भारत-अमेरिका सैन्य साझेदारी को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाला संयुक्त अभ्यास इस समय देश के दो अलग-अलग क्षेत्रों में चल रहा है। लगभग 1200 सैनिक, प्रत्येक सेना से करीब 600, 28 सितंबर तक दो स्थलों पर प्रशिक्षण ले रहे हैं, जो एक-दूसरे से 1000 किलोमीटर से अधिक दूर हैं। यह अभ्यास न केवल पारस्परिक अंतर-संचालन को मजबूत कर रहा है, बल्कि बहु-डोमेन युद्ध की आधुनिक जरूरतों को भी पूरा कर रहा है।
उत्तराखंड के औली में पहाड़ी युद्धकौशल पर विशेष जोर दिया जा रहा है। यहां इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप्स के जरिए उच्च-ऊंचाई वाले इलाकों में समन्वित अभियानों का अभ्यास हो रहा है। वहीं राजस्थान के महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में सटीक अग्निशक्ति, ड्रोन, निगरानी प्रणालियां और काउंटर-ड्रोन रणनीतियां प्रमुख हैं। अमेरिकी एचआईएमएआरएस सिस्टम का भी उपयोग किया जा रहा है, जो लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता का प्रतीक है।
भारतीय सेना के मेजर जनरल अमरेश गुंजन और अमरीकी सेना के कर्नल बेंजामिन जैकमैन जैसे अधिकारियों ने इस अभ्यास को दोनों सेनाओं की तैयारियों और इंटर-ऑपेराबिलिटी क्षमता बढ़ाने वाला बताया है। विविध भूभागों में एक साथ प्रशिक्षण से भारत-अमेरिका रक्षा संबंध और मजबूत हो रहे हैं। यह साझेदारी हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा चुनौतियों के मद्देनजर अत्यंत महत्वपूर्ण है।
वर्तमान दौर में जब ईरान- इजराइल युद्ध के चलते स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज क्षेत्र के खतरे के कारण लगभग आधी दुनिया का व्यापार व ऊर्जा जरूरतों पर बहुत ही विपरीत प्रभाव पड़ा है, ऐसे में अमरीका के साथ युद्ध अभ्यास करना भारत के लिए भी बहुत जरुरी है। कच्चे तेल के दाम बढ़ना तो एक विषय है पर बढ़ी हुई कीमतों पर भी पेट्रोलियम भारत पहुँच जाये तो बड़ी बात है और इसके लिए भारत का अपने जहाजों को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है।
ऐसे संयुक्त अभ्यास न केवल सामरिक समझ बढ़ाते हैं, बल्कि वास्तविक युद्ध स्थितियों के लिए दोनों पक्षों को बेहतर ढंग से तैयार करते हैं। रक्षा सहयोग का यह सिलसिला भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और साझेदारियों के संतुलित विकास का उदाहरण है।


