- क्षमा का अर्थ—दुर्बल होना नहीं, आत्मबल जगाना है
- यह भाव अन्याय को उचित ठहराना नहीं है। व्यवहार में अन्याय का उचित प्रतिकार या सुरक्षा आवश्यक हो सकती है, लेकिन प्रतिरोध करते हुए भी मन में द्वेष और प्रतिशोध की आग न पालना जैन क्षमा का सार है। यह मेरे कर्म का उदय है—आत्मनिरीक्षण की दृष्टि
- आज की छोटी-सी क्षमा साधना
- उत्तम क्षमा का वास्तविक अर्थ
- इससे कहीं गहरा संदेश है—मैं अपने भीतर के क्रोध, द्वेष और प्रतिशोध को छोड़ रहा हूं। यही क्षमा आत्मा को हल्का करती है और साधक को समता की ओर ले जाती है।
ज्योतिषाचार्य श्री विनोद जैन (प्रभु)
दशलक्षण पर्व की आध्यात्मिक यात्रा का प्रारंभ उत्तम क्षमा धर्म से होता है। क्षमा केवल किसी की गलती को माफ कर देना नहीं, बल्कि मन में उत्पन्न होने वाले क्रोध, द्वेष, प्रतिशोध और वैरभाव का क्षय करना है। जैन दर्शन में क्षमा आत्मा की उस निर्मल अवस्था की ओर संकेत करती है, जहां प्रतिकूल परिस्थितियों में भी समता बनी रहती है। दशलक्षण धर्म की प्रचलित पूजा में उत्तम क्षमा के लिए कहा गया है—पीड़ें दुष्ट अनेक, बाँध मार बहुविधि करैं। धरिये क्षमा विवेक, कोप न कीजै पीतमा॥ अर्थात सामने वाला कितना भी कष्ट दे, अपमान करे, बांधे या मारने का प्रयास करे, विवेकवान व्यक्ति क्रोध में बहने के बजाय क्षमा और समता को धारण करता है। यह पद द्यानतरायजी की दशलक्षण धर्म पूजा में भी इसी भाव के साथ मिलता है।
क्षमा का अर्थ—दुर्बल होना नहीं, आत्मबल जगाना है
सामान्य जीवन में हम प्रायः मानते हैं कि जिसने हमारे साथ गलत किया, उसी से क्षमा मांगनी या उसे क्षमा करना कमजोरी है। लेकिन जैन दर्शन क्षमा को कमजोरी नहीं, आत्मबल और विवेक का परिचायक मानता है। कोई व्यक्ति हमें अपमानित करता है तो घटना बाहर घटती है, लेकिन उससे पैदा होने वाला क्रोध हमारे भीतर पैदा होता है। सामने वाला निमित्त हो सकता है, पर अपनी कषाय को बढ़ाना या शांत करना हमारे हाथ में है।
इसीलिए उत्तम क्षमा का मूल संदेश है—पर ने मेरा कुछ बिगाड़ा ही नहीं, बिगाड़ा तो मेरे क्रोध और कषाय ने मेरा है। गाली मिले, अपमान हो—फिर भी मन शांत रहे। पूजा में आगे कहा गया है—गाली सुनि मन खेद न आनौ, गुन को औगुन कहै अयानौ॥ अर्थ यह है कि कोई अज्ञानी व्यक्ति हमारे गुणों को भी दोष के रूप में प्रस्तुत करे, तब भी उसके शब्दों को अपने मन की शांति का कारण न बनने दें। क्षमा की वास्तविक परीक्षा तब नहीं होती जब सब हमारे अनुकूल हों। क्षमा की परीक्षा तो प्रतिकूलता में होती है।
किसी के कठोर शब्द सुनकर तुरंत कठोर उत्तर देना आसान है; लेकिन उसी क्षण अपने मन को रोक लेना, प्रतिक्रिया के स्थान पर विवेक को चुनना और वैर को जन्म न देना—यही उत्तम क्षमा की साधना है। जैन साहित्य में भी इसे मन, वचन और काय की प्रतिक्रिया से ऊपर उठकर क्षमाशील रहने के रूप में समझाया गया है। वस्तु छीन ले, कष्ट दे—फिर भी वैर क्यों?
पूजा की अगली पंक्तियां क्षमा की साधना को और गहरा करती हैं—कहि है अयानो वस्तु छीनै, बाँध मार बहुविधि करै। घर तैं निकारै तन विदारै, बैर जो न तहाँ धरै॥ अर्थात कोई हमारी वस्तु छीन ले, मारपीट करे, घर से निकाल दे या शरीर को कष्ट पहुंचाए, तब भी उसके प्रति वैरभाव न रखना क्षमा की उच्च अवस्था है।
यह भाव अन्याय को उचित ठहराना नहीं है। व्यवहार में अन्याय का उचित प्रतिकार या सुरक्षा आवश्यक हो सकती है, लेकिन प्रतिरोध करते हुए भी मन में द्वेष और प्रतिशोध की आग न पालना जैन क्षमा का सार है। यह मेरे कर्म का उदय है—आत्मनिरीक्षण की दृष्टि
पूजा में एक अत्यंत गहरा कर्म-सिद्धांत सामने आता है—तैं करम पूरब किये खोटे, सहै क्यों नहिं जीयरा। अर्थात हे जीव! जो प्रतिकूल फल सामने आया है, वह पूर्व में किए गए कर्मों के उदय से संबंधित है; इसलिए उस परिस्थिति में अपनी कषाय को बढ़ाकर नए कर्म क्यों बांधें? यही दृष्टि -व्यक्ति को उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? से निकालकर इस परिस्थिति में मुझे अपनी आत्मा के साथ कैसा व्यवहार करना है? की ओर ले जाती है।
क्रोध की अग्नि बुझाने का उपाय—समता का जल : दशलक्षण पूजा की अंतिम पंक्ति अत्यंत सारगर्भित है—अति क्रोध अगनि बुझाय प्रानी, साम्य-जल ले सीयरा॥ अर्थात क्रोध की अग्नि को समता रूपी जल से बुझाकर अपने अंतःकरण को शीतल करो। क्रोध की स्थिति में हम दूसरे को दंड देना चाहते हैं, लेकिन वास्तव में सबसे पहले हमारा अपना मन जलता है। इसलिए क्षमा किसी दूसरे पर किया गया उपकार मात्र नहीं, बल्कि स्वयं को क्रोध और द्वेष से मुक्त करने की साधना है।
- मन, वचन और काय—तीनों से क्षमा, उत्तम क्षमा केवल विचार में नहीं, व्यवहार में दिखाई देनी चाहिए।
- मन से -जब भी क्रोध उठे, कुछ क्षण रुककर स्वयं से कहें—यह परिस्थिति मेरे लिए आत्मसंयम की परीक्षा है।
- वचन से -आज किसी को कठोर उत्तर न दें। गाली का उत्तर गाली से नहीं—संयमित मौन और मधुर वाणी से दें।
- काय से -क्रोध में किसी को धक्का देना, दंड देना या हिंसा करना ही नहीं, बल्कि हिंसा का भाव भी रोकना उत्तम क्षमा की दिशा में कदम है।
आज की छोटी-सी क्षमा साधना
दशलक्षण पर्व में उत्तम क्षमा को केवल पढ़ें नहीं, जीकर देखें।
आज किसी ऐसे व्यक्ति को मन से क्षमा करें जिसकी कोई बात लंबे समय से आपके मन में अटकी हुई है। शाम को प्रतिक्रमण अथवा आत्मचिंतन के समय कुछ मिनट शांत बैठकर स्वयं से पूछें—आज किन परिस्थितियों में मुझे क्रोध आया, और किन परिस्थितियों में मैंने स्वयं को रोक लिया?
इसके साथ क्षमापना का भाव करें—खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे। मित्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं न केणइ॥ अर्थात—मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूं, सभी जीव मुझे क्षमा करें। सभी प्राणियों से मेरी मैत्री है, किसी से मेरा वैर नहीं। यह क्षमापना सूत्र जैन परंपरा में सार्वभौमिक क्षमा और मैत्री का भाव व्यक्त करता है।
उत्तम क्षमा का वास्तविक अर्थ
क्षमा का अर्थ यह नहीं कि हम अन्याय को स्वीकार कर लें। क्षमा का अर्थ है—अन्याय के बीच भी अपने भीतर द्वेष को जन्म न लेने देना। दूसरा व्यक्ति हमारे साथ कैसा व्यवहार करता है, यह हमेशा हमारे नियंत्रण में नहीं होता; लेकिन उसके व्यवहार से हमारे भीतर क्रोध पैदा होगा या करुणा, वैर पैदा होगा या समता—यह चुनाव हमारा है। इसलिए उत्तम क्षमा का संदेश केवल इतना नहीं कि -मैंने तुम्हें माफ किया।
इससे कहीं गहरा संदेश है—मैं अपने भीतर के क्रोध, द्वेष और प्रतिशोध को छोड़ रहा हूं। यही क्षमा आत्मा को हल्का करती है और साधक को समता की ओर ले जाती है।
पूजा का भाव -ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा-धर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा। उत्तम क्षमा का अर्घ्य वास्तव में केवल पूजा की वेदी पर नहीं, अपने भीतर के क्रोध पर चढ़ाना है।
आज का संकल्प -किसी के कारण अपने मन की शांति नहीं खोऊंगा। क्रोध के स्थान पर विवेक, वैर के स्थान पर मैत्री और प्रतिक्रिया के स्थान पर समता चुनूंगा।
उत्तम क्षमा का सार -दूसरे ने मेरे साथ क्या किया—यह परिस्थिति है, उसके प्रति मेरे भीतर क्या पैदा हुआ—यही मेरी साधना है।
उत्तम क्षमा से दशलक्षण पर्व की शुरुआत हमें यही सिखाती है कि आत्मशुद्धि की पहली सीढ़ी बाहर के व्यक्ति को बदलना नहीं, अपने भीतर के क्रोध को शांत करना है।
ॐ नमः।


