‘रक्षा संवाद’ कॉलम का उद्देश्य महज सैन्य विषयों को उठाना ही नहीं है, बल्कि देश और दुनिया के सामने जो चुनौतियाँ दिख रही हैं, उनपर प्रकाश डालना भी है। फ्रांस के वर्तमान हालात में सुरक्षा का आकलन केवल सैन्य क्षमता से नहीं किया जा सकता। फ्रांस में सितंबर 2026 के मध्य से पेरिस क्षेत्र के लाइसी से शुरू हुआ कथित छात्र असंतोष देशभर के 700 से अधिक विद्यालयों तक पहुंचा। ब्लॉकेड, वॉकआउट के बीच लगभग 5,000 लोगों, जिनमें बड़ी संख्या नाबालिगों की बताई गई, की गिरफ्तारी, पुलिस, कर्मचारियों और प्रदर्शनकारियों के घायल होने की खबरें आईं। जर्जर सुविधाओं और कथित लंबे शैक्षणिक कार्यक्रमों से उपजा असंतोष हिंसा और संपत्ति क्षति के आरोपों से घिर गया। बेलफोर्ट की घटना, जिसमें सादे कपड़ों में मौजूद अधिकारी ने उथले पानी में एक किशोर को पकड़ने का प्रयास किया और बाद में उस पर हमला हुआ, संकट की गंभीरता दिखाती है। कमाल की बात है कि जिस पानी में छात्र को डुबोने के आरोप विपक्षी ताकतें लगा रही हैं, जब उस नाले में पानी को देखा गया तो पाया कि उस स्थान पर महज 19 सेमी पानी ही था। जाहिर है इतने से पानी में किसी को डुबाकर मारा नहीं जा सकता है, पर उस घटना को सोशल मीडिया पर दिखा कर पूरे फ्रांस में युवाओं को सरकार के विरुद्ध एक सोची समझी चाल के माध्यम से कर दिया गया।
सबक महत्वपूर्ण है- फ्रांस के पास अत्याधुनिक राफेल लड़ाकू विमान, आधुनिक हथियार प्रणालियां और सक्षम सुरक्षा ढांचा है, लेकिन ऐसे आंतरिक संकटों का समाधान सैन्य शक्ति से नहीं होता, हो भी नहीं सकता है। सोशल मीडिया यदि कृत्रिम असंतोष को संगठित करने, उकसाने और हिंसा बढ़ाने का माध्यम बन जाए, तो सैन्य श्रेष्ठता की उपयोगिता सीमित हो जाती है। बाहरी तत्वों द्वारा आंदोलनों को प्रभावित या वित्तपोषित किए जाने के आरोपों की जांच अत्यंत आवश्यक है।
भारत के लिए चेतावनी गंभीर है। विद्यालयों के विद्यार्थियों, यहां तक कि आदिवासी छात्रावासों की छात्राओं के मांगों को लेकर लंबी पदयात्राओं और देर रात प्रदर्शनों को केवल स्थानीय छात्र असंतोष मानकर नजरअंदाज करना दूरदर्शिता नहीं होगी। यदि बाहरी मार्गदर्शन, डिजिटल लामबंदी या संगठित उकसावे के संकेत मिलें, तो खुफिया और प्रशासनिक संस्थाओं को कानूनसम्मत ढंग से स्थिति समझनी चाहिए।
भारत की 13 लाख से अधिक की सेना, पुलिस और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल सुरक्षा के मजबूत स्तंभ हैं, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में विद्यार्थियों के विरुद्ध बल प्रयोग समाधान नहीं हो सकता। सुरक्षा-क्षमता संकट को हिंसक चरण तक पहुंचने से पहले पहचानने में है। यदि राष्ट्र समय रहते कृत्रिम सामाजिक असंतोष, डिजिटल प्रभाव और संगठित लामबंदी को नहीं समझता, तो राफेल, गोला-बारूद और सुरक्षा तंत्र भी आंतरिक अस्थिरता रोकने में पर्याप्त नहीं होंगे। यही सब श्रीलंका, बांग्लादेश व नेपाल में पहले ही हो चुका है और भारत के लिए ‘फ्रांस प्रयोग’ एक रणनीतिक सबक है।


