ट्विशा शर्मा शर्मा केस और बढ़ते सामाजिक अपराधों पर विशेष लेख
लेखक : भिस्मा कुमार डेहरिया असिस्टेंट प्रोफेसर
दैनिक सदभावना पाती।
भारतीय समाज में विवाह को सदियों से एक पवित्र संस्कार माना गया है, किंतु आज वही विवाह कई परिवारों के लिए भय, शोषण और अपराध का कारण बनता जा रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण है — दहेज प्रथा। आधुनिक शिक्षा, कानून और जागरूकता के बावजूद दहेज की कुप्रथा समाज में गहराई तक जड़ें जमाए हुए है। यही कारण है कि आए दिन दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और महिलाओं की संदिग्ध मौतों जैसी घटनाएँ सामने आ रही हैं।
हाल ही में चर्चित ट्विशा शर्मा केस ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। इस मामले में एक विवाहित महिला की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु के बाद दहेज प्रताड़ना और मानसिक उत्पीड़न के गंभीर आरोप सामने आए। यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता का प्रतीक है जहाँ आज भी विवाह को आर्थिक लेन-देन का माध्यम समझा जाता है।
दहेज की मांग अब केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं रही, बल्कि शिक्षित और संपन्न परिवारों में भी यह समस्या तेजी से बढ़ रही है। कई मामलों में महिलाओं को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है, तो कहीं उन्हें आत्महत्या या मृत्यु के लिए मजबूर कर दिया जाता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारत में प्रतिवर्ष हजारों महिलाएँ दहेज से संबंधित अपराधों की शिकार होती हैं।
देश में इससे पहले भी कई चर्चित मामले सामने आ चुके हैं। अनेक केस दहेज प्रथा के विरुद्ध राष्ट्रीय बहस का विषय बनते रहे जिन्होंने समाज को यह सोचने पर मजबूर किया कि आखिर कब तक बेटियों का सम्मान पैसों के तराजू में तौला जाता रहेगा।
आज के लॉ स्टूडेंट्स के लिए यह विषय क्यों आवश्यक है?
आज के समय में लॉ स्टूडेंट्स केवल कानून पढ़ने वाले विद्यार्थी नहीं हैं, बल्कि वे भविष्य के न्यायविद, अधिवक्ता, न्यायाधीश और समाज सुधारक हैं। दहेज प्रथा जैसे सामाजिक अपराधों को समझना उनके लिए इसलिए आवश्यक है क्योंकि कानून का वास्तविक उद्देश्य केवल अपराधियों को दंड देना नहीं, बल्कि समाज में न्याय और समानता स्थापित करना भी है। दहेज से संबंधित मामलों में भारतीय दंड संहिता की धारा 498A, 304B तथा दहेज निषेध अधिनियम, 1961 का विशेष महत्व है। लॉ स्टूडेंट्स को इन प्रावधानों की गहन समझ होना आवश्यक है ताकि वे भविष्य में पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकें।
इसके अतिरिक्त, वर्तमान समय में कई मामलों में कानून के दुरुपयोग की बहस भी सामने आती है। ऐसे में विधि के विद्यार्थियों के लिए यह और भी आवश्यक हो जाता है कि वे निष्पक्ष दृष्टिकोण, संवेदनशीलता और संवैधानिक मूल्यों के साथ समाज को सही दिशा प्रदान करें। लॉ स्टूडेंट्स यदि अपने अध्ययन काल से ही सामाजिक बुराइयों के प्रति जागरूक होंगे, तभी वे भविष्य में एक संवेदनशील और उत्तरदायी न्याय व्यवस्था का निर्माण कर पाएंगे। इसलिए दहेज प्रथा केवल एक सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि विधि शिक्षा का भी अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।
यद्यपि भारत में दहेज निषेध अधिनियम, 1961 लागू है तथा भारतीय दंड संहिता में दहेज मृत्यु और उत्पीड़न के विरुद्ध कठोर प्रावधान बनाए गए हैं, फिर भी केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है। जब तक समाज स्वयं जागरूक नहीं होगा, तब तक ऐसी घटनाओं पर पूर्ण रोक लगाना कठिन होगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि—
• बेटियों को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाया जाए,
• युवाओं में नैतिक शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी विकसित की जाए,
• तथा दहेज मांगने वालों का सामाजिक बहिष्कार किया जाए।
शिक्षा संस्थानों, सामाजिक संगठनों और परिवारों को मिलकर यह संकल्प लेना होगा कि विवाह को व्यापार नहीं बनने देंगे। दहेज प्रथा केवल महिलाओं के सम्मान पर आघात नहीं, बल्कि मानवता और सामाजिक नैतिकता पर भी प्रश्न चिह्न है।
यदि समाज समय रहते नहीं जागा, तो ट्विशा शर्मा जैसी अनेक बेटियों की कहानियाँ यूँ ही समाज को शर्मसार करती रहेंगी। अब समय आ गया है कि दहेज प्रथा के विरुद्ध केवल कानून नहीं, बल्कि एक मजबूत सामाजिक आंदोलन खड़ा किया जाए।
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विशेष धन्यवाद : डॉ विनोद यादव
डायरेक्टर, इंडेक्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ लॉ, मालवांचल यूनिवर्सिटी इंदौर


