पूर्वी चीन सागर और ओकिनावा तट के ऊपर अमेरिकी मरीन कॉर्प के प्रथम मरीन एयरक्राफ्ट विंग के सीएच-53E सुपर स्टैलियन हेलीकॉप्टरों की उड़ानें सिर्फ सैन्य अभ्यास का हिस्सा नहीं हैं। ये सैन्य अभ्यास ‘कीन स्वॉर्ड 27’ के दौरान हो रहे हैं, जो अमेरिका और जापान के बीच द्विवार्षिक द्विपक्षीय फील्ड ट्रेनिंग एक्सरसाइज है। इसमें बहुराष्ट्रीय भागीदारी भी शामिल है। इसका उद्देश्य दोनों सेनाओं की तैयारी और अंतर-संचालन क्षमता को बढ़ाना तथा अमेरिका-जापान गठबंधन को और मजबूत करना है।
ओकिनावा स्थित तृतीय मरीन एक्सपेडिशनरी फोर्स (MEP-III) इस अभ्यास का प्रमुख आधार है। लगभग 45,000 जापानी सेल्फ-डिफेंस फोर्स और 11 से 12 हजार अमेरिकी सैनिकों के साथ ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस समेत कई देशों की भागीदारी इसे क्षेत्र का सबसे बड़े अभ्यासों में से एक बनाती है। दक्षिणी द्वीपों पर एंटी-शिप मिसाइल सिस्टम की तैनाती और ताइवान के निकट द्वीपों की सुरक्षा पर फोकस स्पष्ट संकेत देता है कि अभ्यास का लक्ष्य चीन से द्वीपों की रक्षा और समुद्री नियंत्रण है।
रणनीतिक दृष्टि से यह अभ्यास चीन की विस्तारवादी योजनाओं के लिए चुनौती है। अमेरिका ने अब यह स्पष्ट समझ लिया है कि चीन उसकी वैश्विक स्थिति के लिए सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी है। इसलिए वह जापान जैसे सहयोगियों के साथ नियमित सैन्य गतिविधियों के माध्यम से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन को घेरने और उसके दबाव को संतुलित करने की रणनीति अपना रहा है। ये अभ्यास केवल रक्षात्मक नहीं, बल्कि निवारक शक्ति का प्रदर्शन भी हैं।
क्षेत्रीय स्थिरता के लिए अमेरिका-जापान गठबंधन आज पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। आज वास्तविक युद्ध तो बहुत काम होते हैं क्योंकि कोई भी देश (कितना भी ताकतवर क्यों न हो), युद्ध झेलने की स्थिति में नहीं है। कारण साफ़ है कि अब एक बार युद्ध शुरू हो जाये तो ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेता है क्योंकि विश्व की अनेक शक्तियां दोनों में से एक देश का सहयोग करने लग जाते हैं और दोनों ही युद्धरत देशों को भयंकर नुक्सान होता है। रूस- यूक्रेन तथा अमरीका- ईरान युद्ध दो ऐसे उदाहरण हैं, जो इस बात को समझने के लिए काफी हैं। कीन स्वॉर्ड जैसे अभ्यास यह सुनिश्चित करते हैं कि कोई भी एकतरफा विस्तारवाद आसानी से सफल न हो सके।


