- लोभ—पापों की जड़
- आशा की फांस, संतोष का सुख
- सच्चा शौच बाहर नहीं, भीतर होता है
- ऊपर अमल, मल भर्यो भीतर—देह का सत्य
- संतोष—सबसे बड़ी आंतरिक संपत्ति
- लोभ से हल्का, आत्मा से मजबूत
- पिछले चार धर्मों के बाद पांचवां संदेश
- आज के जीवन में उत्तम शौच कैसे अपनाएं?
- बाहर स्वच्छता, भीतर संतोष
- उत्तम शौच का मूल संदेश
- उत्तम शौच धर्म का संकल्प
ज्योतिषाचार्य श्री विनोद जैन (प्रभु)
दैनिक सदभावना पाती
इंदौर। दशलक्षण पर्व के पांचवें दिन उत्तम शौच धर्म की आराधना की जाती है। सामान्य जीवन में शौच का अर्थ स्वच्छता से लिया जाता है, लेकिन जैन दर्शन में इसका अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा है। यहां उत्तम शौच का संबंध मन की उस शुद्धि से है, जिसमें लोभ, तृष्णा और अनावश्यक ममत्व का क्षय होने लगता है। जैनकोष में शौच को उत्कृष्ट लोभ की निवृत्ति अर्थात लोभ से मुक्त होने की अवस्था बताया गया है।
दशलक्षण धर्म की मूल भावना को व्यक्त करने वाले पद में भी कहा गया है—उत्तम शौच लोभ-परिहारी, संतोषी गुण-रतन भण्डारी। अर्थात जो लोभ का परित्याग करता है और संतोष को धारण करता है, वही वास्तव में गुणों का भंडार बनता है।
लोभ—पापों की जड़
उत्तम शौच धर्म की पूजा में कहा गया है— उत्तम शौच सर्व जग जाना, लोभ पाप को बाप बखाना। आशा-पास महा दुखदानी, सुख पावै संतोषी प्रानी॥ इसका भाव बहुत गहरा है। मनुष्य के भीतर जब -मुझे और चाहिए- की भावना लगातार बढ़ती जाती है, तब संतोष पीछे छूटने लगता है। अधिक धन, अधिक संपत्ति, अधिक सुविधा, अधिक प्रतिष्ठा और अधिक भोग की इच्छा व्यक्ति को लगातार बेचैन रख सकती है। जैन दर्शन लोभ को केवल धन का लालच नहीं मानता। वस्तुओं, इंद्रिय-विषयों, स्वास्थ्य, जीवन और भोग-सामग्री के प्रति अत्यधिक आसक्ति भी लोभ के विभिन्न रूपों से जुड़ती है। लोभ बढ़ने पर मनुष्य अपने लक्ष्य को पाने के लिए झूठ, छल, हिंसा, चोरी अथवा अन्य अनुचित आचरण की ओर भी जा सकता है। इसलिए शौच धर्म का पहला संदेश है—लोभ को पहचानो और उसकी पकड़ को धीरे-धीरे ढीला करो।
आशा की फांस, संतोष का सुख
मनुष्य की इच्छाओं की कोई अंतिम सीमा नहीं होती। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी जन्म ले लेती है। धन आया तो और धन की इच्छा, मकान मिला तो बड़ा मकान, व्यवसाय बढ़ा तो उससे भी अधिक बढ़ाने की चाह—यह सिलसिला चलता रहता है। पूजा की पंक्ति आशा-पास महा दुखदानी इसी अंतहीन तृष्णा की ओर संकेत करती है। इसके विपरीत संतोष का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति प्रयास करना छोड़ दे। संतोष का अर्थ है—प्रयास करते हुए भी परिणाम और वस्तुओं के प्रति अंधी आसक्ति न रखना। जिसके पास बहुत कुछ होते हुए भी मन में कमी का भाव है, वह भीतर से निर्धन हो सकता है। वहीं सीमित साधनों में संतोष रखने वाला व्यक्ति मानसिक रूप से अधिक शांत रह सकता है। जैन परंपरा संतोष को इसी आंतरिक समृद्धि से जोड़ती है।
सच्चा शौच बाहर नहीं, भीतर होता है
उत्तम शौच की पूजा में कहा गया है—प्रानी सदा शुचि शील जप तप, ज्ञान ध्यान प्रभावतैं।
नित गंग जमुन समुद्र न्हाये, अशुचि-दोष सुभावतैं॥ यहां बाहरी और आंतरिक शुद्धि के बीच का अंतर समझाया गया है। जल से शरीर की बाहरी स्वच्छता हो सकती है, लेकिन मन के भीतर बैठे लोभ, क्रोध, मान, माया और अन्य कषायों को केवल स्नान से दूर नहीं किया जा सकता। जैन आचार-विचार में बाह्य शुद्धि का अपना महत्व है, लेकिन उत्तम शौच का केंद्र अभ्यंतर शुद्धि है। जैन स्रोत स्पष्ट रूप से बाहरी शुद्धि और लोभ-कषाय के त्याग से होने वाली आंतरिक शुद्धि में अंतर बताते हैं।
ऊपर अमल, मल भर्यो भीतर—देह का सत्य
पूजा में आगे कहा गया है—ऊपर अमल मल भर्यो भीतर, कौन विधि घट शुचि कहै।
बहु देह मैली सुगन-थैली, शौच-गुन साधू लहै॥ इस पद में शरीर की वास्तविक प्रकृति का स्मरण कराया गया है। शरीर बाहर से कितना ही सुंदर और स्वच्छ दिखाई दे, उसकी आंतरिक संरचना को देखें तो यह अनेक अशुद्ध पदार्थों से बना हुआ है। इसलिए केवल शरीर की सजावट और बाहरी स्वच्छता को ही पूर्ण पवित्रता मान लेना उचित नहीं। इसका उद्देश्य शरीर को तुच्छ बताना नहीं, बल्कि यह समझाना है कि आत्मा की शुद्धि का संबंध बाहरी रूप से अधिक भीतर के भावों से है। जब मन लोभ और ममत्व से मुक्त होने लगता है, तभी शौच धर्म का वास्तविक भाव प्रकट होता है।
संतोष—सबसे बड़ी आंतरिक संपत्ति
आज की दौड़ में मनुष्य लगातार दूसरों से अपनी तुलना करता है। किसी के पास अधिक धन है, किसी के पास बड़ा घर, किसी के पास अधिक प्रतिष्ठा—इन तुलनाओं से इच्छा और असंतोष बढ़ सकते हैं। उत्तम शौच हमें इस दौड़ से बाहर निकलने का रास्ता दिखाता है। इसका अर्थ संसार छोड़ देना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए वस्तुओं को साधन मानना और उन्हें अपने सुख का एकमात्र आधार न बना लेना है। संतोष का अर्थ निष्क्रियता नहीं है। व्यक्ति मेहनत करे, व्यवसाय करे, परिवार का पालन करे, संपत्ति अर्जित करे; लेकिन उसके भीतर संग्रह की ऐसी भूख न पैदा हो जो शांति, संबंध और धर्म को ही निगल जाए।
लोभ से हल्का, आत्मा से मजबूत
जैनकोष के अनुसार लोभ के कई रूप बताए गए हैं— जीवन, स्वास्थ्य, इंद्रिय-विषय और भोग-उपभोग से संबंधित आसक्ति। इनसे निवृत्ति को उत्तम शौच के भाव से जोड़ा गया है। इस दृष्टि से शौच केवल धन के लोभ को छोड़ना नहीं है। कभी व्यक्ति अपने स्वास्थ्य, अपनी प्रतिष्ठा, अपने सुख या अपने प्रियजनों के प्रति भी ऐसी आसक्ति विकसित कर लेता है कि उसके भीतर भय और बेचैनी बढ़ने लगती है। उत्तम शौच हमें सिखाता है कि ममता और जिम्मेदारी रखें, लेकिन अंधी आसक्ति को जीवन पर हावी न होने दें।
पिछले चार धर्मों के बाद पांचवां संदेश
दशलक्षण पर्व के पहले चार धर्मों—उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव और उत्तम सत्य—के बाद उत्तम शौच साधक को भीतर की एक और बड़ी कमजोरी की ओर देखने को कहता है। क्षमा से क्रोध को शांत किया, मार्दव से अहंकार को छोड़ा,आर्जव से छल-कपट को दूर किया, सत्य से वाणी और व्यवहार को निर्मल किया—अब शौच कहता है कि भीतर के लोभ और तृष्णा को भी पहचानो। क्योंकि यदि मन लगातार संग्रह और अधिक पाने की इच्छा में उलझा रहे तो बाहरी उपलब्धियां बढ़ने के बाद भी भीतर शांति नहीं आती।
आज के जीवन में उत्तम शौच कैसे अपनाएं?
उत्तम शौच को केवल पूजा और प्रवचन तक सीमित रखने के बजाय दैनिक जीवन में उतारना आवश्यक है। इसके लिए कुछ छोटे संकल्प किए जा सकते हैं—जरूरत और लालच में अंतर समझें। अनावश्यक वस्तुओं के संग्रह से बचें। दूसरों की संपत्ति और सफलता देखकर अपनी शांति न खोएं। धन कमाएं, लेकिन धन को जीवन का अंतिम उद्देश्य न बनाएं। जो प्राप्त है उसके प्रति कृतज्ञ रहें। दान, संयम और सेवा के माध्यम से संग्रह की प्रवृत्ति को संतुलित करें। सबसे महत्वपूर्ण बात—हर दिन स्वयं से पूछें, मेरी जरूरत कितनी है और मेरी तृष्णा कितनी? यह प्रश्न ही भीतर के शौच की शुरुआत बन सकता है।
बाहर स्वच्छता, भीतर संतोष
उत्तम शौच का सुंदर संतुलन यही है कि शरीर स्वच्छ हो और मन संतोषी। घर साफ हो, लेकिन हृदय में लोभ का कचरा जमा न हो। वस्त्र निर्मल हों, लेकिन विचार मलिन न हों। शरीर स्वस्थ रखने का प्रयास हो, लेकिन स्वास्थ्य और भोग के प्रति असीम आसक्ति न हो। जैन दर्शन में शौच को इसी व्यापक आंतरिक पवित्रता से जोड़ा गया है। समभाव और संतोष को तृष्णा तथा लोभ के मैल को धोने वाला बताया गया है।
उत्तम शौच का मूल संदेश
उत्तम शौच हमें यह नहीं कहता कि संसार की वस्तुओं को छोड़कर जंगल चले जाओ। वह पहले मन के भीतर देखना सिखाता है—क्या वस्तुएं मेरे पास हैं या मैं वस्तुओं के कब्जे में हूं? जिस दिन -और चाहिए- की बेचैनी कम होकर जो मिला है, उसमें संतोष और जो करना है, उसमें पुरुषार्थ का भाव आ जाता है, उसी दिन शौच धर्म जीवन में उतरना शुरू हो जाता है। लोभ मन को भारी करता है, संतोष मन को हल्का करता है। संग्रह बाहर बढ़ाता है, संतोष भीतर समृद्ध करता है। बाहरी स्वच्छता शरीर को निर्मल करती है, लेकिन लोभ का त्याग आत्मभाव को निर्मल करने की दिशा में ले जाता है।
उत्तम शौच धर्म का संकल्प
ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा। यह अर्घ्य केवल पूजा की एक क्रिया नहीं, बल्कि एक आंतरिक संकल्प है—लोभ को कम करने का, संतोष को बढ़ाने का और मन को भीतर से निर्मल बनाने का। दशलक्षण पर्व का पांचवां धर्म हमें याद दिलाता है कि सच्चा शौच साबुन और जल से आगे की साधना है। जब लोभ का मैल उतरता है, संतोष का प्रकाश भीतर आता है और आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप की ओर बढ़ती है।


