अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर भारतीय सेना और चीनी पीएलए के जवान एक बार फिर आमने-सामने खड़े हैं। हाल दिनों में सामने आए दृश्य स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि दोनों पक्षों के सैनिक आँखों में आँखें डाले, आमने-सामने डटे हुए हैं। आईटीबीपी महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने आधिकारिक रूप से पुष्टि की है कि अरुणाचल में कई स्थानों पर फेस-ऑफ जारी है। जुलाई से तक्सिंग सर्कल के असाफिला-माजा क्षेत्र में तनाव बना हुआ है, जहाँ पीएलए ने भारत की धारणा के अनुसार एलएसी से कुछ किलोमीटर अंदर तंबू गाड़ दिए थे।
यह घटनाक्रम अकेला नहीं। 2017 का डोकलाम गतिरोध याद रहे, जब भूटान के ट्राइ-जंक्शन पर चीनी सड़क निर्माण रोकने के लिए भारतीय सेना 73 दिनों तक डटी रही। 2020 में गलवान घाटी का खूनी संघर्ष हुआ, जिसमें 20 भारतीय वीर शहीद हुए। जबकि चीन की बहुत ही नियंत्रित प्रेस के कारण यह बात कभी स्पष्ट रूप से बाहर ही नहीं आयी कि चीन के कितने सैनिक इस फेस-ऑफ में मारे गए थे। हालाँकि सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार चीन को भारत से कहीं अधिक क्षति हुई थिस इस घटना में। पूर्वी लद्दाख के कई बिंदुओं पर वर्षों तक तनाव बना रहा। ये घटनाएँ याद दिलाती हैं कि एलएसी पर शांति कभी भी स्थायी नहीं मानी जा सकती।
वर्तमान फेस-ऑफ भारत की सतर्कता और तैयारियों की परीक्षा है। भारतीय सेना और आईटीबीपी की नियमित गश्त, आधुनिक उपकरणों तथा शौर्य कमांडो जैसी इकाइयों की तैनाती सीमा की सुरक्षा सुनिश्चित कर रही है। कूटनीतिक तंत्र, कोर कमांडर बैठकें और विशेष प्रतिनिधि वार्ताएँ, चालू हैं, पर मैदान में दृढ़ता अपरिहार्य है।
चीन की रणनीति स्पष्ट है, धीरे-धीरे दबाव बनाकर यथास्थिति बदलना। भारत का जवाब भी स्पष्ट होना चाहिए, संवाद खुला रखें, पर अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर कोई समझौता न करें। सीमा पर तैनात जवानों का मनोबल और राष्ट्र की एकजुटता ही सबसे बड़ी ताकत है। अरुणाचल की पहाड़ियाँ गवाह हैं कि भारत की सेना हर चुनौती का डटकर मुकाबला करने को तैयार है।


