ज्योतिषाचार्य श्री विनोद जैन (प्रभु), इंदौर
दिगंबर जैन समाज में दशलक्षण महापर्व के छठवें दिन भाद्रपद शुक्ल दशमी को सुगंध दशमी अथवा धूप दशमी का पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इसे धूप खेवन पर्व भी कहा जाता है। इस दिन जैन समाज के श्रद्धालु विभिन्न जिनालयों में पहुंचकर भगवान जिनेन्द्र के समक्ष सुगंधित धूप अर्पित करते हैं। धूप की सुगंध से जिनालयों का वातावरण सुगंधित और भक्तिमय हो उठता है।
इन्द्रादि देवों की आराधना की स्मृति
जैन परंपरा में मान्यता है कि इस पावन अवसर पर इन्द्रादि देव मध्यलोक में स्थित अकृत्रिम जिनधामों में जाकर जिनेन्द्र भगवान के समक्ष धूप अर्पित करते हैं। इसी पवित्र भावना और परंपरा की स्मृति में श्रावक-श्राविकाएं भी जिनालयों में धूप खेते हैं। सुगंध दशमी का संदेश केवल बाहरी वातावरण को सुगंधित करने का नहीं, बल्कि अपने विचार, व्यवहार और आत्मभाव को भी निर्मल एवं सुगंधित बनाने का है। इस परंपरा का उल्लेख सुगंध दशमी के अर्घ्य और जैन धार्मिक साहित्य में भी मिलता है।
उत्तम संयम धर्म की आराधना
दशलक्षण महापर्व में यह दिन उत्तम संयम धर्म की आराधना से भी जुड़ा है। जैन दर्शन में संयम का अर्थ मन, वचन और काय की अशुभ प्रवृत्तियों पर नियंत्रण तथा प्राणियों की रक्षा और इंद्रियों को वश में रखने की साधना से है। इसलिए सुगंध दशमी बाहरी पूजा के साथ-साथ आत्मसंयम और आत्मनिरीक्षण का अवसर भी है।
उपवास और धार्मिक साधना
इस दिन अनेक श्रद्धालु उपवास रखते हैं। व्रत की परंपरा में हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह जैसे पांच पापों से दूर रहने, चारों प्रकार के आहार का त्याग करने तथा पूजा, स्वाध्याय, धर्मचिंतन, कथा-श्रवण और सामायिक आदि में समय लगाने की भावना रहती है। सुगंध दशमी के व्रत को आत्मशुद्धि, अशुभ कर्मों के क्षय और पुण्य भावों की वृद्धि से जोड़ा गया है।
जिनालयों में विशेष आराधना
सुगंध दशमी के अवसर पर सुबह से ही जैन मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा, पूजन, विधान और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। श्रद्धालु अपने-अपने क्षेत्रों के जिनालयों में पहुंचकर भगवान जिनेन्द्र के समक्ष धूप अर्पित करते हैं। अनेक स्थानों पर सामूहिक रूप से धूप खेने की परंपरा निभाई जाती है। इंदौर में भी दशलक्षण महापर्व के दौरान विभिन्न जिनालयों में श्रद्धालुओं द्वारा धूप अर्पित करने की धार्मिक परंपरा निभाई जाएगी।
नवविवाहित महिलाओं की विशेष परंपरा
जैन समाज में सुगंध दशमी के व्रत को लेकर महिलाओं में भी विशेष श्रद्धा देखी जाती है। कुछ परिवारों और परंपराओं में नवविवाहित महिलाएं विवाह के बाद लगातार दस वर्षों तक प्रतिवर्ष सुगंध दशमी का उपवास करने का संकल्प निभाती हैं। यह परंपरा आत्मसंयम, धार्मिक आस्था और पारिवारिक मंगलकामना से जुड़ी मानी जाती है।
धूप की सुगंध जिनालय को महकाती है, लेकिन सुगंध दशमी का वास्तविक भाव आत्मा को संयम, तप और सद्भाव से सुगंधित करना है। यही इस पर्व का आध्यात्मिक संदेश है।


