- जैन दर्शन का प्रसिद्ध सूत्र है—
- सम्यक् दर्शन आखिर है क्या?
- सम्यक् दर्शन के आठ अंग
- सम्यक् दर्शन को दूषित करने वाले भावों से सावधानी
- सम्यक् दर्शन के तीन भेद
- सम्यक् दर्शन की शुरुआत घर-गृहस्थी से भी हो सकती है
- दिन में कुछ मिनट शांत बैठकर स्वयं से पूछा जा सकता है—
- सात व्यसन और अष्ट मूलगुण : जीवन की भूमिका शुद्ध करने का आधार
- छहढाला में सम्यक् दर्शन का सरल मार्ग
- नित्य स्वाध्याय के लिए छहढाला से आत्मचिंतन
- दशलक्षण पर्व में सम्यक् दर्शन का अभ्यास
- सम्यक् दर्शन : मान्यता नहीं, दृष्टि का परिवर्तन
- और इस पूरी यात्रा की पहली जागृत सीढ़ी है—सम्यक् दर्शन।
ज्योतिषाचार्य श्री विनोद जैन (प्रभु)
इंदौर। जैन दर्शन में दशलक्षण पर्व केवल व्रत, उपवास और पूजा का पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्मा की ओर लौटने और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने का अवसर है। इन दस दिनों में उत्तम क्षमा से लेकर उत्तम ब्रह्मचर्य तक जिन दस धर्मों की साधना की जाती है, उनके मूल में आत्मशुद्धि का भाव है। इसी आत्मशुद्धि की यात्रा में सम्यक् दर्शन को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
जैन दर्शन का प्रसिद्ध सूत्र है—
“सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः।”
अर्थात् सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र—ये तीनों मिलकर मोक्ष का मार्ग हैं। इन्हें ही रत्नत्रय कहा जाता है।
सम्यक् दर्शन इस मार्ग की वह आधारभूमि है, जिस पर सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र की साधना आगे बढ़ती है। इसे केवल किसी बात को मान लेना नहीं, बल्कि वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप में श्रद्धापूर्वक स्वीकार करना कहा गया है। तत्त्वार्थसूत्र में स्पष्ट कहा गया है—“तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्।”
सम्यक् दर्शन आखिर है क्या?
जैन दर्शन में जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष—इन सात तत्त्वों के यथार्थ स्वरूप में श्रद्धा होना सम्यक् दर्शन का आधार है। लेकिन इसका अर्थ केवल इतना नहीं कि व्यक्ति इन सात तत्त्वों के नाम जानता हो। सम्यक् दर्शन भीतर की दृष्टि में परिवर्तन का नाम है। जब जीव यह समझने लगता है कि मैं शरीर नहीं हूं, शरीर मेरा स्वरूप नहीं है; राग-द्वेष मेरे शुद्ध आत्मस्वभाव नहीं हैं; मेरा वास्तविक स्वरूप चेतन, ज्ञाता-द्रष्टा आत्मा है, तब स्व और पर के भेद की दिशा में उसकी दृष्टि जागृत होने लगती है। यही कारण है कि जैन अध्यात्म में सम्यक् दर्शन को आत्मजागरण की शुरुआत माना गया है। सम्यक् दर्शन के साथ व्यक्ति की धार्मिक दृष्टि बाहरी क्रियाओं से आगे बढ़कर आत्मस्वरूप की ओर मुड़ती है।
सम्यक् दर्शन के आठ अंग
जैन परंपरा में सम्यक् दर्शन के आठ अंग बताए गए हैं—निःशंकित, निःकांक्षित, निर्विचिकित्सा, अमूढ़दृष्टि, उपगूहन, स्थितिकरण, वात्सल्य और प्रभावना। विभिन्न आगमिक एवं परंपरागत स्रोतों में इन आठ अंगों का यही क्रम मिलता है। निःशंकित का अर्थ है जिनवाणी और तत्त्वों के प्रति अनावश्यक संशय न रखना। निःकांक्षित अर्थात धर्म को सांसारिक लाभ, भोग या प्रतिष्ठा प्राप्त करने का साधन न बनाना। निर्विचिकित्सा अर्थात धर्म और धर्मात्माओं के प्रति घृणा या ग्लानि का भाव न रखना। अमूढ़दृष्टि अर्थात सत्य-असत्य के विवेक के साथ यथार्थ दृष्टि रखना और मिथ्या मान्यताओं में मोहग्रस्त न होना। उपगूहन का अर्थ धर्ममार्ग पर चलने वाले व्यक्ति की भूल को सार्वजनिक रूप से उछालने के बजाय उसे संभालना और धर्म की मर्यादा की रक्षा करना है। स्थितिकरण अर्थात धर्म से विचलित हो रहे व्यक्ति को प्रेमपूर्वक पुनः धर्ममार्ग में स्थिर करना। वात्सल्य सहधर्मियों और धर्मात्माओं के प्रति स्नेह, सम्मान और आत्मीयता है। और प्रभावना का अर्थ जैन धर्म के सत्य सिद्धांतों और वीतरागी मार्ग की महिमा को उचित तरीके से जन-जन तक पहुंचाना है।
सम्यक् दर्शन को दूषित करने वाले भावों से सावधानी
जैन शास्त्रों में सम्यक् दर्शन की निर्मलता के लिए उसके दोषों से बचने की भी शिक्षा दी गई है। मूढ़ता, मद, अनायतन तथा शंकादि दोष श्रद्धा को कमजोर कर सकते हैं। इसलिए सम्यक् दर्शन केवल एक सकारात्मक विश्वास नहीं, बल्कि मिथ्या दृष्टि और विपरीत आग्रहों से स्वयं को बचाने की निरंतर साधना भी है।
सम्यक् दर्शन के तीन भेद
जैन सिद्धांत में सम्यक्त्व के औपशमिक, क्षायोपशमिक और क्षायिक तीन भेद बताए जाते हैं। औपशमिक सम्यक्त्व में दर्शन-मोहनीय कर्म का उपशम होने से सम्यक् श्रद्धा प्रकट होती है, लेकिन उपशमित कर्म के पुनः उदय की संभावना रहती है। क्षायोपशमिक सम्यक्त्व में कर्म की कुछ प्रकृतियों का क्षय और कुछ का उपशम होता है। व्यवहार की साधना में यह अवस्था विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। क्षायिक सम्यक्त्व में दर्शन-मोहनीय कर्म का पूर्ण क्षय हो जाता है। इसलिए इसे पूर्ण और अविचल सम्यक्त्व की अवस्था माना गया है।
सम्यक् दर्शन की शुरुआत घर-गृहस्थी से भी हो सकती है
सम्यक् दर्शन के लिए व्यक्ति को संसार छोड़कर कहीं जाने की आवश्यकता नहीं। श्रावक जीवन में रहते हुए भी अपनी दृष्टि को बदलने का प्रयास किया जा सकता है। प्रतिदिन कुछ समय जिनवाणी के स्वाध्याय के लिए निकालना, तत्त्वार्थसूत्र, समयसार, छहढाला जैसे ग्रंथों का अध्ययन करना, देव-शास्त्र-गुरु के स्वरूप को समझना और आत्मा तथा शरीर के भेद पर चिंतन करना इस दिशा में उपयोगी साधन बन सकते हैं।
दिन में कुछ मिनट शांत बैठकर स्वयं से पूछा जा सकता है—
“मैं कौन हूं?”
“क्या मैं केवल यह शरीर हूं?”
“क्या राग-द्वेष मेरा वास्तविक स्वरूप है?”
“मेरा स्वभाव जानना और देखना है या बाहरी वस्तुओं में उलझना?” ऐसा आत्मचिंतन धीरे-धीरे दृष्टि को बाहरी आकर्षणों से हटाकर आत्मस्वरूप की ओर ले जाने का निमित्त बन सकता है।
सात व्यसन और अष्ट मूलगुण : जीवन की भूमिका शुद्ध करने का आधार
श्रावक के लिए नैतिक जीवन की शुद्धता भी सम्यक् दर्शन की साधना में सहायक है। सात व्यसनों से बचना, अष्ट मूलगुणों का पालन, अहिंसा, संयम, मर्यादित आहार और सदाचार—ये सभी जीवन को ऐसी भूमिका प्रदान करते हैं जिसमें आत्मचिंतन सहज हो सके। यहां एक बात विशेष रूप से समझने योग्य है—बाहरी धार्मिक क्रिया और भीतर की दृष्टि, दोनों का अपना महत्व है; लेकिन क्रिया तभी आत्मकल्याण की दिशा में सार्थक होती है जब उसके साथ तत्त्व की समझ और आत्मचिंतन भी जुड़ता जाए। .
छहढाला में सम्यक् दर्शन का सरल मार्ग
पंडित दौलतराम जी की छहढाला जैन अध्यात्म को सरल काव्यात्मक भाषा में समझाने वाला अत्यंत लोकप्रिय ग्रंथ है। इसके मंगलाचरण में वीतराग विज्ञानता को तीनों लोकों का सार बताया गया है। छहढाला के आगे के प्रसंगों में सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र को मोक्षमार्ग बताते हुए आत्मा और पर के भेद को समझने की दिशा दी गई है।
नित्य स्वाध्याय के लिए छहढाला से आत्मचिंतन
प्रातः शांत स्थान पर बैठकर तीन बार णमोकार मंत्र का जाप किया जा सकता है। इसके बाद छहढाला के चयनित छंदों का अर्थ सहित स्वाध्याय करें। उद्देश्य केवल पाठ पूरा करना नहीं, बल्कि प्रत्येक पंक्ति को अपने जीवन से जोड़कर देखना हो। मंगलाचरण में दौलतराम जी कहते हैं—
- तीन भुवन में सार, वीतराग विज्ञानता। शिवस्वरूप शिवकार, नमहुँ त्रियोग सम्हारिकैं।।
- इसका भाव है कि राग-द्वेष से रहित वीतराग विज्ञानता कल्याणकारी और मोक्ष का कारण है।
- छहढाला आगे मोक्षमार्ग के संदर्भ में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र की एकता को सामने रखती है—यानी केवल श्रद्धा पर्याप्त नहीं; सही ज्ञान और उसके अनुरूप आचरण भी आवश्यक है।
दशलक्षण पर्व में सम्यक् दर्शन का अभ्यास
दशलक्षण पर्व के इन दस दिनों में यदि प्रतिदिन एक प्रश्न स्वयं से पूछा जाए तो पर्व की साधना और अधिक सार्थक हो सकती है—
- क्या आज मेरे भीतर श्रद्धा बढ़ी?
- क्या मैंने किसी तत्त्व को समझने के बजाय केवल मान लिया?
- क्या मेरा धर्म भोग और प्रतिष्ठा की इच्छा से जुड़ा है?
- क्या मैंने किसी धर्मात्मा के दोष को उछालने के बजाय उसे संभालने का प्रयास किया?
- क्या आज मेरे भीतर आत्मा और शरीर के भेद का थोड़ा भी अनुभव जागा?
- यही प्रश्न धीरे-धीरे पर्व को केवल बाहरी अनुष्ठान से उठाकर आत्मनिरीक्षण की साधना में बदल सकते हैं।
सम्यक् दर्शन : मान्यता नहीं, दृष्टि का परिवर्तन
सम्यक् दर्शन का वास्तविक अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति केवल यह कहने लगे कि वह जैन धर्म को मानता है। प्रश्न इससे कहीं गहरा है—क्या मेरी दृष्टि वास्तव में बदल रही है?
क्रोध आने पर क्या मैं अपने क्रोध को देख पा रहा हूं?
अहंकार आने पर क्या मुझे उसका बोध होता है?
अपमान मिलने पर क्या मैं प्रतिशोध के बजाय आत्मस्वरूप को याद कर सकता हूं?
धन, पद और प्रतिष्ठा मिलने पर क्या मैं उन्हें अपना वास्तविक स्वरूप समझने लगता हूं?
जब इन प्रश्नों के उत्तर भीतर बदलने लगते हैं, तब सम्यक् दर्शन की साधना जीवन में उतरने लगती है। दशलक्षण पर्व इसलिए केवल दस दिनों का धार्मिक आयोजन नहीं है। यह अपनी दृष्टि को बदलने का अवसर है। क्षमा से क्रोध को, मार्दव से अहंकार को, आर्जव से कपट को, शौच से लोभ को, सत्य से असत्य को, संयम से विषयासक्ति को, तप से इच्छाओं को, त्याग से ममत्व को, आकिंचन्य से परिग्रह को और ब्रह्मचर्य से विषय-विकार को पीछे छोड़ते हुए आत्मा की ओर बढ़ने की यात्रा है।
और इस पूरी यात्रा की पहली जागृत सीढ़ी है—सम्यक् दर्शन।
एक पंक्ति में दशलक्षण का संदेश -“बाहरी पूजा से भीतर की दृष्टि तक, और श्रद्धा से आत्मपहचान तक—यही दशलक्षण पर्व की वास्तविक साधना है।”


