संपादकीय
डॉ देवेंद्र मालवीय
दैनिक सदभावना पाती
इंदौर/देवास। जब-जब सुरेश सिंह भदौरिया (Suresh Singh Bhadoria) के खिलाफ निगेटिव पब्लिसिटी आई, उन्होंने उसे सीढ़ी बनाकर ऊंचाइयों को छुआ है। यह बात अब मध्य प्रदेश के शिक्षा जगत में किंवदंती बन चुकी है। हालिया अमलतास यूनिवर्सिटी (देवास) (Amaltas University Dewas) के दीक्षांत समारोह में पीएचडी/मानद उपाधि के सर्टिफिकेट पर ‘University’ की जगह ‘Univeristy’ छप जाना भी शायद उसी परंपरा का नया अध्याय है।
क्या यह सिर्फ प्रिंटिंग प्रेस की साधारण गलती थी? या फिर नई प्राइवेट यूनिवर्सिटी को बाजार में जगह बनाने का सूक्ष्म, लेकिन प्रभावी तरीका? सवाल उठना लाजमी है।
सुरेश सिंह भदौरिया: विजनरी या विवादास्पद उद्यमी?
श्री भदौरिया इंडेक्स ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस (इंदौर) (Index Group of Institutions Indore), मालवांचल यूनिवर्सिटी (Malwanchal University Indore) और अमलतास यूनिवर्सिटी-हॉस्पिटल (Amaltas University, Dewas) के फाउंडर चेयरमैन हैं। उन्होंने मध्य प्रदेश में मेडिकल और हायर एजुकेशन के क्षेत्र में बड़ा नेटवर्क खड़ा किया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव समेत कई बड़े नामों से उन्हें ‘विजनरी ऑफ एमपी’ और ‘गेम चेंजर’ जैसे सम्मान मिल चुके हैं। लेकिन साथ ही उनके नाम पर सीबीआई की कई FIR भी दर्ज हैं — मेडिकल कॉलेज मान्यता घोटाले, कथित ब्रोकरेज और NRI कोटा में अनियमितताओं के आरोप। फिर भी हर विवाद के बाद उनका साम्राज्य और मजबूत दिखता है। निगेटिव पब्लिसिटी उनके लिए ‘फ्री एडवरटाइजमेंट’ का काम करती रही है — यह उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है।
‘Univeristy’ वाला सर्टिफिकेट: हास्यास्पद या हिसाबी चाल?
अमलतास यूनिवर्सिटी का हालिया दीक्षांत समारोह भव्य था। केंद्रीय मंत्री और स्थानीय नेताओं को मानद उपाधियां दी गईं। लेकिन जब सर्टिफिकेट वायरल हुए तो सबकी नजर ‘University’ शब्द की स्पेलिंग पर अटक गई — ‘Univeristy’। दर्जनों स्टाफ, रजिस्ट्रार, डीन और प्रिंटिंग टीम होने के बावजूद यह गलती कैसे हो गई? कोई यूनिवर्सिटी का अपना नाम ही गलत छाप दे — यह सामान्य टाइपो नहीं लगता।
सोशल मीडिया और स्थानीय न्यूज़ पोर्टल पर खूब चर्चा हुई। कुछ ने मजाक उड़ाया, कुछ ने गंभीर सवाल उठाए। फिर अचानक यूनिवर्सिटी ने सर्टिफिकेट सुधारकर नए जारी कर दिए। जवाबदेही? अब भी गायब। कोई इस्तीफा, कोई स्पष्टीकरण, कोई आंतरिक जांच का ऐलान नहीं। बस चुपचाप सुधार लिया।
प्राइवेट यूनिवर्सिटी का कड़वा सच
मध्य प्रदेश में प्राइवेट यूनिवर्सिटीज की संख्या तेजी से बढ़ रही है। यहां बच्चे अक्सर ‘डिग्री खरीदने’ के लिए जाते हैं — कम मेहनत, आसान पास, भारी फीस। अमलतास जैसी नई यूनिवर्सिटी के लिए मार्केटिंग सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसे में ‘वायरल कंट्रोवर्सी’ सबसे सस्ता और सबसे प्रभावी टूल है। एक स्पेलिंग मिस्टेक ने अमलतास को पूरे प्रदेश में चर्चा में ला दिया — वो भी बिना एक पैसा खर्च किए।
क्या यह संयोग था? या फिर ‘निगेटिव पब्लिसिटी इज स्टिल पब्लिसिटी’ का नया संस्करण? सुरेश भदौरिया इस फॉर्मूले को अच्छी तरह जानते हैं। उनके जीवन में हर विवाद ने उन्हें नया मोड़ दिया है।
हमारा नजरिया –
शिक्षा का क्षेत्र गंभीर है। यहां एक स्पेलिंग मिस्टेक भी हल्का नहीं लिया जा सकता। अगर यह सचमुच गलती थी तो यूनिवर्सिटी को खुलकर माफी मांगनी चाहिए थी और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई करनी चाहिए थी। अगर यह जानबूझकर किया गया ‘मार्केटिंग ट्रिक’ था तो यह शिक्षा के प्रति अपमान है। छात्रों की भविष्य की डिग्री को पब्लिसिटी का साधन बनाना नैतिक रूप से गलत है।
आज के समय में यूनिवर्सिटी का नाम भी सही न छपे — यह विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है। मध्य प्रदेश की नई प्राइवेट यूनिवर्सिटीज को समझना चाहिए कि असली प्रतिस्पर्धा क्वालिटी, फैकल्टी, रिसर्च और प्लेसमेंट में है, न कि वायरल कंट्रोवर्सी में।
सुरेश सिंह भदौरिया (Suresh Singh Bhadoriya) ने शिक्षा क्षेत्र में जो इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया है, वह सराहनीय है। लेकिन अब समय है कि वे ‘विवादों के राजा’ की छवि से ऊपर उठें और ‘क्वालिटी एजुकेशन के राजा’ बनें। क्योंकि छात्रों की डिग्री कोई जोक नहीं, बल्कि उनका भविष्य है।
‘Univeristy’ वाला सर्टिफिकेट शायद जल्दी भुला दिया जाएगा, लेकिन जो सवाल यह उठा गया है — वह लंबे समय तक बना रहेगा:
क्या हम शिक्षा को भी ब्रांडिंग का खेल बना रहे हैं?
समय जवाब देगा।
समय जवाब देगा।


