उत्तम तप : इच्छाओं का संयम, कर्मों की निर्जरा और आत्मशुद्धि की साधना

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ज्योतिषाचार्य श्री विनोद जैन (प्रभु)

Best Astrologer in Indore। दशलक्षण पर्व के सातवें दिन उत्तम तप धर्म की आराधना की जाती है। सामान्यतः तप का अर्थ उपवास या भोजन का त्याग समझ लिया जाता है, लेकिन जैन दर्शन में तप का अर्थ इससे कहीं व्यापक है। कर्मों की निर्जरा और आत्मशुद्धि के लिए इच्छाओं का निरोध करना ही तप का मूल भाव है। तत्त्वार्थसूत्र में स्पष्ट कहा गया है— तपसा निर्जरा च, अर्थात तप के द्वारा कर्मों की निर्जरा होती है।

कर्म-शिखर को तोड़ने वाला वज्र

दशलक्षण धर्म पूजा में कहा गया है—तप चाहैं सुरराय, करम-शिखर को वज्र है।
द्वादशविधि सुखदाय, क्यों न करै निज सकतिसम॥ अर्थात देवों के राजा इन्द्र भी जिस तप की कामना करते हैं, वह कर्म रूपी पर्वत को तोड़ने के लिए वज्र के समान है। तप के बारह प्रकार बताए गए हैं और अपनी शक्ति के अनुसार उनका पालन करने की प्रेरणा दी गई है। यह मूल पद दशलक्षण पूजा के विभिन्न प्रामाणिक पाठों में मिलता है।

उत्तम तप के बारह स्वरूप

जैन आगम परंपरा में तप को छह बाह्य और छह अंतरंग तप में विभाजित किया गया है। बाह्य तप हैं— अनशन, ऊनोदर, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन और कायक्लेश। अंतरंग तप हैं— प्रायश्चित, विनय, वैयावृत्त्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान इससे स्पष्ट होता है कि तप केवल शरीर से जुड़ी साधना नहीं है। स्वाध्याय, विनय, प्रायश्चित, ध्यान और त्याग भी तप के महत्वपूर्ण स्वरूप हैं।

अनादि से भटकता जीव और दुर्लभ मनुष्य जन्म

पूजा में आगे कहा गया है—उत्तम तप सब माहिं बखाना, करम-शैल को वज्र-समाना।
बस्यो अनादि निगोद मँझारा, भू-विकलत्रय-पशु तन धारा॥ जैन दर्शन जीव की अनादि संसार-यात्रा का स्मरण कराता है। जीव ने असंख्य पर्यायों में जन्म-मरण किया है। ऐसे अनंत भ्रमण के बाद प्राप्त मनुष्य जन्म को अत्यंत दुर्लभ माना गया है।

इसी भाव को अगली पंक्तियां और गहरा करती हैं— धारा मनुष तन महादुर्लभ, सुकुल आयु निरोगता। श्रीजैनवाणी तत्त्वज्ञानी, भई विषय-पयोगता॥ मनुष्य जन्म, अनुकूल परिस्थितियां, स्वास्थ्य, जिनवाणी का श्रवण और तत्त्वज्ञान का अवसर मिलने के बाद भी यदि जीवन केवल विषय-भोगों में निकल जाए, तो यह अवसर की बड़ी उपेक्षा है।

विषय और कषाय का त्याग ही तप की सार्थकता

पूजा में कहा गया है—अति महा दुरलभ त्याग विषय, कषाय जो तप आदरैं।
नर-भव अनूपम कनक घर पर, मणिमयी कलसा धरैं॥ विषयों और कषायों—क्रोध, मान, माया और लोभ—से ऊपर उठकर तप को अपनाना मनुष्य जीवन को सार्थक बनाना है। स्वर्ण के सुंदर भवन पर मणियों का कलश रखने की उपमा इसी श्रेष्ठता को दर्शाती है।

तप का वास्तविक अर्थ क्या है? तप का अर्थ स्वयं को पीड़ा देना नहीं है। यदि बाहरी तप के साथ भीतर इच्छाओं, अहंकार, आसक्ति और कषायों का विस्तार होता रहे, तो तप का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होता। जैन परंपरा में इच्छाओं के निरोध को तप का महत्वपूर्ण लक्षण माना गया है। इसीलिए तप को केवल “भूखा रहना” समझना अधूरा है। भोजन का त्याग बाह्य तप का एक स्वरूप है, जबकि अपने भीतर की वासनाओं, आसक्तियों और अनियंत्रित इच्छाओं को शांत करना तप की गहरी साधना है।

संयम के बाद तप : संवर से निर्जरा की ओर, दशलक्षण के छठे धर्म उत्तम संयम में इन्द्रियों, मन और जीवों के प्रति आचरण को नियंत्रित करने की साधना है। उत्तम तप उस साधना को आगे बढ़ाते हुए कर्मों की निर्जरा की दिशा में ले जाता है। तत्त्वार्थसूत्र का सूत्र -तपसा निर्जरा च – इसी संबंध को स्पष्ट करता है।

इसलिए सरल शब्दों में कहा जा सकता है— संयम से नए कर्मों के आस्रव को रोकने की साधना होती है और तप कर्मों की निर्जरा का साधन बनता है। हालांकि -कर्मों को जलाना- यहां आध्यात्मिक अर्थ में कर्म-निर्जरा का रूपक है, इसे शाब्दिक अग्नि से कर्म जलाना नहीं समझना चाहिए।

आज के जीवन में उत्तम तप

आज तप का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि हम अपनी अनावश्यक इच्छाओं को पहचानें। भोजन में संयम रखें, स्वाद की गुलामी से बचें, क्रोध आने पर मौन और विवेक रखें, लोभ बढ़े तो संतोष का अभ्यास करें, समय निकालकर स्वाध्याय और ध्यान करें तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार धार्मिक तप करें। तप शरीर को कमजोर करने के लिए नहीं, आत्मबल को जागृत करने के लिए है। बाहरी तप के साथ यदि भीतर की इच्छाएं शांत होती हैं, तो साधना आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ती है।

उत्तम तप का संदेश

उत्तम तप हमें याद दिलाता है कि मनुष्य जीवन केवल भोग के लिए नहीं, आत्मबोध और आत्मशुद्धि के लिए भी मिला है। अपनी शक्ति के अनुसार तप, स्वाध्याय, ध्यान, त्याग और इच्छाओं के निरोध का अभ्यास ही इस दुर्लभ मानव जीवन को सार्थक बनाने की दिशा है।

ॐ ह्रीं उत्तम तपधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

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