणनीति का केंद्रबिंदु बन चुका है। आने वाले समय में इस क्षेत्र में बुनियादी ढांचे, निगरानी तंत्र और सैन्य संसाधनों का और सुदृढ़ीकरण भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं में शीर्ष पर रहेगा।


