नई दिल्ली: भारतीय सशस्त्र बलों की चिकित्सा सेवा (AFMS) ने अपने एक अग्रणी चिकित्सक और वायु सेना के Aviation Medicine क्षेत्र के दिग्गज को सलाम किया है। एयर कमोडोर मलिक सिंह खेरा हाल ही में 106 वर्ष के हुए। इस अवसर पर आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल सर्विसेज की डायरेक्टर जनरल (DGAFMS) सर्जन वाइस एडमिरल आरती सारिन ने उन्हें बधाई दी और उनके लंबे, प्रेरणादायी जीवन को श्रद्धांजलि अर्पित की।
जन्मदिन समारोह में एयर वाइस मार्शल कौशिक चटर्जी, एसीएएस (मेड) और एयर कमोडोर अनुरक्षत गुप्ता ने भाग लिया। यह आयोजन केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि का उत्सव नहीं, बल्कि उन मूल्यों का प्रतीक है जो भारतीय सैन्य चिकित्सा सेवा को विश्वस्तरीय बनाते हैं, निष्ठा, व्यावसायिक उत्कृष्टता और अटूट देशभक्ति।
लाहौर के प्रतिष्ठित किंग एडवर्ड मेडिकल कॉलेज के पूर्व छात्र मलिक सिंह खेरा द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1944 में आर्मी मेडिकल कोर में शामिल हुए। 1946 में उन्हें भारतीय वायु सेना में कमीशन प्राप्त हुआ। स्वतंत्र भारत की नवजात वायु सेना के लिए उन्होंने एयर फोर्स मेडिकल सर्विसेज की नींव रखने और उसे आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। Aviation Medicine के क्षेत्र में वे सच्चे पायनियर रहे। अंबाला, प्रयागराज, जलहल्ली, दिल्ली जैसे महत्वपूर्ण अड्डों पर सेवा देते हुए उन्होंने वायुयान चालक दल की स्वास्थ्य सुरक्षा और परिचालन चिकित्सा व्यवस्था को मजबूत किया। उन्होंने मिलिट्री अस्पताल नामकुम का भी सफलतापूर्वक कमान संभाला।
1977 में एयर कमोडोर के पद से सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका योगदान सैन्य चिकित्सा जगत में प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। उनकी यात्रा उस कालखंड को दर्शाती है जब भारत अपनी रक्षा व्यवस्था को औपनिवेशिक विरासत से मुक्त कर स्वदेशी ढांचा खड़ा कर रहा था।
AFMS की जड़ें गहरी हैं, इसकी नींव ब्रिटिश भारतीय सेना की मेडिकल व्यवस्था में है, जिसकी परंपरा 18वीं शताब्दी के ईस्ट इंडिया कंपनी के काल तक जाती है। स्वतंत्रता के बाद इसे त्रि-सेवा संगठन के रूप में विकसित किया गया। आज AFMS न केवल युद्धकालीन चिकित्सा सहायता बल्कि आपदा प्रबंधन, उच्च ऊंचाई चिकित्सा, एयरोस्पेस मेडिसिन और आधुनिक युद्ध की जटिल चुनौतियों के लिए तैयार एक विश्वसनीय संस्था है।
एयर कमोडोर खेरा का जीवन हमें याद दिलाता है कि आधुनिक युद्ध में चिकित्सा सेवा केवल सहायक नहीं, बल्कि रणनीतिक क्षमता का अभिन्न अंग है। स्वस्थ सैनिक ही लड़ सकता है, जीत सकता है और देश की रक्षा कर सकता है। उनकी दीर्घायु और समर्पण भावी पीढ़ी के चिकित्सा अधिकारियों के लिए एक जीवंत उदाहरण है कि सच्ची सेवा कभी समाप्त नहीं होती।
‘रक्षा सम्वाद’ में यह स्तंभ उन गुमनाम नायकों को समर्पित है जिनकी मेहनत से हमारी सेनाएं अजेय बनी रहती हैं।


