संपादकीय
डॉ देवेंद्र मालवीय, संपादक, दैनिक सदभावना पाती इंदौर
देश का सबसे स्वच्छ शहर कहलाने वाला इंदौर आज एक ऐसे सवाल के सामने खड़ा है, जो सीधे नागरिक जीवन, प्रशासनिक प्राथमिकताओं और नैतिक जिम्मेदारी से जुड़ा है—जब कई कॉलोनियों में लोगों को पीने का पानी नहीं मिल रहा, तब क्या स्विमिंग पूल, वाटर पार्क, वाहन वॉश सेंटर और गैर-जरूरी जल उपयोग को जारी रहने देना उचित है?
इंदौर इस समय भीषण गर्मी और गंभीर जल संकट से गुजर रहा है। शहर के कई हिस्सों में पानी की कमी को लेकर प्रदर्शन हुए, चक्काजाम हुए और जनप्रतिनिधियों तक को सड़कों पर उतरना पड़ा। हाल के समाचार बताते हैं कि नागरिकों का आक्रोश अब खुलकर सामने आ चुका है।
यह केवल एक मौसमी परेशानी नहीं, बल्कि शहरी जल प्रबंधन की गंभीर चेतावनी है।
इंदौर की जल व्यवस्था मुख्यतः नर्मदा जल परियोजना, स्थानीय जलाशयों और भूजल पर निर्भर है। नगर निगम स्वयं मानता है कि शहर की जल आपूर्ति एक बड़े बुनियादी ढांचे पर आधारित है और नागरिकों के लिए टैंकर सेवा तक उपलब्ध करानी पड़ती है। लेकिन जब प्रशासन को टैंकर भेजने पड़ें, मोहल्लों में लोग सार्वजनिक नलों पर झगड़ें, और पानी को लेकर सड़कें जाम हों, तो यह स्पष्ट संकेत है कि उपलब्ध संसाधनों का पुनर्वितरण जरूरी है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि पानी का उपयोग प्राथमिकता के आधार पर हो या सुविधा के आधार पर?
पानी जीवन की आवश्यकता है, विलासिता की वस्तु नहीं। पीने, भोजन बनाने, स्वच्छता और अस्पतालों के लिए पानी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके बाद सार्वजनिक आवश्यक सेवाएं। लेकिन जब शहर में कई जगह लोग एक-एक बाल्टी पानी के लिए परेशान हों, तब स्विमिंग पूल में हजारों-लाखों लीटर पानी भरना नैतिक रूप से कैसे उचित ठहराया जा सकता है?
एक मध्यम आकार के स्विमिंग पूल में लाखों लीटर पानी की आवश्यकता होती है। वाटर पार्कों में प्रतिदिन भारी मात्रा में पानी का उपयोग और वाष्पीकरण होता है। कार वॉश सेंटर एक वाहन पर दर्जनों से सैकड़ों लीटर पानी खर्च कर सकते हैं, यदि रीसाइक्लिंग सिस्टम प्रभावी न हो। ऐसे में यह तर्क स्वाभाविक है कि संकट काल में इन गतिविधियों पर अस्थायी रोक लगे।
दिलचस्प बात यह है कि इंदौर नगर निगम पहले ही गैर-पेय उपयोगों के लिए ट्रीटेड पानी के उपयोग को बढ़ावा देने के निर्देश दे चुका है। निर्माण कार्य, सर्विस सेंटर और उद्यानों के लिए शुद्ध पेयजल के बजाय ट्रीटेड जल उपयोग की नीति लागू की गई है। इसका अर्थ साफ है—प्रशासन स्वयं मानता है कि पीने योग्य पानी का गैर-जरूरी उपयोग सीमित होना चाहिए।
तो फिर अगला तार्किक कदम क्या है?
जिला कलेक्टर को आपदा प्रबंधन जैसी सोच अपनानी चाहिए। इंदौर को पिछले महीने जल-अभावग्रस्त घोषित किया गया और निजी ट्यूबवेल ड्रिलिंग पर भी प्रतिबंध लगाया गया। यदि सरकार भूजल संरक्षण के लिए कठोर कदम उठा सकती है, तो पेयजल संकट के दौरान गैर-जरूरी उपभोग पर नियंत्रण क्यों नहीं?
संभावित कदम:
1. होटल स्विमिंग पूल पर अस्थायी प्रतिबंध
जब तक शहर में सामान्य जलापूर्ति बहाल न हो, नए पानी से स्विमिंग पूल भरने पर रोक लगे। यदि कोई होटल केवल रीसायकल या ट्रीटेड जल से संचालन करे, तो अलग नीति बन सकती है।
2. वाटर पार्क बंद या सीमित संचालन
वाटर पार्क मनोरंजन का साधन हैं, जीवन आवश्यकता नहीं। संकट काल में इन्हें बंद करना जनहित में उचित कदम हो सकता है।
3. वाहन धुलाई केंद्रों पर नियंत्रण
कार वॉश, सर्विस सेंटर और प्रेशर वॉशिंग यूनिट्स को केवल ट्रीटेड या रीसायकल जल उपयोग की अनुमति हो। उल्लंघन पर जुर्माना।
4. निजी बोरवेल के दुरुपयोग पर कार्रवाई
प्रशासन पहले ही इस दिशा में सख्ती दिखा चुका है; इसे और प्रभावी बनाया जाए।
5. पानी चोरी और लीकेज पर आपात अभियान
नगर निगम ने हाल में अवैध पंप जब्त किए और लीकेज नियंत्रण से लाखों लीटर पानी बचाने की बात कही है। यह अभियान और तेज होना चाहिए।
6. टैंकर वितरण की पारदर्शी व्यवस्था
किस वार्ड में कितना पानी गया, सार्वजनिक डैशबोर्ड पर प्रदर्शित हो।
7. अस्पतालों और स्कूलों को प्राथमिकता
पेयजल का पहला अधिकार नागरिक जीवनरक्षक सेवाओं का होना चाहिए।
यह भी समझना होगा कि इंदौर का जल संकट केवल मात्रा का संकट नहीं, गुणवत्ता का संकट भी रहा है। इसी वर्ष दूषित पेयजल की भयावह घटनाओं ने शहर को झकझोर दिया। ऐसे में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना प्रशासन की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
कुछ लोग तर्क देंगे कि होटल, वाटर पार्क और सर्विस सेंटर व्यवसाय हैं; इन्हें बंद करने से आर्थिक नुकसान होगा। यह सही है। लेकिन संकट प्रबंधन में प्राथमिकताएं बदलती हैं। जब बिजली संकट होता है तो उद्योगों पर कटौती होती है; जब महामारी आती है तो बाजार बंद होते हैं। उसी तरह जल संकट में विलासितापूर्ण जल उपयोग पर अस्थायी नियंत्रण असामान्य नहीं।
यह स्थायी नीति नहीं, आपातकालीन उपाय होना चाहिए।
नागरिकों की भी जिम्मेदारी कम नहीं। घरों में पाइप खुला छोड़ना, वाहन घर पर धोना, RO के बर्बाद पानी को फेंकना, अत्यधिक बागवानी—ये सभी मिलकर संकट बढ़ाते हैं। प्रशासन केवल आदेश देकर समस्या हल नहीं कर सकता; सामाजिक अनुशासन भी जरूरी है।
इंदौर स्मार्ट सिटी है, लेकिन स्मार्ट शहर वही है जो संकट में संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करे। स्वच्छता में नंबर-1 बनने वाला शहर जल संरक्षण में भी मिसाल बन सकता है।
जिला प्रशासन, नगर निगम, जनप्रतिनिधि और नागरिक—सभी को यह स्वीकार करना होगा कि पानी केवल संसाधन नहीं, जीवन है।
यदि एक ओर बच्चा पीने के पानी के लिए लाइन में खड़ा हो और दूसरी ओर स्विमिंग पूल भर रहे हों, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, सामाजिक संवेदनहीनता भी है।
इंदौर को निर्णय लेना होगा—मनोरंजन पहले या मानव जीवन?


