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दर्दनाक हादसा- हिमाचल की सड़कों पर मौत का तांडव कब थमेगा? 

लेखक-नरेन्द्र भारती

अल सुबह घर से काम पर निकले लोगों ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि चंद मिनटों में मौत के आगोश में समा जाएंगें।ताजा हादसा आज 4 जुलाई 2022 को कुल्लू के सैंज में हुआ यहां एक निजी बस के गहरी खाई में गिरने से स्कूली बच्चों समेत 16 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई।
यह हादसा सुबह 8 बजे के करीब हुआ।एक बार फिर लाशों के ढेर लगे, चारों तरफ खून बिखरा, लाशों को ढापनें के लिए कफन भी कम पड गए।घरों के इकलौते चिराग बुझ गए।
हादसे से हर तरफ चीख -पुकार मच गई।सैंज में हुए मौत के इस मंजर में हुई इन अकाल मौतों से हर हिमाचली गमगीन है।
इन हादसों से जनमानस खौफजदा है।प्रदेष में एक दिन में 11 लोगों की मौतें बहुत ही दुखद है। प्रदेश में ऐसा कोई दिन नहीं होता जब किसी की सड़क हादसे में मौत न हुई हो हादसों का यह क्रम लगातार जारी है।सबक न सीखना लोगों की आदत बन गया है इतने हादसे हो रहे है मगर सुधार शून्य ही है।इस पर मंथन करना होगा। है।कुछ दिन पहले कुल्लू में ही एक स्कारपियों के गहरी खाई में गिरने से 11 लोगों की मौत हो गई र्थी।
हिमाचल में चंबा से लेकर किन्नौर तक सड़क हादसे होते जा रहे है।प्रतिदिन मौत का तांडव हो रहा है ।दर्दनाक हादसों में परिवार के परिवार मौत के आगोश में समाते जा रहे है।।हर रोज दर्जनों लोग मारे जा रहे है। हादसों के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो रोंगटे खडे हो जाते है।
जनवरी 2022 से लेकर 4 अगस्त 2022 तक सात  महीनों में हजारों हादसे हो चुके है और हजारों लोग मारे जा चुके है और यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। इससे पहले कई भीषण हादसे हो चुके है।
आंकडों के अनुसार 9 अप्रैल 2018 को एक भीषण हादसा कांगड़ा के नूरपुर के चेली में घटित हुआ था जहां एक निजी स्कूल की बस के खाई में गिरने से 26 बच्चों समेत 30 की मौत हो गई थी।अधिकतर बच्चे नर्सरी में पढ़ने वाले थे इस हादसे में मरने वालों में बस का चालक ,एक शिक्षक व एक युवती शामिल थे।
एक तेज रफ्तार मोटरसाइकिल सवार को बचाने के चलते यह हादसा सामने आया।हादसा इतना भयंकर था कि 24 बच्चों ने घटनास्थल पर ही दम तोड दिया था।
वहीं 7 मई 2016 को जोगिन्द्रनगर के पास हिमाचल पथ परिवहन निगम की बस के गहरी खाई में गिरने से 11 लोगों की मौत हो गई थी। मई 2016 को दोपहर कांगड़ा के ढलियारा में  पंजाब से आए श्रद्धालुओं से भरी एक बस के 100 फीट खाई में गिरने से सात लोगों की मौत हो गई थी और 33 के लगभग घायल हो गए थे।
प्रदेश में घटित यह खौफनाक हादसे बहुत ही दुखद हैं। इस सड़क हादसों में 11 लोगों की दर्दनाक मौत से हर हिमाचली उद्वेलित है। 2017 में भी हादसे पर हादसे हुए थे लोग असमय काल के गाल में समाते जा रहे हैं मगर हालात सुधरने के बजाए बिगड़ते ही जा रहे है लोग बीते हादसों को कैसे भूल जाते है ।
हिमाचल में हर रोज लापरवाही के कारण लोगों को मौत नसीब हो रही है अगर लोग जरा सी सावधानी बरते तो हादसों को रोका जा सकता है और अनमोल जीवन को बचाया जा सकता है।बीते हादसों पर नजर डाली जाए तो रोंगटे खडे हो जाते है लगभग दो वर्ष पहले एक भीषण हादसा मंडी के झिड़ी में हुआ था  जब एक निजी बस चालक की लापरवाही के कारण 40 से अधिक लोगों की असमय मौत हो गई थी। व्यास नदी में गिरी इस बस में लगभग 70 सवारियां सवार थी।
चालक कथित तौर पर मोबाइल फोन पर बात कर रहा था कि बस अनियंत्रित हो गई और नदी में समा गई। पल भर में ही यात्री लाशों में तब्दील हो गये। गनीमत रही कि राफ्टिंग दल ने जान जोखिम में डालकर 17 लोगों की जिंदगियां बचा ली नहीं तो मरने वालों का आंकड़ा 60 हो जाता यह हादसा नहीं सरासर हत्याएं थी कि चालक ने खुद छलांग लगाकर यात्रियों को असमय मौत के मुंह में धकेल दिया।
27 नवंबर 2015 को राजधानी शिमला जिला की तहसील कुपवी में एक बोलेरो जीप गिरने से चार युवकों की दर्दनाक मौत हो गई थी यह सब युवा अभी 25 और 30 वर्ष की उम्र के थे।किन्नौर के कल्पा में भी एक जीप के दुर्घटनाग्रस्त होने से एक व्यक्ति की मौत हो गई यह दोनों हादसे एक ही दिन हुए जिसमें पांच घरों के चिराग बुझ गए थे।
पिछले महिने दो हृदयविदारक हादसों में 11 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई थी।पहला हादसा राजधानी शिमला में हुआ जहां एक कार के लगभग 250 फुट गहरी खाई में गिरने से 3 लोगों की मौत हो गई जिनमें दो एसएसबी के जवान व एक आईटीआई का छात्र था।
दूसरे हादसे में चंबा में बारातियों से भरी जीप के खाई में गिरने से 8 लोगों की मौत हो गई थी और 18 बाराती घायल हो गए थी इस मालवाहक जीप में 26 बराती सवार थे मोड़ पर चालक ने नियंत्रण खोया और यह जीप 250 मीटर गहरी खाई में गिर गई और आठ लोग बेमौत मारे गए मरने वालों में 18 से 30 साल तक के नौजवान थे जबकि एक 10 साल का लड़का था।
लोग इतने लापरवाह होते जा रहे है कि जानबूझकर हादसों को न्यौता दे रहे है यदि जीप में क्षमता से अधिक लोग सवार किये गए तो हादसा होना निश्चित था।
बीते हादसों से न तो यात्रियों ने सबक सीखे और न ही प्रशासन ने कोई सबक सीखा ।अक्सर देखा गया है कि ज्यादातर हादसे ओवरलोडिंग के कारण होते है क्योकि इस 42 यात्रियों की क्षमता वाली बस में 70 यात्री सफर कर रहे थे।यह कोई पहला हादसा नहीं है इससे पहले कांगडा के आषापुरी में तथा बिलासपुर के बंदला में भी ऐसे भीषण हादसे हो चुके हैं।
2017 में इतने बड़े-बड़े हादसे हुए मगर इसमें सुधार नहीं हुआ।आखिर कब थमेगा यह मौत का मंजर इसका जवाब प्रशासन को देना होगा। प्रतिवर्ष हजारों लोग हादसों का शिकार होते है तथा इतने ही घायल होते है ।अप्रैल माह में चंबा में भी 12 युवकों की मौत हो गई थी।
हमीरपुर में भी मजदूर दिवस के दिन एक टाटा सूमो  के खाई में गिरने से 10 मजदूरों की मृत्यु हो गई थी । 2018 के प्रथम सप्ताह से ही सड़को पर मौत रेंग रही है और सड़के रक्तरंजित हो रही हैं। अमूमन देखा गया है कि निजी बसें के कारण ज्यादातर दुर्घटनाएं हो रही है। क्योकि इन बसों में अप्रशिक्षित चालकों की लापरवाही के कारण भंयकर हादसे हो रहें हैं।
मोबाइल पर प्रतिबन्ध है लेकिन इसकी खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही है। प्रशासन भी हादसे के कुछ दिन सक्रियता दिखाता है फिर वही हालात हो जाते है। लोग भी किराये में कुछ रियायत के कारण सरकारी बसों में यात्रा न कर निजी बसों को अहमियत देते है और जिंदगियों से खिलवाड़ करवाते है।
चंद चांदी के सिक्कों की खातिर बसों के परिचालक बसों में अपेक्षा से अधिक यात्रियों को बिठाते है और खुद मौत को निमंत्रण देते हैं। प्रतिदिन सड़कों पर ओवरलोडिग बसें सरपट दौड़ती रहती है मगर प्रशासन आंखें बंद करके सोया रहता है जब हादसा हो जाता है तब इसकी कुंभकर्णी नींद टूटती है ।
प्रशासन के पहुंचने तक लोगों की सांसें खत्म हो चुकी होती है। यदि प्रशासन समय-समय पर कारवाई करता रहे तों इन हादसों पर लगाम लग सकती है। मगर ऐसा नहीं होता ।समझ से परे है कि प्रशासन जितना पैसा राहत कार्यों में बांटता है यदि पहले ही सुरक्षा बरती जाए तो लोगों की अनमोल जिंदगियां बच सकती हैं।
एक व्यक्ति की लापरवाही का खामियाजा लोगों को जान देकर भुगतना पड रहा है। ऐसे लोगों को सजा-ए -मौत देनी चाहिए जो जानबूझकर लोगों की मौत का कारण बनते हैं। यह हादसा इतने जख्म दे गया कि लोगों को उबरने में वर्षों लग जाएगें। इसमें घरों के चिराग बुझ गये कई बच्चों के सिर से बाप का साया उठ गया तो कई माताओं व बहनों के सुहाग छिन गये, माता -पिता के बुढ़ापे के सहारे असमय काल के गाल में समा गए।
विशेषज्ञ रिपोर्ट में सामने आता है कि 80 फीसदी हादसे चालकों की लापरवाही के कारण होतें है जबकि 20 फीसदी तकनीकी खराबी के कारण होते है। हर हादसे के बाद मजिस्ट्रेट जांच होती है मगर कुछ समय बाद यह भी ठंडे बस्ते में पड जाती है।
ऐसे हत्यारे चालकों को सरेआम सजा देनी चाहिए ताकि भविष्य में कीमती जाने बच सके। ऐसे हादसे क्यों नहीं रुक पा रहे है यह एक यक्ष प्रश्न बनता जा रहा है। पुलिस भी इन हादसों को रोकने में नाकाम साबित हो रही है। पुलिस पैटेलिगं करने वाले भी इन दुर्घटनाओं को रोकने में अक्षम नजर आते है।
यदि इस ओवरलोडिंग बस पर शिकंजा कसा होता तो शायद यह हादसा न होता, हर चौराहे पर पुलिस होती है क्या इस पर किसी की नजर नहीं पडी। ऐसे कई सवाल है जिसका जवाब लापरवाह व बहरे हो चुके प्रशासन को देना होगा। सरकार को इन हादसों पर रोक लगाने के लिए सुधारात्मक कदम उठाने होंगे मात्र मुआवजा देकर कर्तव्य की इतिश्री नहीं करनी चाहिए।
ऐसे चालकों पर हत्या का मामला दर्ज करना चाहिए।परिवहन विभाग को भी ऐसे चालकों के लाइसेंस रद्द करने चाहिए तथा बसों के रूट परमिट भी बंद कर देने चाहिए। सरकार को चाहिए कि क्षेत्रीय परिवहन अधिकारियों को भी निर्देश दिए जाएं कि बस अड्डे पर प्रत्येक बस की रूटीन चेकिंग की जाए तथा बीच में भी छापेमारी की जाए ताकि दोषी चालकों के विरुद्ध मौके पर चालान काटा जाए।
बसों में मोबाइल फोन पर रोक लगाई जाए। अगर अब भी कोई कदम न उठाये तो लोग बेमौत मरते रहेगें।ऐसे हादसों से जनमानस खौफजदा होता जा रहा है। यदि प्रशासन सक्रिय होगा तो ऐसे बेलगाम चालकों पर नकेल कसी जा सकती है तथा लोगों की जिंदगियां बच सकती हैं।
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