अकेलापन: आधुनिक जीवन की अदृश्य महामारी – Loneliness: A Silent Epidemic

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संपादकीय – डॉ. देवेंद्र मालवीय

आधुनिक युग में अकेलापन अब केवल एक भावनात्मक स्थिति नहीं रह गया है, यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डव्लूएचओ) और अमेरिका के सर्जन जनरल की रिपोर्ट्स इसे महामारी का दर्जा दे चुकी हैं। यह समस्या हृदय रोग, डिप्रेशन, डिमेंशिया और असमय मृत्यु तक का कारण बन रही है।

अकेलापन वह दर्दनाक अनुभव है जब व्यक्ति की सामाजिक संबंधों की अपेक्षा और वास्तविकता में बड़ा अंतर होता है। यह सामाजिक अलगाव (सोशल आइसोलेशन) से अलग है। कोई व्यक्ति अकेला रहकर भी संतुष्ट हो सकता है, लेकिन भीड़ भरी जगह में रहते हुए भी गहरी अकेलापन महसूस कर सकता है।

विश्व स्तर पर स्थिति काफी चिंताजनक है, विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर में लगभग 16% लोग यानी हर छह में से एक व्यक्ति अकेलापन को महसूस करते हैं। गैलप के 2023 सर्वे में 23% लोगों ने कहा कि वे पिछले दिन में बहुत ज्यादा अकेले महसूस कर रहे थे। अमेरिका में लगभग 50% वयस्क अकेलापन का अनुभव करते हैं, खासकर युवाओं में। बुजुर्गों में वैश्विक स्तर पर यह दर 27.6% के आसपास है।

अमेरिकी सर्जन जनरल विवेक मूर्ति की 2023 रिपोर्ट आवर एपिडेमिक ऑफ़ लोनेलिनेस्स एंड आइसोलेशन के अनुसार अकेलापन से हृदय रोग का खतरा 29%, स्ट्रोक का 32% और डिमेंशिया का 50% बढ़ जाता है। इसका प्रभाव रोजाना 15 सिगरेट पीने या मोटापे जितना घातक माना गया है।

भारत में यह समस्या और भी गंभीर होती जा रही है, शहरी भारत में 43% लोग ज्यादातर समय अकेलापन महसूस करते हैं। युवाओं और 30-44 वर्ष के आयु वर्ग में यह दर सबसे अधिक है। बुजुर्गों में लगभग 20% मध्यम और 13% गंभीर अकेलेपन का शिकार हैं। शहरीकरण, नाभिकीय परिवार, बड़े पैमाने पर प्रवास और सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग ने हमारे पारंपरिक सामाजिक बंधनों को काफी कमजोर कर दिया है। कोविड-19 महामारी ने इस समस्या को और बढ़ावा दिया।

अकेलापन केवल मन की पीड़ा नहीं है, बल्कि यह शारीरिक स्वास्थ्य को भी गंभीर नुकसान पहुंचाता है। मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से यह डिप्रेशन और एंग्जायटी का खतरा दोगुना कर देता है। शारीरिक रूप से यह सूजन बढ़ाता है, इम्यून सिस्टम को कमजोर करता है और नींद संबंधी समस्याएं पैदा करता है। विभिन्न अध्ययनों में पाया गया है कि सामाजिक संबंधों की कमी से मृत्यु का जोखिम 26-29% तक बढ़ जाता है। युवाओं में यह आत्महत्या के जोखिम को भी बढ़ाता है।

इस समस्या के कई कारण हैं। आधुनिक जीवनशैली, काम का अत्यधिक दबाव, सोशल मीडिया पर कनेक्टेड दिखने के बावजूद वास्तविक संबंधों की कमी, परिवार संरचना में बदलाव (संयुक्त परिवार से नाभिकीय परिवार की ओर), बड़े शहरों में प्रवासन और बुजुर्गों के मामले में संतान का अलग रहना प्रमुख कारण हैं।

अकेलेपन को दूर करने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं, व्यक्तिगत स्तर पर हमें रोजाना परिवार और दोस्तों से सार्थक बातचीत करनी चाहिए। फोन पर समय बिताने की बजाय आमने-सामने की मुलाकातों को बढ़ावा देना चाहिए। समुदाय स्तर पर लोकल क्लब, सामुदायिक कार्यक्रम, वृद्धाश्रम गतिविधियां और स्वयंसेवी कार्य शुरू किए जाने चाहिए। सरकारी और नीति स्तर पर सामाजिक कनेक्शन को सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना चाहिए। स्कूलों में भावनात्मक शिक्षा, कार्यस्थलों पर वेलनेस प्रोग्राम और बुजुर्गों के लिए बेहतर देखभाल व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए। साथ ही डिजिटल संतुलन बनाए रखना भी आवश्यक है।

अकेलापन कोई व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि एक सामाजिक और स्वास्थ्य संकट है। हमें संबंधों को उतना ही महत्व देना होगा जितना हम भोजन, व्यायाम और दवाओं को देते हैं। मैं सभी पाठकों, नीति निर्माताओं और स्वास्थ्यकर्मियों से अपील करता हूं कि हम मिलकर इस खामोश महामारी से लड़ें। याद रखें — सचमुच जुड़ाव ही सबसे अच्छी दवा है।

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