हाल ही में ‘द जेरूसलम पोस्ट’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट, जो एमनेस्टी इंटरनेशनल के विश्लेषण पर आधारित है, ने भारत-इजरायल रक्षा संबंधों के एक ऐसे पहलू को उजागर किया है जिसकी न तो कहीं पर चर्चा होती है, न ही बहुत लोगों को इस बारे में पता है। दरअसल, भारत इजराइल को हथियार व गोला-बारूद निर्यात करने वाला एक अहम् देश बन गया है। अक्टूबर 2023 से नवंबर 2025 के बीच भारत से इजरायल को 2,596 शिपमेंट में हथियार, गोला-बारूद, पार्ट्स और कंपोनेंट्स भेजे गए। इनमें लगभग 3.9 लाख छोटे हथियारों के पार्ट्स, 5.64 लाख विस्फोटक गोला-बारूद के घटक और 298 सैन्य वाहन पार्ट्स शामिल हैं। ये आंकड़े आधिकारिक भारतीय व्यापार रिकॉर्ड्स पर आधारित हैं।
यह विकास दो तरफा साझेदारी का प्रमाण है। एक ओर, भारत 2021-2025 के दौरान इजरायली रक्षा निर्यात का सबसे बड़ा ग्राहक रहा, जिसने कुल निर्यात का 29 प्रतिशत हिस्सा लिया। दूसरी ओर, ‘मेक इन इंडिया’ के तहत घरेलू रक्षा विनिर्माण क्षमता का विस्तार हो रहा है। भारतीय कंपनियां अब सिर्फ आयातक नहीं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में योगदानकर्ता बन रही हैं। यह आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जहां संयुक्त उद्यम और प्रौद्योगिकी साझेदारी के जरिए उत्पादन बढ़ रहा है।
रणनीतिक दृष्टि से यह संबंध भारत के हितों के अनुरूप है। इजरायल की उन्नत तकनीक, खासकर सटीक हथियार, ड्रोन और रक्षा प्रणालियां भारत के लिए सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में सहायक रही है। साथ ही, निर्यात में वृद्धि से भारतीय उद्योग को अनुभव, रोजगार और विदेशी मुद्रा का लाभ मिल रहा है। वैश्विक स्तर पर रक्षा व्यापार में पारदर्शिता और अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का पालन आवश्यक है, लेकिन द्विपक्षीय सहयोग को केवल एक पक्षीय आलोचना के आधार पर नहीं आंका जा सकता।
एमनेस्टी इंटरनेशनल के विश्लेषण पर अगर ध्यान दिया जाए तो उसने भारत का भला कभी सोचा ही नहीं है। चाहे कश्मीर हो या पूर्वोत्तर का अलगाववाद, इस कथित मानवाधिकारवादी संस्था ने हमेशा भारत के विरुद्ध और भारत के शत्रुओं के पक्ष में ही कार्य किया है, इसलिए इनका ये विश्लेषण किसी भलाई के लिए नहीं है बल्कि भारत के भीतर व बाहर उन सारी ताकतों को इस विश्लेषण को दिखा कर एक्टिवेट करना चाहते हैं।
भारत की विदेश नीति हमेशा अपने राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रही है। इस संदर्भ में भारत-इजरायल रक्षा साझेदारी को और मजबूत करना, घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में विश्वसनीय भागीदार बनना ही सही दिशा है। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का यह सफर जारी रहना चाहिए।


