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अग्निवीर : हर हर चौकीदार, घर घर चौकीदार – नए फ्लेवर में पुराना आइटम

-पूरा देश अग्निपथ की आग में झुलस रहा है, क्या सरकार स्कीम को समझाने में नाकामयाब हुई?
-या युवाओं ने स्कीम को ज्यादा (गलत) समझ लिया? 
देवेंद्र मालवीय
(प्रधान संपादक) 
किसी स्कीम को लागू करने से पूर्व संबंधित पक्षों से विचार-विमर्श करना होता है ।
कई दौर की मीटिंग में मंथन किया जाता है, रिलेटेड सभी फैक्ट्स पर बारीकी से विचार विमर्श होता है, उसके बाद संसद में पास होता है (होना भी चाहिए) तब कहीं जाकर जनहित की स्कीमों को लांच किया जाता है।
परंतु देखने में आता है कि मोदी सरकार की योजनाओं पर कड़ा विरोध होता है चाहे नोटबंदी हो, जीएसटी हो, किसान बिल हो, या अब यह अग्निवीर स्कीम।
एक और जहां स्कीमों के फायदे व्हाट्सएप, फेसबुक यूनिवर्सिटी पर बताए जा रहे हैं वहीं दूसरी ओर यूट्यूब, व्हाट्सएप, फेसबुक, यूनिवर्सिटी पर इसके विरोध की खबरें चल रही है।
युवाओं का इस तरह शासकीय संपत्तियों का तोड़फोड़ करना, आगजनी करना, ऐसा विरोध गांधी के इस देश में उचित नहीं है। अहिंसा के साथ विरोध तो सही है परंतु हिंसा का रूप अपनाना कतई बर्दाश्त योग्य नहीं। युवाओं को शांतिपूर्ण विरोध का तरीका अपनाकर अपनी बात सरकार तक पहुंचाना चाहिए।
विडंबना है कि जो लोग लोग छात्रों को गांधीवादी तरीके से आंदोलन करने की सीख दे रहे हैं, वो ही अभी कुछ दिन पहले, पुलिस को हवालात में घुटने तोड़ते देखकर या बुलडोजर से घर तोड़ देख कर अट्टहास कर रहे थे.
कोई जरा बताएं कि यह बुलडोजर कौन सा गांधीवादी तरीका है, रही बात हिंसा या किसी भी तरह की तोड़फोड़ की उसे किसी भी स्थिति में जायज नहीं ठहराया जा सकता.
उनके साथ कानून के सख्त से सख्त प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए.उनके चेहरे पहचान कर सारी सरकारी योजनाओं से कुछ समय के लिए वंचित कर देना चाहिए।
हालांकि अग्नीपथ स्कीम को मैं व्यक्तिगत रूप से नए फ्लेवर में पुराने स्कीम मानता हूं मुझे याद है जब कोई महापौर/ पार्षद / नेता चुना जाता है तो उनके खास लोगों को नगर पालिका, नगर निगम, या अन्य सरकारी उपक्रमों में कॉन्ट्रैक्ट बेस पर रखावा दिया जाता है । समय सीमा भी वही होती है जो अग्निवीर के लिए बताई गई है ।
इंदौर के ही ऐसे अनेकों नेता है जो अपने खासों को नगर निगम में फिट करवा देते हैं, जब तक उनकी राजनीति चलती है उन के खास आदमी नौकरी करते रहते हैं, जैसे ही दूसरे का समय आता है इन्हें रिटायर / बाहर कर दिया जाता है ।यही लोग निगमवीर कहलाते हैं
सोशल मीडिया पर चल रही पोस्ट कि नेताओं को भी एक सत्र के बाद रिटायरमेंट दे देना चाहिए, विधायकों, सांसदो की पेंशन बंद करना चाहिए और उन्हें सदन वीर की उपाधि दी जानी चाहिए ।
आईएएस, आईपीएस को 4 साल की नौकरी के बाद बिना पेंशन के रिटायर कर देना चाहिए इन्हें भी प्रशासन वीर कहा जाना चाहिए।
ऐसे अनेकों वीरों की मांग सोशल मीडिया पर दिख रही है।
अग्निवीर के रिटायर्ड सैनिक बाद में क्या करेंगे इसको लेकर भी गरमा गरम बहस जारी है, सरकार उन्हें रक्षा के क्षेत्र में अनेकों फायदे और देश हित से जुड़े फायदे गिना रही है ।
जबकि अधिकतर केस में देखने में आता है कि रिटायर्ड फौजी सिक्योरिटी गार्ड की सर्विस कर रहे हैं तो क्या अग्निवीर भी यही करेंगे ?
तो क्या हर-हर चौकीदार घर-घर चौकीदार का नारा सही साबित होगा ? इंदौरी नेता कैलाश विजयवर्गीय का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है जिसमें वह कह रहे हैं कि बीजेपी ऑफिस में चौकीदार अग्निवीर को रखा जाना चाहिए ।
योजना का एक हिस्सा अधिकतम 25% लोगों को परमानेंट नौकरी देने का है तो क्या 75% अग्निवीर जनता को यह समझा पाएंगे कि वह योग्य नहीं है जो 25% में शामिल नहीं हो सके यह सवाल महत्वपूर्ण है ।
किसी भी योजना के पक्ष और विपक्ष दोनों होते हैं।
जीएसटी पर व्यापारियों का विरोध, नोटबंदी पर व्यापारी एवं जनता का विरोध, शिक्षा नीति पर छात्रों का विरोध, कृषि बिल पर कृषकों का विरोध, बैंकों के निजीकरण पर बैंकर्स का विरोध, अब नौजवानों की अग्निवीर योजना पर नौजवानों का विरोध, आखिर सरकार इन बातों पर ध्यान क्यों नहीं देता कि बाद में विरोध ना हो । या यूं कहा जाए के योजना लागू करने के बाद उस पर विचार (लीपापोती) करती है ।
इधर सेना के अधिकारियों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर स्पष्ट कर दिया कि अग्निवीर योजना वापस नहीं होगी.
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