- ज्योतिषाचार्य श्री विनोद जैन (प्रभु)
- ज्ञान और सम्यक् ज्ञान में भेद क्या?
- सम्यक् ज्ञान के पाँच भेद – जैन परम्परा में ज्ञान के पाँच भेद हैं —
- श्रावक के लिए साधना का प्रारंभ मति और श्रुत से होता है — सुनना, पढ़ना, मनन करना और उसे जीवन में कसना।
- ज्ञान की पाँच भावनाएँ
- सम्यक् ज्ञान की साधना घर में कैसे हो?
- छहढाला में पंडित दौलतराम जी ज्ञान की महिमा को आत्मभेद के रूप में रखते हैं —
- दशलक्षण पर्व में सम्यक् ज्ञान का अभ्यास
- सम्यक् ज्ञान : सूचना नहीं, रूपांतरण
ज्योतिषाचार्य श्री विनोद जैन (प्रभु)
इंदौर। यदि सम्यक् दर्शन मोक्षमार्ग का द्वार है, तो सम्यक् ज्ञान उस द्वार से भीतर आने वाला प्रकाश है। जैन दर्शन का प्रसिद्ध सूत्र है —“सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः।”
अर्थात सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र — यही रत्नत्रय मोक्षमार्ग है। सम्यक् दर्शन ने दृष्टि दी कि मैं कौन हूँ, सम्यक् ज्ञान उस दृष्टि को स्पष्ट करता है कि मेरा स्वरूप क्या है, पर-स्वरूप क्या है, और दोनों के बीच भेद कैसे करना है। तत्त्वार्थसूत्र में सम्यक् ज्ञान के संबंध में दृष्टि बहुत स्पष्ट है — जो ज्ञान सम्यक् दर्शन से सहित हो, वस्तु को उसके यथार्थ स्वरूप में, संशय-विपर्यय-अनध्यवसाय से रहित जाने, वही सम्यक् ज्ञान है। और जैसा शास्त्र कहते हैं — “जो वस्तु के स्वभाव को नहीं जानता, उलटा जानता है या निरपेक्ष जानता है, वह मिथ्याज्ञान है, इससे विपरीत सम्यग्ज्ञान है।”
ज्ञान और सम्यक् ज्ञान में भेद क्या?
जानना तो सभी को होता है, पर हर जानना सम्यक् नहीं होता। जब जानने के पीछे मिथ्यात्व की दृष्टि हो — मैं शरीर ही हूँ, राग-द्वेष ही मेरा स्वभाव है, भोग में ही सुख है — तब मति, श्रुत और अवधि जैसे ज्ञान भी मिथ्याज्ञान बन जाते हैं। जैन सिद्धांत कहता है — मतिश्रुतावधयो विपर्ययश्च। अर्थात मति, श्रुत, अवधि ये तीन ज्ञान मिथ्यादृष्टि के साथ मिथ्या भी हो सकते हैं और सम्यग्दृष्टि के साथ सम्यक् भी। मनःपर्यय और केवलज्ञान सदा सम्यक् ही होते हैं, क्योंकि वहाँ मोह का अभाव है। इसलिए सम्यक् ज्ञान का पहला लक्षण है — सम्यग्दर्शन-पूर्वक होना। कहा भी है — सम्मत्तविणा णाणं — सम्यक्त्व के बिना ज्ञान नियम से सम्यक् नहीं होता। जब दृष्टि में स्व-पर का विवेक जागता है, तभी जाना हुआ ज्ञान आत्मा को शुद्ध करने वाला बनता है।
सम्यक् ज्ञान के पाँच भेद – जैन परम्परा में ज्ञान के पाँच भेद हैं —
1. मतिज्ञान — इन्द्रिय और मन से होने वाला ज्ञान
2. श्रुतज्ञान — शास्त्र, शब्द, संकेत से होने वाला ज्ञान
3. अवधिज्ञान — मर्यादा सहित परोक्ष पदार्थों को जानने वाला ज्ञान
4. मनःपर्ययज्ञान — दूसरे के मन के भावों को जानने वाला ज्ञान
5. केवलज्ञान — सम्पूर्ण प्रत्यक्ष, अनंत ज्ञान
श्रावक के लिए साधना का प्रारंभ मति और श्रुत से होता है — सुनना, पढ़ना, मनन करना और उसे जीवन में कसना।
सम्यक् ज्ञान के आठ अंग — ज्ञानाचार
जैसे सम्यक् दर्शन के आठ अंग हैं, वैसे ही सम्यक् ज्ञान की निर्मलता के लिए ज्ञानाचार के आठ अंग बताए गए हैं — मूलाचार में कहा है —काले विणए उवहाणे बहुमाणे तहेव णिण्हवणे। वंजण अत्थ तदुभयं णाणाचारो दु अट्ठविहो।
1. काल — स्वाध्याय का उचित काल। प्रमाद, निद्रा, विकथा के समय नहीं, जब मन शांत हो तब स्वाध्याय।
2. विनय — मन-वचन-काय से शास्त्र और गुरु का विनय। शास्त्र को पैर की ओर न रखना, अशुद्ध अवस्था में न छूना, अहंकार से नहीं, जिज्ञासा से पढ़ना।
3. उपधान — ज्ञान प्राप्ति के लिए यत्न, एकाग्रता, शुद्ध आहार-विहार, इन्द्रियों का संयम।
4. बहुमान — ज्ञान, ज्ञानी और ज्ञान के साधनों का आदर-सत्कार।
5. अनिह्नव (निह्नव) — गुरु या शास्त्र का नाम न छिपाना, श्रुत को अपना बताकर मान न लेना।
6. व्यंजन शुद्धि — वर्ण, पद, वाक्य को शुद्ध पढ़ना, अशुद्ध उच्चारण से अर्थ का अनर्थ न करना।
7. अर्थ शुद्धि — अनेकांत स्वरूप अर्थ को ठीक-ठीक समझना, एकांत पकड़कर हठ न करना।
8. तदुभय शुद्धि — पाठ और अर्थ दोनों की शुद्धता रखना।
ये आठ अंग ज्ञान को केवल जानकारी से ऊपर उठाकर आचार बनाते हैं।
ज्ञान की पाँच भावनाएँ
शास्त्रों में ज्ञान को बढ़ाने वाली पाँच भावनाएँ कही हैं — वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय, धर्मोपदेश। अर्थात स्वयं पढ़ना, संदेह होने पर गुरु से पूछना, पदार्थ के स्वरूप का बार-बार चिंतन करना, सूत्रों को कंठस्थ कर मन में रमाना, और प्राप्त सत्य को करुणा से दूसरों तक पहुँचाना। तत्त्वार्थसूत्र में इन्हीं को स्वाध्याय के पाँच भेद कहा गया है।
सम्यक् ज्ञान की साधना घर में कैसे हो?
सम्यक् ज्ञान के लिए हिमालय नहीं जाना पड़ता। श्रावक जीवन में ही उसकी भूमिका बनती है।
1. प्रतिदिन स्वाध्याय का नियम — 20 मिनट भी तत्त्वार्थसूत्र, समयसार, छहढाला, रत्नकरण्ड श्रावकाचार का अर्थ सहित अध्ययन।
2. सुनकर नहीं, गुनकर जानना — जो पढ़ा, दिन में एक बार पूछें — क्या आज मैंने इसे जिया? जैसे आज क्रोध आया तो क्या मैं जान पाया कि यह पुद्गल का विकार है, मेरा स्वभाव नहीं?
3. लेखन और चिंतन — छहढाला की एक पंक्ति लिखकर उसका दिन भर मनन करें।
छहढाला में पंडित दौलतराम जी ज्ञान की महिमा को आत्मभेद के रूप में रखते हैं —
आतम को हित है सुख, आतम को सुख ज्ञान।
आतम ज्ञानी आत्म हित, सदा करे परधान।।
और दूसरी जगह —जो जानै सो आत्मा, जाने सो पर-भेद। यही ज्ञान सम्यक् कहै, हरै मिथ्या-खेद।।
दशलक्षण पर्व में सम्यक् ज्ञान का अभ्यास
इन दस दिनों में यदि प्रतिदिन एक प्रश्न ज्ञान की कसौटी पर पूछें तो साधना सार्थक होगी आज मैंने जो जाना, क्या वह मेरे अहंकार को बढ़ाने के लिए था या अहंकार को गलाने के लिए? क्या मेरा ज्ञान मुझे क्षमा के निकट ले गया? क्या मैंने शास्त्र को शब्द-शुद्धि से पढ़ा?
क्या मैंने किसी बात को केवल मान लिया या उसके अर्थ को अनेकांत से समझने का यत्न किया? क्या ज्ञान के साथ विनय बढ़ा? यही प्रश्न ज्ञान को भार नहीं, प्रकाश बनाते हैं।
सम्यक् ज्ञान : सूचना नहीं, रूपांतरण
सम्यक् ज्ञान का अर्थ अधिक जान लेना नहीं, बल्कि जो जाना उसे अपने स्वरूप में उतारना है। बहुत जानना पांडित्य हो सकता है, पर सम्यक् जानना तभी होता है जब ज्ञान के साथ यह विवेक जगे — यह जानने वाला कौन है? जो जाना जा रहा है, वह मुझसे भिन्न है या अभिन्न? राग-द्वेष का जानना, राग-द्वेष में बह जाना नहीं है। जब यह विवेक जागता है, तब ज्ञान तप बन जाता है, और तप आत्मा की निर्जरा का कारण।
दशलक्षण पर्व के दस धर्म — क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य, ब्रह्मचर्य — तभी सधते हैं जब उनके पीछे सम्यक् ज्ञान का प्रकाश हो। बिना ज्ञान के क्षमा दीनता बन सकती है, पर ज्ञान सहित क्षमा वीतरागता बन जाती है। और इसीलिए सम्यक् ज्ञान मोक्षमार्ग की दूसरी, पर अनिवार्य सीढ़ी है।
एक पंक्ति में दशलक्षण का संदेश — बाहरी जानने से भीतर पहचानने तक, और जानकारी से आत्मज्ञान तक — यही सम्यक् ज्ञान की साधना है। सम्यक् दर्शन और सम्यक् ज्ञान पर जो जिनवाणी आप तक पहुँचे, वे यदि आपके स्वाध्याय और आत्मचिंतन में थोड़े भी निमित्त बनें, तो यही इस दशलक्षण पर्व की सार्थकता है। भगवान महावीर की वीतराग विज्ञानता हम सबके भीतर जागे — यही मंगल भावना।
जिनवाणी जयवंत रहे।


