सम्यक् चारित्र : मोक्षमार्ग की सिद्धि, जानने को जीने की कला

दशलक्षण पर्व में केवल जानना नहीं, जैसा जाना वैसा आचरण करना ही सच्ची साधना

By
sadbhawnapaati
"दैनिक सदभावना पाती" (Dainik Sadbhawna Paati) (भारत सरकार के समाचार पत्रों के पंजीयक – RNI में पंजीकृत, Reg. No. 2013/54381) "दैनिक सदभावना पाती" सिर्फ एक समाचार...
10 Min Read

ज्योतिषाचार्य श्री विनोद जैन (प्रभु)

इंदौर। जैन दर्शन में मोक्षमार्ग को रत्नत्रय के रूप में समझाया गया है—सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र। आचार्य उमास्वामी के तत्त्वार्थसूत्र का प्रथम सूत्र है—सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः। अर्थात् सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र—ये तीनों मिलकर मोक्ष का मार्ग हैं। यदि सम्यक् दर्शन जीवन को सही दृष्टि देता है और सम्यक् ज्ञान वस्तु के वास्तविक स्वरूप को समझने का प्रकाश देता है, तो सम्यक् चारित्र उस ज्ञान को जीवन में उतारने की साधना है। इसलिए दशलक्षण पर्व में केवल धर्म को सुनना और समझना पर्याप्त नहीं, बल्कि जैसा जाना है, वैसा आचरण करना ही चारित्र की वास्तविक शुरुआत है।

सम्यक् चारित्र आखिर क्या है?

जैन दर्शन में चारित्र का संबंध केवल बाहरी नियमों और व्रतों से नहीं है। तत्त्वार्थसूत्र में चारित्र के पांच भेद बताते हुए कहा गया है—सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसाम्पराय और यथाख्यात। व्यापक अर्थ में सम्यक् चारित्र वह है जिसमें सम्यक् दर्शन और सम्यक् ज्ञान के आधार पर अशुभ प्रवृत्तियों से निवृत्ति होती है, हिंसा आदि से बचाव होता है, संयम-व्रतों का पालन होता है और साधक धीरे-धीरे आत्मस्वरूप की ओर स्थिर होता जाता है। सरल शब्दों में—ज्ञान बताता है कि क्या सही है और चारित्र उस सही को जीवन में जीना सिखाता है।

व्यवहार और निश्चय—चारित्र की दो दृष्टियां

जैन दर्शन में चारित्र को समझने के लिए व्यवहार और निश्चय दोनों दृष्टियों का महत्व है।

व्यवहार चारित्र में व्रत, संयम, समिति, गुप्ति तथा हिंसा, असत्य, चोरी, अब्रह्म और परिग्रह जैसे पापों से विरति प्रमुख है। गृहस्थ के लिए अणुव्रत, गुणव्रत और शिक्षाव्रत तथा मुनियों के लिए महाव्रत इसी व्यवहार-साधना की व्यापक व्यवस्था बनाते हैं। जैन ग्रंथों में गृहस्थ के देशचारित्र और मुनि के सकलचारित्र का भी विवेचन मिलता है। निश्चय चारित्र की दृष्टि और भी भीतर जाती है। यहां आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित होने की दिशा में बढ़ती है। राग-द्वेष से उपेक्षा, शुद्धोपयोग और आत्मस्वरूप में रमण इसकी ऊंची अवस्था को व्यक्त करते हैं। निश्चय चारित्र को आत्मा की शुद्धि और बाह्य-अभ्यंतर क्रियाओं के निरोध से जोड़ा गया है। इसलिए व्यवहार को केवल बोझ और निश्चय को केवल कल्पना मानना दोनों ही अधूरे हैं। व्यवहार साधना जीवन को अनुशासित करती है और निश्चय की दृष्टि साधना को आत्मा की ओर ले जाती है।

चारित्र के पांच शास्त्रीय भेद

तत्त्वार्थसूत्र के नवम अध्याय में चारित्र के पांच भेद स्पष्ट रूप से बताए गए हैं—सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसाम्पराय और यथाख्यात।

1. सामायिक चारित्र—समता की साधना

सामायिक का मूल भाव है— समता में स्थित होना और सावद्य प्रवृत्तियों से निवृत्त होना। बाहरी परिस्थितियां जैसी भी हों, मन को राग-द्वेष से बचाकर आत्मचिंतन की ओर ले जाना सामायिक की दिशा है। गृहस्थ के लिए प्रतिदिन की सामायिक इसी महान साधना का व्यवहारिक रूप है।

2. छेदोपस्थापना चारित्र—दोष के बाद पुनः स्थापना

साधना में प्रमाद या दोष हो जाए तो उसे स्वीकार कर शुद्धि की दिशा में लौटना छेदोपस्थापना का भाव है। अर्थात् दोष का छेदन और पुनः चारित्र में स्थापना। इसमें प्रायश्चित्त और आत्मसुधार का महत्वपूर्ण भाव दिखाई देता है।

3. परिहारविशुद्धि—अत्यंत सूक्ष्म अहिंसा

परिहारविशुद्धि में जीवों की रक्षा और अहिंसा के प्रति अत्यंत सूक्ष्म जागरूकता दिखाई देती है। चलने, बैठने और दैनिक क्रियाओं तक में जीवघात से बचने की सजगता इसका महत्वपूर्ण पक्ष है।

4. सूक्ष्मसाम्पराय—सूक्ष्म कषायों की अवस्था

यह अत्यंत ऊंची साधना की अवस्था है, जहां स्थूल कषायों का प्रभाव बहुत कम हो जाता है और अत्यंत सूक्ष्म लोभ जैसी कषाय शेष रहती है। इसका संबंध दसवें गुणस्थान से बताया गया है।

5. यथाख्यात चारित्र—वीतरागता की पूर्णता

यथाख्यात चारित्र उच्चतम चारित्रिक अवस्थाओं से संबंधित है। चारित्रमोहनीय कर्म के उपशम या क्षय के संदर्भ में इसका विवेचन किया गया है और यह ग्यारहवें से चौदहवें गुणस्थान तक की अवस्थाओं से संबंधित बताया जाता है।

इससे स्पष्ट होता है कि चारित्र केवल नियमों की सूची नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि की क्रमिक यात्रा है।

पांच समिति और तीन गुप्ति—आचरण की सूक्ष्म व्यवस्था
जैन आचार में चारित्र को व्यवस्थित करने के लिए पांच समिति और तीन गुप्ति का विशेष महत्व है।
ईर्या समिति— चलते समय जीवों की रक्षा की सावधानी।
भाषा समिति— हित, मित और प्रिय वचन बोलना।
एषणा समिति— आहार ग्रहण करने में शुद्धता और सावधानी।
आदान-निक्षेपण समिति— वस्तु को उठाने और रखने में जीवों की रक्षा का ध्यान।
उत्सर्ग समिति— त्याग संबंधी क्रियाओं में सावधानी।

शास्त्रीय व्याख्याओं में इन पांच समितियों का यही स्वरूप मिलता है।इसी प्रकार मन, वचन और काय की अशुभ प्रवृत्तियों पर नियंत्रण गुप्ति का भाव है। अर्थात् चारित्र केवल यह नहीं कि हम क्या कर रहे हैं, बल्कि यह भी कि हमारे मन में क्या चल रहा है और हमारी वाणी तथा शरीर किस दिशा में प्रवृत्त हो रहे हैं।

श्रावक के लिए चारित्र का मार्ग

गृहस्थ के लिए चारित्र का अर्थ संसार छोड़ देना नहीं है। इसका पहला अर्थ है—संसार में रहते हुए आसक्ति और अनैतिक प्रवृत्तियों को कम करना। पांच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत श्रावक के देशचारित्र की महत्वपूर्ण आधारभूमि हैं। दूसरी ओर मुनि के सकलचारित्र में पंचमहाव्रत, समितियों और गुप्तियों की विशेष प्रधानता बताई गई है।

इसलिए गृहस्थ भी अपने जीवन में चारित्र को इस तरह उतार सकता है—अहिंसा केवल किसी जीव को मारने से बचना नहीं, बल्कि कटु वचन और दुर्भावना से भी बचना है। सत्य केवल झूठ न बोलना नहीं, बल्कि निंदा, चुगली और छल से दूर रहना है। अचौर्य केवल चोरी न करना नहीं, बल्कि किसी की वस्तु या अधिकार का अनुचित उपयोग न करना है।ब्रह्मचर्य अपनी मर्यादा, इंद्रिय-संयम और विषयासक्ति को नियंत्रित करने की साधना है। अपरिग्रह आवश्यकता से अधिक संग्रह और उसके प्रति ममत्व को कम करने का अभ्यास है।

दशलक्षण पर्व—चारित्र की प्रयोगशाला

दशलक्षण पर्व के दस धर्म वास्तव में चारित्र को व्यवहार में उतारने का अवसर देते हैं।

उत्तम क्षमा—क्रोध को छोड़ना।
उत्तम मार्दव—अहंकार को गलाना।
उत्तम आर्जव—कपट छोड़कर सरल बनना।
उत्तम शौच—लोभ और असंतोष को कम करना।
उत्तम सत्य—वाणी और व्यवहार में सत्यता रखना।
उत्तम संयम—इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण।
उत्तम तप—इच्छाओं को अनुशासित करना।
उत्तम त्याग—ममत्व और स्वार्थ को कम करना।
उत्तम आकिंचन्य—‘मेरा’ भाव को छोड़ना।
उत्तम ब्रह्मचर्य—इंद्रिय-विषयों से हटकर आत्मा में रमण की दिशा में बढ़ना।

इस दृष्टि से देखें तो दशलक्षण पर्व चारित्र की प्रयोगशाला है—हर दिन एक कषाय को पहचानने और उसे कम करने का अवसर।

दस दिनों में स्वयं से पूछें पांच सवाल

दशलक्षण की साधना को जीवन से जोड़ने के लिए प्रतिदिन रात को स्वयं से केवल पांच प्रश्न पूछे जा सकते हैं—

  • आज मैंने किस कषाय पर विजय पाई?
  • किस परिस्थिति में मेरी इंद्रियां मुझे खींच रही थीं और मैंने स्वयं को रोका या नहीं?
  • क्या मेरा आज का आचरण मेरे ज्ञान के अनुरूप था?
  • क्या मेरे मन, वचन या शरीर से किसी जीव को अनावश्यक कष्ट पहुंचा?
  • क्या आज कुछ क्षणों के लिए भी मैं राग-द्वेष से हटकर अपने ज्ञाता-द्रष्टा स्वरूप की ओर लौट सका?

इन प्रश्नों का ईमानदार उत्तर ही आत्मनिरीक्षण की शुरुआत बन सकता है। चारित्र बोझ नहीं, भीतर की स्वतंत्रता है अक्सर संयम और नियम को मनुष्य बंधन समझ लेता है। लेकिन जैन दर्शन की दृष्टि से वास्तविक बंधन बाहर के नियम नहीं, बल्कि राग, द्वेष, मोह, लोभ और विषयासक्ति हैं।

जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं का दास होता है तो वह परतंत्र है। जब वह इच्छा के उठते ही उसे पहचानने और उसके पीछे बहने के बजाय स्वयं में स्थिर होने लगता है, तब भीतर स्वतंत्रता का अनुभव प्रारंभ होता है। इसीलिए सम्यक् चारित्र को केवल बाहरी आचरण की व्यवस्था मानना उसके व्यापक अर्थ को सीमित कर देना होगा। चारित्र वह साधना है जिसमें सही श्रद्धा और सही ज्ञान धीरे-धीरे जीवन का स्वभाव बनने लगते हैं।

दर्शन से ज्ञान और ज्ञान से चारित्र तक

दशलक्षण पर्व की पूरी यात्रा को तीन शब्दों में समझा जा सकता है—

सम्यक् दर्शन—मैं कौन हूं, इसकी सही दृष्टि।
सम्यक् ज्ञान—मैं और पर क्या हैं, इसका यथार्थ बोध।
सम्यक् चारित्र—उस बोध के अनुरूप जीवन जीना। तभी तत्त्वार्थसूत्र का रत्नत्रय वाला सूत्र केवल पढ़ा हुआ शास्त्र-वाक्य नहीं रहता, बल्कि जीवन का मार्गदर्शक बनता है। सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र की एकता को ही मोक्षमार्ग कहा गया है।

एक पंक्ति में दशलक्षण का संदेश

बाहरी नियम से भीतर संयम तक, ज्ञान से आचरण तक और आचरण से आत्मस्वरूप में रमण तक—यही सम्यक् चारित्र की यात्रा है।

ज्योतिषाचार्य श्री विनोद जैन (प्रभु)

Share This Article
Follow:
"दैनिक सदभावना पाती" (Dainik Sadbhawna Paati) (भारत सरकार के समाचार पत्रों के पंजीयक – RNI में पंजीकृत, Reg. No. 2013/54381) "दैनिक सदभावना पाती" सिर्फ एक समाचार पत्र नहीं, बल्कि समाज की आवाज है। वर्ष 2013 से हम सत्य, निष्पक्षता और निर्भीक पत्रकारिता के सिद्धांतों पर चलते हुए प्रदेश, देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण खबरें आप तक पहुंचा रहे हैं। हम क्यों अलग हैं? बिना किसी दबाव या पूर्वाग्रह के, हम सत्य की खोज करके शासन-प्रशासन में व्याप्त गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार को उजागर करते है, हर वर्ग की समस्याओं को सरकार और प्रशासन तक पहुंचाना, समाज में जागरूकता और सदभावना को बढ़ावा देना हमारा ध्येय है। हम "प्राणियों में सदभावना हो" के सिद्धांत पर चलते हुए, समाज में सच्चाई और जागरूकता का प्रकाश फैलाने के लिए संकल्पित हैं।