ज्योतिषाचार्य श्री विनोद जैन (प्रभु)
दशलक्षण पर्व के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म की आराधना की जाती है। मार्दव का अर्थ है – मृदुता, नम्रता और मान-कषाय का अभाव। जैन दर्शन में इसे केवल बाहरी विनम्र व्यवहार नहीं, बल्कि भीतर से “मैं बड़ा हूं” के अहंकार को छोड़ने की साधना माना गया है। तत्त्वार्थ सूत्र में उत्तम मार्दव को दस धर्मों में स्थान दिया गया है।
मान विष है, मार्दव अमृत दशलक्षण पूजा में कहा गया है –
मान महाविषरूप, करहि नीच-गति जगत में।
कोमल सुधा अनूप, सुख पावै प्रानी सदा॥
अर्थात मान और अहंकार महाविष के समान हैं, जबकि मृदुता और नम्रता अनुपम अमृत के समान हैं। अहंकार व्यक्ति को दूसरों से दूर करता है, जबकि विनय उसे गुणों और ज्ञान के निकट ले जाती है। जैन परंपरा में मान को आत्मा को मलिन करने वाली कषाय के रूप में देखा गया है।
मार्दव का अर्थ केवल नम्र बोलना नहीं
मार्दव का वास्तविक अर्थ है – अपने जाति, कुल, रूप, बल, ज्ञान, तप, लाभ और ऐश्वर्य आदि को लेकर अभिमान न करना। ये उपलब्धियां जीवन में हो सकती हैं, लेकिन उन्हें अपनी श्रेष्ठता का कारण मान लेना मान-कषाय को जन्म देता है। सच्चा मार्दव तब प्रकट होता है जब व्यक्ति अपनी उपलब्धियों के बीच भी यह समझता है कि गुण जितने बढ़ें, विनय उतनी ही गहरी होनी चाहिए।
जैन साहित्य में मार्दव को आठ प्रकार के मद से रहित और विनय से युक्त बताया गया है।
मान करने का कौन ठिकाना?
पूजा में भाव आता है – उत्तम मार्दव गुन मन माना, मान करन को कौन ठिकाना।
हे मन! उत्तम मार्दव को धारण कर। आखिर किस बात का मान और किस बात का घमंड?
आज जिस धन, पद, रूप, शक्ति या प्रतिष्ठा पर हमें गर्व है, वह स्थायी नहीं है। परिस्थितियां बदलते देर नहीं लगतीं। इसलिए जैन दृष्टि व्यक्ति को उपलब्धियों के नशे से निकालकर आत्मचिंतन की ओर ले जाती है।
निगोद से मनुष्य तक – फिर किस बात का अहंकार?
पूजा में जीव की अनंत यात्रा का स्मरण कराते हुए कहा गया है-
बस्यो निगोद मांहि तैं आया, दमरी रूँकन भाग बिकाया।
रूँकन बिकाया भाग वशतैं, देव इक-इन्द्री भया॥
इन पंक्तियों का संदेश है कि जीव ने अनादिकाल से असंख्य अवस्थाओं और योनियों में भ्रमण किया है। आज मनुष्य जीवन, धन, पद या प्रतिष्ठा मिली है तो इसे स्थायी उपलब्धि मानकर अहंकार करना उचित नहीं। मनुष्य जीवन स्वयं एक दुर्लभ अवसर है—इसे मान में नहीं, आत्मकल्याण में लगाना चाहिए।
राजा हो या सामान्य जीव अहंकार सबको गिराता है
पूजा में आगे कहा गया है – उत्तम मुआ चाण्डाल हूवा, भूप कीड़ों में गया।
इसका भाव यह है कि संसार की ऊंची स्थिति भी स्थायी नहीं है। आज कोई राजा है, कल परिस्थितियां बदल सकती हैं। इसलिए पद को अपनी पहचान और प्रतिष्ठा को अपना स्थायी स्वरूप मान लेना मोह और अहंकार को बढ़ाता है। मार्दव हमें सिखाता है कि व्यक्ति का वास्तविक मूल्य उसके पद या संपत्ति से नहीं, बल्कि उसके गुण, आचरण और आत्मिक अवस्था से होता है।
जवानी, धन और पद—सब जल के बुलबुले
पूजा की अत्यंत सुंदर पंक्ति है – जीतव्य जोवन धन गुमान, कहा करैं जल-बुदबुदा।
जवानी, धन, सौंदर्य, शक्ति और पद पर किस बात का गर्व? ये सब जल के बुलबुले की तरह क्षणभंगुर हैं।
आज जो शरीर स्वस्थ और सुंदर है, वह समय के साथ बदल जाएगा। आज जो धन है, वह कल नहीं भी हो सकता। आज जो पद है, वह किसी और के पास जा सकता है। इसलिए जैन दर्शन का संदेश है—नश्वर वस्तुओं पर अभिमान करने के बजाय शाश्वत आत्मस्वरूप की ओर देखो।
विनय से ही ज्ञान का उदय होता है
पूजा का अंतिम संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है – करि विनय बहु-गुन बड़े जनकी, ज्ञान का पावै उदा॥
अर्थात गुणी, ज्ञानी और बड़े जनों के प्रति विनय रखो। विनय से ज्ञान का प्रकाश बढ़ता है। जिस पात्र में अहंकार भरा हो, उसमें ज्ञान का अमृत कैसे ठहरेगा?
इसीलिए जैन परंपरा में गुरु, शास्त्र और साधु के प्रति विनय को आध्यात्मिक साधना का महत्वपूर्ण अंग माना गया है। जैन साहित्य में भी विनय को गुणों की वृद्धि और मुक्ति के मार्ग से जोड़ा गया है।
मार्दव का सबसे बड़ा शत्रु—मैं
उत्तम मार्दव की साधना का सबसे सरल परीक्षण है—अपने भीतर के “मैं” को देखना।
- मैं बड़ा हूं।
- मैं अधिक जानता हूं।
- मेरा पद बड़ा है।
- मेरे पास अधिक धन है।
- मैं अधिक योग्य हूं।
- मेरी बात ही सही है।
जब ये भाव मन में बार-बार उठने लगें, तब समझना चाहिए कि मान-कषाय अपना प्रभाव दिखा रही है। मार्दव कहता है – गुण हों तो उनका अभिमान मत करो; गुणों को आत्मविकास का साधन बनाओ।
मार्दव का अभ्यास कैसे करें?
दशलक्षण पर्व में उत्तम मार्दव को केवल पढ़ने या पूजा करने के बजाय जीवन में उतारने का संकल्प लिया जा सकता है-
पहला— अपनी किसी उपलब्धि पर आज अहंकार न करें।
दूसरा— किसी छोटे या कमजोर समझे जाने वाले व्यक्ति से भी सम्मानपूर्वक व्यवहार करें।
तीसरा— माता-पिता, गुरु और गुणी व्यक्तियों के प्रति विनय रखें।
चौथा— अपनी गलती स्वीकार करने में संकोच न करें।
पांचवां— मन, वचन और व्यवहार से “मैं श्रेष्ठ हूं” की भावना को पहचानें और छोड़ने का प्रयास करें।
आज का आत्मचिंतन
- रात को कुछ मिनट शांत बैठकर स्वयं से पूछें—
- क्या आज मैंने किसी को अपने से छोटा समझा?क्या अपनी धन-संपत्ति, पद, ज्ञान या रूप का मुझे अहंकार हुआ?
- क्या मैंने किसी योग्य व्यक्ति के सामने विनय दिखाई?
- क्या मैं अपनी गलती स्वीकार कर सका?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर ईमानदारी से खोज लिए, तो उत्तम मार्दव की पूजा वास्तव में भीतर शुरू हो जाती है।
उत्तम मार्दव का सार
मान से जीव भारी होकर संसार में डूबता है, मार्दव से मन हल्का होकर आत्मा के उत्थान की ओर बढ़ता है। झुका हुआ वृक्ष फल देता है, भरा हुआ बादल बरसता है और विनम्र मन ज्ञान ग्रहण करता है।
इसलिए उत्तम मार्दव का संदेश है – अहंकार से ऊंचाई दिखाई देती है, विनय से वास्तविक ऊंचाई प्राप्त होती है। दशलक्षण पर्व का दूसरा धर्म हमें याद दिलाता है कि जिस दिन मैं बड़ा हूं का भाव घटने लगता है, उसी दिन भीतर का आत्मिक विकास शुरू होता है।
ॐ ह्रीं श्री उत्तम मार्दवधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ नमः।


